बांदा के अन्नदाता पर 'दोहरी मार': 32 गांवों में छुट्टा पशुओं का आतंक
पैलानी/बांदा |प्रलभ शरण चौधरी Truth India Times
बांदा। बुंदेलखंड के बांदा जिले में किसानों की तकदीर और तस्वीर दोनों ही बदहाल नजर आ रही हैं। पैलानी तहसील क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले लगभग 32 गांवों के हजारों किसान इस समय ‘विनाशकारी’ दौर से गुजर रहे हैं। एक ओर छुट्टा पशुओं का झुंड लहलहाती फसलों को चंद मिनटों में मरुस्थल बना रहा है, तो दूसरी ओर यूरिया खाद की भारी किल्लत ने किसानों की कमर तोड़ दी है। आलम यह है कि हाड़ कंपा देने वाली ठंड में भी किसान घर की रजाई छोड़कर खेतों की मेड़ों पर टॉर्च लेकर पहरेदारी करने को मजबूर हैं, लेकिन उनके प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं।
32 गांवों में त्राहि-त्राहि: रातभर जागने के बाद भी उजाड़ रहे खेत
पैलानी तहसील के रामपुर डाढा मऊ, खपटीया, नारायण, बुधेड़ा, मवई सहित 32 गांवों के किसानों के लिए छुट्टा पशु किसी प्राकृतिक आपदा से कम नहीं हैं। किसान योगेंद्र सिंह और यज्ञ दत्त ने नम आंखों से बताया कि वे शाम ढलते ही लाठी और टॉर्च लेकर खेतों की ओर निकल जाते हैं। पूरी रात जागकर पशुओं को खदेड़ते हैं, लेकिन जैसे ही एक तरफ से पशुओं को भगाया जाता है, दूसरी तरफ से दर्जनों पशुओं का दूसरा झुंड खेत में दाखिल हो जाता है।
कन्हैया तिवारी और राघवेंद्र सिंह जैसे किसानों का कहना है कि गेहूं और चने की फसल, जिसे उन्होंने बड़ी उम्मीदों के साथ बोया था, अब पशुओं के पैरों तले रौंदी जा रही है। किसानों का आरोप है कि गौशालाओं के दावों के बावजूद धरातल पर पशु सड़कों और खेतों में ही घूम रहे हैं।
जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की ‘चुप्पी’ से उपजा आक्रोश
हैरानी की बात यह है कि किसान इस समस्या को लेकर कई बार आला अधिकारियों और तिंदवारी क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों के दरवाजे खटखटा चुके हैं। आनंद सिंह और सुमेर कुमार ने बताया कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले नेता अब उनकी सुध लेने को तैयार नहीं हैं। शिकायतों का पुलिंदा तो अधिकारियों की मेजों पर है, लेकिन गांवों में पशुओं को पकड़ने या नई गौशालाएं क्रियाशील करने की कोई ठोस योजना नहीं दिख रही है। किसानों का कहना है कि अगर जल्द ही समाधान नहीं हुआ, तो वे सामूहिक रूप से तहसील मुख्यालय का घेराव करेंगे।
यूरिया का ‘अकाल’: खाद की किल्लत ने छीनी किसानों की नींद
पशुओं की समस्या से जो किसान किसी तरह जूझ रहे हैं, उनके सामने अब यूरिया खाद का संकट पहाड़ बनकर खड़ा हो गया है। रबी की फसल के लिए इस समय यूरिया की सख्त जरूरत है, लेकिन सहकारी समितियों और निजी दुकानों से खाद नदारद है। किसानों का आरोप है कि खाद की कालाबाजारी हो रही है और सरकारी तंत्र इसे रोकने में पूरी तरह विफल रहा है। लंबी-लंबी लाइनों में लगने के बावजूद उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ रहा है, जिससे फसल की ग्रोथ रुकने का खतरा बढ़ गया है।
सरकारी वादों और धरातल की हकीकत में भारी अंतर
किसानों का मानना है कि उत्तर प्रदेश सरकार के ‘अन्नदाता’ के कल्याण के दावे बांदा की जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते।
- गौशालाओं की स्थिति: अधिकतर सरकारी गौशालाएं क्षमता से अधिक भरी हैं या वहां चारे-पानी के अभाव में पशुओं को वापस छोड़ दिया जाता है।
- लागत का डर: खाद के दाम और सिंचाई के खर्च के बाद अब फसल सुरक्षा के लिए कटीले तारों (Fencing) का खर्च वहन करना छोटे किसानों के बस के बाहर है।
प्रलभ शरण चौधरी की विशेष रिपोर्ट: “अब और कितना सहे किसान?”
बांदा के किसानों की यह व्यथा केवल आर्थिक नुकसान की नहीं है, बल्कि यह उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी भारी पड़ रही है। कड़ाके की सर्दी में रातभर खेतों में रुकना बीमारियां और जंगली जानवरों का खतरा पैदा करता है। प्रशासन को चाहिए कि वह केवल कागजी घोड़ों की जगह धरातल पर आकर किसानों की फसलों का सर्वे करे और यूरिया की आपूर्ति सुनिश्चित करने के साथ-साथ छुट्टा पशुओं के लिए युद्धस्तर पर अभियान चलाए।
किसानों के हक की बात – ट्रुथ इंडिया टाइम्स
About The Author
Discover more from Truth India Times
Subscribe to get the latest posts sent to your email.