उन्नाव कांड में नया 'खेला'
उन्नाव: उत्तर प्रदेश का वो चर्चित कांड, जिसने देश की सियासत हिला दी थी, एक बार फिर सुर्खियों में है। लेकिन इस बार खबर कोर्ट के किसी आदेश से नहीं, बल्कि एक बेटी की सिसकियों और उसके पीछे छिपी ‘बड़ी प्लानिंग’ से निकलकर आई है। उम्रकैद की सजा काट रहे कुलदीप सिंह सेंगर की छोटी बेटी इशिता सेंगर ने जिस तरह सोशल मीडिया पर अपना दर्द साझा किया है, उसके पीछे जानकार एक गहरी रणनीति देख रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक भावुक अपील है, या अपने पिता को बचाने के लिए बिछाई गई कोई नई बिसात?
भावुकता की आड़ में ‘लीगल रिलीफ’ की तैयारी?
कानूनी गलियारों में चर्चा है कि इशिता का यह पत्र महज इत्तेफाक नहीं है। जब अदालती रास्ते लगभग बंद हो जाते हैं, तो ‘पब्लिक ओपिनियन’ (जनता की राय) बदलने की कोशिश की जाती है। इशिता ने अपनी पोस्ट में जिस तरह खुद को और अपनी बहन को ‘टारगेट’ बताया है, वह सीधे तौर पर मानवाधिकारों और महिला सुरक्षा की दुहाई देता है। जानकारों का मानना है कि इस माहौल का इस्तेमाल भविष्य में ‘मानवीय आधार’ (Humanitarian Grounds) पर पैरोल या सजा को कम करने की अर्जी के लिए किया जा सकता है।
क्या यह कोई बड़ी ‘पर्दे के पीछे’ की साजिश है?
इशिता ने अपनी पोस्ट में लिखा कि उसे हर दिन रेप और मर्डर की धमकी मिल रही है। अगर यह सच है, तो यह कानून-व्यवस्था पर सवाल है। लेकिन, ट्रुथ इंडिया टाइम्स के सूत्रों का कहना है कि इस बयान के जरिए एक ऐसा नैरेटिव सेट किया जा रहा है जिससे यह साबित हो सके कि सेंगर परिवार अब ‘शिकारी’ नहीं बल्कि ‘शिकार’ (Victim) बन चुका है।
राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो उन्नाव में सेंगर का रसूख आज भी खत्म नहीं हुआ है। समर्थकों के बीच यह संदेश फैलाया जा रहा है कि “विधायक जी” के साथ नाइंसाफी हुई है और अब उनके बच्चों को भी प्रताड़ित किया जा रहा है। क्या यह सहानुभूति आने वाले समय में किसी बड़े विरोध प्रदर्शन या कानूनी दबाव का रूप लेगी?
पिता को बचाने का आखिरी रास्ता: ‘क्यूरेटिव पिटीशन’ और राष्ट्रपति की दया
कुलदीप सेंगर के पास अब कानूनी रास्ते बहुत सीमित हैं। सुप्रीम कोर्ट से सजा बरकरार रहने के बाद अब केवल ‘क्यूरेटिव पिटीशन’ या फिर राज्यपाल/राष्ट्रपति के पास ‘दया याचिका’ (Mercy Petition) का विकल्प बचता है। इशिता का यह इमोशनल कार्ड इन याचिकाओं को मजबूती देने के लिए एक ‘ग्राउंड’ तैयार कर सकता है। अगर समाज में यह संदेश चला गया कि अपराधी की बेटियां घुट-घुट कर मर रही हैं, तो प्रशासन पर एक नैतिक दबाव बनता है।
धमकियों का सच या कानूनी ढाल?
इशिता ने अपनी सुरक्षा को लेकर जो गुहार लगाई है, वह उन्हें पुलिस सुरक्षा दिलाने में मदद कर सकती है। एक बार जब परिवार को सरकारी सुरक्षा मिलती है, तो समाज में उनका ‘कद’ फिर से बहाल होने लगता है। आलोचकों का कहना है कि यह सब एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है ताकि सेंगर परिवार को मुख्यधारा की चर्चा में वापस लाया जा सके।
निष्कर्ष: ट्रुथ इंडिया टाइम्स का विश्लेषण
कुलदीप सेंगर का गुनाह साबित हो चुका है, लेकिन उनकी बेटी की यह ‘इमोशनल स्ट्राइक’ बता रही है कि जंग अभी खत्म नहीं हुई है। क्या एक बेटी अपने पिता के दामन पर लगे दाग धो पाएगी? या फिर यह ‘सुलगते हुए उन्नाव’ में सहानुभूति की चिंगारी जलाकर अपनी खोई हुई सल्तनत वापस पाने की कोई बड़ी साजिश है? सचाई जो भी हो, इशिता के इस एक पत्र ने बंद हो चुके केस की फाइल को जनता की अदालत में फिर से खोल दिया है।
रिपोर्ट: प्रलभ शरण चौधरी, ट्रुथ इंडिया टाइम्स (Truth India Times)
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