कुशाग्र की मां का छलका दर्द
प्रलभ शरण चौधरी | Truth India Times
कानपुर: “मैं उसे (रचिता) ट्यूशन टीचर नहीं, अपनी बेटी मानती थी। घर में कुछ भी अच्छा पकता तो सबसे पहले उसे बुलाती थी। जिस पर सगा होने से ज्यादा भरोसा किया, उसी ने मेरे जिगर के टुकड़े को छीन लिया।” ये शब्द उस बदनसीब मां के हैं, जिसके इकलौते बेटे कुशाग्र की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। कानपुर के चर्चित कुशाग्र हत्याकांड में अब उसकी मां का दर्द और डर दोनों सामने आया है। न्याय की गुहार लगाते-लगाते थक चुकी मां ने अब हत्यारों के खौफ से कानपुर तक छोड़ दिया है।
विश्वास की आड़ में रची गई खूनी साजिश
कानपुर के मशहूर कपड़ा कारोबारी के बेटे कुशाग्र की हत्या ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इस हत्याकांड की मुख्य आरोपी कोई और नहीं, बल्कि उसकी ट्यूशन टीचर रचिता थी। कुशाग्र की मां ने नम आंखों से बताया कि रचिता उनके घर की सदस्य जैसी बन चुकी थी। होली का त्यौहार हो या घर का कोई और कार्यक्रम, रचिता हमेशा उनके साथ रहती थी।
कुशाग्र की मां कहती हैं, “होली के समय मैंने उसे अपने घर में चार दिन तक रोक कर रखा था। मुझे रत्ती भर भी आभास नहीं था कि जिस लड़की को मैं मां जैसा प्यार दे रही हूँ, वही मेरे मासूम बेटे की हत्या की साजिश रच रही है।”
ट्यूशन टीचर, प्रेमी और दोस्त: खूनी त्रिकोण
पुलिस जांच में यह साफ हो चुका है कि रचिता ने अपने प्रेमी प्रभात और एक अन्य दोस्त के साथ मिलकर कुशाग्र के अपहरण और फिर उसकी हत्या की योजना बनाई थी। फिरौती के लिए किए गए इस अपहरण का अंजाम इतना खौफनाक होगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। आरोपियों ने पकड़े जाने के डर से कुशाग्र की गला घोंटकर हत्या कर दी थी और लाश को छिपा दिया था।
मां का आरोप है कि ये तीनों केवल अपराधी नहीं, बल्कि ‘नरपिशाच’ हैं जिन्होंने एक ऐसे परिवार को निशाना बनाया जिसने उन पर आंख मूंदकर भरोसा किया था।
“अब कानपुर में डर लगता है”
कुशाग्र की मां ने एक सनसनीखेज खुलासा करते हुए बताया कि उन्होंने अब कानपुर छोड़ दिया है। उनका कहना है कि हत्यारों के जुड़े लोग और इस केस से संबंधित स्थितियां उन्हें और उनके परिवार को डरा रही हैं। “जिस शहर की गलियों में मेरा बेटा खेलता था, वहां अब उसकी यादें और हत्यारों का खौफ पीछा करता है। हमें जान का खतरा महसूस होता है, इसलिए हमने शहर छोड़ना ही बेहतर समझा।”
यह बयान उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था और गवाहों की सुरक्षा पर भी बड़े सवाल खड़े करता है। जब पीड़ित परिवार ही डर के साये में शहर छोड़ने को मजबूर हो जाए, तो न्याय की राह और भी कठिन नजर आने लगती है।
न्याय की धीमी रफ्तार से नाराजगी
कुशाग्र के परिजनों का कहना है कि वे इस मामले में दोषियों के लिए सिर्फ और सिर्फ ‘फांसी’ की सजा चाहते हैं। मां का कहना है कि रचिता जैसी औरतें समाज के लिए कलंक हैं, जो गुरु-शिष्य के पवित्र रिश्ते को शर्मसार करती हैं। उन्होंने मांग की है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए इस मामले का जल्द निपटारा हो ताकि कुशाग्र की आत्मा को शांति मिल सके।
Truth India Times की विशेष टिप्पणी
कुशाग्र हत्याकांड केवल एक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों के पतन की पराकाष्ठा है। एक ट्यूशन टीचर, जिसे अभिभावक अपने बच्चों का भविष्य सौंपते हैं, वही अगर ‘कातिल’ बन जाए तो समाज किस पर भरोसा करेगा? कुशाग्र की मां का शहर छोड़ना यह बताता है कि हम एक पीड़ित परिवार को वह सुरक्षा और मानसिक संबल देने में विफल रहे हैं, जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत थी। क्या प्रशासन कुशाग्र के परिवार को वह सुरक्षा दे पाएगा कि वे वापस अपने शहर लौट सकें?
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