कानपुर नगर निगम में 'अपनों' का विद्रोह: बीजेपी पार्षदों ने पूछा- "सदन में चोर कौन?"
कानपुर | प्रलभ शरण चौधरी Truth India Times
कानपुर। कानपुर नगर निगम का सदन शुक्रवार को विकास की चर्चा के बजाय ‘विद्रोह’ के अखाड़े में तब्दील हो गया। ताज्जुब की बात यह रही कि इस बार नगर निगम प्रशासन और अधिकारियों को विपक्ष ने नहीं, बल्कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के ही पार्षदों ने कटघरे में खड़ा किया। अपनी ही सरकार और अपनी ही महापौर के सामने भाजपा पार्षदों का दर्द छलक उठा। पार्षदों ने अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए यहाँ तक कह दिया कि— “नगर निगम में चोर कौन है, अब हमें यही ढूंढना है।” उन्होंने आरोप लगाया कि दलित और ओबीसी (OBC) बाहुल्य वार्डों के विकास के प्रस्तावों की फाइलें जानबूझकर गायब की जा रही हैं।
“हमारे प्रस्तावों को निगल जा रहा सिस्टम”
सदन की कार्यवाही शुरू होते ही भाजपा के कई वरिष्ठ पार्षदों ने अपनी ही पार्टी की महापौर प्रमिला पांडेय के सामने विरोध का झंडा बुलंद कर दिया। पार्षदों का सबसे बड़ा आरोप ‘फाइलों की चोरी’ को लेकर था। एक भाजपा पार्षद ने चिल्लाते हुए कहा, “हम जनता के बीच से चुनकर आए हैं, हम अधिकारियों की गुलामी करने नहीं आए। हम विकास कार्यों के प्रस्ताव देते हैं, लेकिन नगर निगम के दफ्तरों में पहुँचते ही वे फाइलें गायब हो जाती हैं। आखिर इन फाइलों को कौन चुरा रहा है? कौन है वो चोर जो हमारे वार्डों का विकास रोकना चाहता है?”
दलित और पिछड़े पार्षदों ने लगाया भेदभाव का आरोप
सदन में उस वक्त स्थिति और भी असहज हो गई जब दलित और पिछड़ा वर्ग से आने वाले पार्षदों ने ‘जातिगत अनदेखी’ का मुद्दा उठा दिया। इन पार्षदों का आरोप था कि नगर निगम के अधिकारी केवल कुछ खास ‘रसूखदार’ और ‘पहुँच वाले’ पार्षदों के वार्डों में ही करोड़ों का बजट आवंटित कर रहे हैं।
दलित वर्ग के एक पार्षद ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा, “क्या हम केवल वोट बैंक के लिए हैं? हमारे वार्डों की सड़कें टूटी हैं, नालियां बजबजा रही हैं, लेकिन जब बजट की बात आती है तो कहा जाता है कि फंड नहीं है। वहीं दूसरी ओर, प्रभावशाली पार्षदों के वार्डों में बिना फाइल गायब हुए काम हो रहे हैं। हम भाजपा के सिपाही होने के बावजूद अपने ही सदन में उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।”
हंगामे के कारण बाधित हुई कार्यवाही
सदन में हंगामे का आलम यह था कि पार्षद अपनी सीटों को छोड़कर वेल में आ गए। अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और पार्षदों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए नारेबाजी की गई। भाजपा पार्षदों का यह गुस्सा देखकर विपक्षी पार्षद भी अपनी हंसी नहीं रोक पाए और उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “जब सत्ता पक्ष के ही लोग अपनी सरकार के भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं, तो शहर का क्या होगा?”
महापौर प्रमिला पांडेय ने पार्षदों को शांत कराने की कोशिश की और आश्वासन दिया कि किसी भी फाइल को गायब नहीं होने दिया जाएगा, लेकिन पार्षद इस बात पर अड़ गए कि पहले उन अधिकारियों को चिन्हित किया जाए जो फाइलों के हेरफेर में शामिल हैं।
“जनता को क्या जवाब दें?” – पार्षदों की बेबसी
सदन के बाहर Truth India Times से बात करते हुए एक पीड़ित पार्षद ने कहा, “जनता हमें इस उम्मीद में चुनती है कि हम उनके क्षेत्र का कायाकल्प करेंगे। हम सदन में चिल्लाते हैं, प्रस्ताव देते हैं, लेकिन नगर आयुक्त और उनके मातहत कर्मचारी हमारी फाइलों को रद्दी की टोकरी में डाल देते हैं या उन्हें ‘गुम’ दिखा देते हैं। भाजपा पार्षद होने के बाद भी हमें विकास के लिए तरसना पड़ रहा है, यह हमारे लिए शर्म की बात है।”
अधिकारियों की कार्यशैली पर उठे सवाल
नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की कार्यशैली पर पार्षदों ने सीधा हमला बोला। उनका कहना था कि बाबू और क्लर्क स्तर के कर्मचारी पार्षदों का सम्मान नहीं करते और फाइलों को आगे बढ़ाने के लिए ‘सुविधा शुल्क’ की अपेक्षा रखते हैं। पार्षदों ने चेतावनी दी कि अगर दलित और ओबीसी वार्डों के साथ भेदभाव बंद नहीं हुआ और ‘फाइल चोरी’ का खेल नहीं थमा, तो वे सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दरबार में अपनी गुहार लगाएंगे।
प्रलभ शरण चौधरी की विशेष रिपोर्ट: “अपनों की रार, विकास में दरार”
कानपुर नगर निगम का यह हंगामा बताता है कि यहाँ भ्रष्टाचार और अफसरशाही किस कदर हावी है। जब सत्ता पक्ष के ही पार्षद खुद को असुरक्षित और उपेक्षित महसूस करने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। “चोर कौन है” का यह सवाल अब केवल नगर निगम की दीवारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह शहर के गली-मोहल्लों में भी गूंजेगा।
सत्ता की ताकत, जनता का सच – ट्रुथ इंडिया टाइम्स
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