जिले में स्वास्थ्य सेवाएं धराशायी
प्रलभ शरण चौधरी | ट्रुथ इंडिया टाइम्स
-स्वीकृत 153 पदों के सापेक्ष वर्तमान में केवल 103 चिकित्सक ही
-जिला अस्पताल में चिकित्सकों के स्वीकृत 60 पदों में 36 पदों पर ही भर्ती
कन्नौज। इत्र की खुशबू के लिए मशहूर कन्नौज शहर इन दिनों अपनी चरमराती स्वास्थ्य सेवाओं के कारण चर्चा में है। कहने को तो यहां की आबादी करीब 20 लाख है, लेकिन जब बात स्वास्थ्य सेवाओं की आती है, तो हालात कुछ और ही बयां कर रहे होते हैं। जिले में डाक्टरों की भारी कमी के चलते स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह पटरी से उतर चुकी हैं। हालत यह है कि गंभीर रूप से बीमार मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद सीधे कानपुर या लखनऊ रेफर कर दिया जाता है, जिससे मरीजों की जान जोखिम में बनी रहती है।
आंकड़ों की हकीकत, मानकों की उड़ रही धज्जियां
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों के अनुसार, प्रति एक हजार की आबादी पर एक डाक्टर होना अनिवार्य है, लेकिन कन्नौज की स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। जिले की 20 लाख की आबादी की जिम्मेदारी महज 103 कार्यरत डाक्टरों के कंधों पर है। जिले में डाक्टरों के कुल 153 पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में 50 पद रिक्त पड़े हैं। इसका सीधा असर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के मरीजों पर पड़ रहा है। जिले में एक 200 शैय्या वाला जिला अस्पताल, 14 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और 33 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं, लेकिन स्टाफ की कमी के कारण ये केंद्र केवल रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं।
रेफर करने का अड्डा बना सरकारी सिस्टम
जिला अस्पताल में रोजाना करीब हजार से 1200 के आस पास मरीज ओपीडी में अपनी बीमारियों का इलाज कराने पहुंचते हैं। ओपीडी में लंबी कतारें और डाक्टरों का अभाव मरीजों के लिए मानसिक और शारीरिक पीड़ा का कारण बन रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि पिछले एक माह में जिला अस्पताल से करीब 328 मरीजों को अन्य अस्पतालों में रेफर किया गया है। जिला अस्पताल आने वाले गंभीर हेड इंजरी (सिर की चोट), कैंसर की अंतिम अवस्था, और कार्डियक अरेस्ट जैसे मामलों में यहां के डाक्टर हाथ खड़े कर देते हैं। विशेषज्ञ डाक्टरों (स्पेशलिस्ट) की कमी के कारण वेंटिलेटर और आधुनिक मशीनों के होने के बावजूद उनका लाभ मरीजों को नहीं मिल पा रहा है।
निजी अस्पतालों की लूट का शिकार हो रहे गरीब
सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डाक्टरों के न होने का सीधा फायदा निजी क्लिनिक और निजी अस्पताल उठा रहे हैं। गरीब मरीज, जो लंबी दूरी तय कर कानपुर या लखनऊ जाने में असमर्थ हैं, वे अपनी जमीन-जेवर गिरवी रखकर निजी अस्पतालों का रुख करते हैं। निजी सेंटरों पर इलाज के नाम पर मनमानी फीस वसूली जा रही है, जिससे मध्यम और निम्न वर्ग के लोग आर्थिक रूप से टूट रहे हैं।
डाक्टरों पर काम का भारी बोझ
स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों की मानें तो जो डाक्टर वर्तमान में तैनात हैं, वे भी भारी मानसिक दबाव में हैं। क्षमता से तीन से चार गुना अधिक मरीजों को देखने के कारण डाक्टरों में भी चिड़चिड़ापन और थकान देखी जा रही है। कई डाक्टर अत्यधिक काम के बोझ के कारण सरकारी सेवा से दूरी बनाने लगे हैं, जिससे रिक्त पदों को भरना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
कब तक कानपुर के भरोसे रहेगा कन्नौज
पिछले एक महिनों के आंकड़ों पर गौर करें तो रेफर किए गए ज्यादातर मामलों में सिर की गंभीर चोट मुख्य कारण रही। जिले में न्यूरोसर्जन न होने की वजह से सड़क दुर्घटना में घायल मरीजों को तुरंत कानपुर भेजा जाता है। रास्ते में लगने वाले समय के कारण कई मरीज अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। यही हाल कैंसर की अंतिम अवस्था वाले मरीजों का है, जिन्हें केवल दर्द निवारक इंजेक्शन देकर बड़े शहरों की ओर रवाना कर दिया जाता है।
इलाज को 608 पहुंचे अस्पताल
मौसम का परिवर्तन लोगों को तेजी से बीमार कर रहा है। इन दिनों घर-घर लोग खांसी, जुकाम, बुखार जैसी मौसमी बीमारियों से पीड़ित हैं। इसका असर अस्पताल आने वाले मरीजों की संख्या पर भी पड़ा है। शनिवार को 608 मरीज चिकित्सकीय परामर्श के लिए अस्पताल पहुंचे। सीएमएस डा. शक्ति बसु ने बताया कि मौसम में आ रहे परिवर्तन में सावधानी बरतने की जरूरत है। इस मौसम में कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग तेजी से बीमार हो रहे हैं।
रिक्त पदों को भरने के लिए शासन को समय-समय पर पत्राचार किया जा रहा है। वर्तमान में जो संसाधन उपलब्ध हैं, उन्हीं के माध्यम से बेहतर इलाज देने का प्रयास किया जा रहा है। संविदा पर डॉक्टरों की नियुक्ति की प्रक्रिया जारी है, जिससे जल्द ही स्थिति में सुधार की उम्मीद है।
डा. स्वदेश गुप्ता, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, कन्नौज
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