प्रधानमंत्री को खून से लिखा पत्र
कानपुर | प्रलभ शरण चौधरी (Truth India Times)
उत्तर प्रदेश के औद्योगिक नगर कानपुर में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों, ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशन 2026’ को लेकर विरोध की आग तेज हो गई है। मंगलवार को सनातन मठ मंदिर रक्षा समिति के कार्यकर्ताओं और स्थानीय समाजसेवियों ने जिला मुख्यालय (DM ऑफिस) पर जोरदार प्रदर्शन किया। इस दौरान समाजसेवी आकाश ठाकुर ने विरोध स्वरूप अपने खून से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा, जिसमें इस नए कानून को समाज को बांटने वाला बताते हुए इसे तत्काल वापस लेने की मांग की गई है।
खून से लिखा संदेश: ‘काला कानून वापस लो’
प्रदर्शन के दौरान आकाश ठाकुर ने जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर अपने हाथ से खून निकाला और कागज पर ‘UGC Roll Back’ और ‘काला कानून वापस लो’ के नारे लिखे। आकाश ठाकुर का कहना है कि यूजीसी के नए नियम सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव करने वाले हैं और शिक्षण संस्थानों में जातिवाद की खाई को और गहरा करेंगे। उन्होंने पत्र में लिखा कि सरकार समानता के नाम पर समाज को बांटने का काम कर रही है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
‘इक्विटी रेगुलेशन 2026’ पर क्यों है विवाद?
यूजीसी ने हाल ही में उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए नए नियम अधिसूचित किए हैं। इन नियमों के तहत हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में ‘इक्विटी कमेटी’ बनाना अनिवार्य होगा, जिसमें अनिवार्य रूप से SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक वर्गों का प्रतिनिधित्व होगा।
विरोध कर रहे छात्रों और संगठनों का आरोप है कि इन नियमों में सामान्य वर्ग (General Category) को पूरी तरह से उपेक्षित रखा गया है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि ये नियम सामान्य वर्ग के छात्रों को ‘संभावित अपराधी’ की तरह पेश करते हैं और बिना किसी ठोस जांच के झूठी शिकायतों के आधार पर उनके करियर को बर्बाद करने का माध्यम बन सकते हैं। कानपुर के लोगों का कहना है कि संस्थानों में योग्यता (Merit) के बजाय जाति को प्राथमिकता देना देश के भविष्य के लिए घातक है।
डीएम ऑफिस पर प्रदर्शन और नारेबाजी
प्रदर्शन के दौरान सनातन मठ मंदिर रक्षा समिति के बैनर तले जुटे लोगों ने केंद्र सरकार और यूजीसी के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने जिला प्रशासन के माध्यम से प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इन नियमों में संशोधन नहीं किया गया या इन्हें पूरी तरह वापस नहीं लिया गया, तो कानपुर का युवा सड़कों पर उतरकर बड़ा आंदोलन करने को मजबूर होगा।
समिति के पदाधिकारियों ने कहा कि सरकार एक तरफ ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देती है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे कानून लाकर सवर्ण समाज और सामान्य वर्ग के छात्रों को असुरक्षित महसूस करा रही है। उनका आरोप है कि यह कानून कॉलेजों के भीतर भाईचारे को खत्म कर केवल तनाव पैदा करेगा।
देशभर में फैल रही विरोध की चिंगारी
प्रलभ शरण चौधरी की रिपोर्ट के अनुसार, यूजीसी के इन नियमों का विरोध केवल कानपुर तक सीमित नहीं है। बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट के इस्तीफे से लेकर नोएडा और बांदा तक छात्र और सामाजिक संगठन लामबंद हो रहे हैं। कानपुर में हुए इस प्रदर्शन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि युवा अब इस मुद्दे पर चुप बैठने वाले नहीं हैं।
कानपुर की सड़कों पर उतरे छात्रों का कहना है कि शिक्षण संस्थानों को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनने देना चाहिए। वे मांग कर रहे हैं कि भेदभाव रोकने के नियम सभी छात्रों के लिए समान होने चाहिए, न कि किसी विशेष वर्ग को निशाना बनाने वाले।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री को खून से पत्र लिखने की घटना ने इस आंदोलन को एक नई दिशा दे दी है। क्या केंद्र सरकार और यूजीसी इन विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए अपने नियमों में कोई बदलाव करेगी या फिर यह गतिरोध और बढ़ेगा? ‘Truth India Times’ इस खबर पर अपनी नजर बनाए हुए है और हर अपडेट आप तक पहुँचाता रहेगा।
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