प्रदूषण के खिलाफ फूटा ग्रामीणों का गुस्सा
प्रलभ शरण चौधरी | ट्रुथ इंडिया टाइम्स
उन्नाव। उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ ग्रामीणों का आक्रोश अब सड़कों पर आ गया है। जिले के सिंगरोसी गांव के सैकड़ों ग्रामीणों ने गांव के पास संचालित एक सरिया फैक्ट्री से फैल रही गंदगी और जहरीले कचरे के विरोध में कलेक्ट्रेट परिसर का घेराव किया। कांग्रेस जिलाध्यक्ष सुरेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व में प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों ने जिला प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और जिलाधिकारी से सीधे संवाद की मांग पर अड़े रहे।
‘मौत की फैक्ट्री’ के खिलाफ ग्रामीणों का मोर्चा
ग्रामीणों का आरोप है कि गांव के पास स्थित सरिया फैक्ट्री नियमों को ताक पर रखकर संचालित हो रही है। फैक्ट्री से निकलने वाला जहरीला कीचड़ और अपशिष्ट (Waste) सीधे रिहाइशी इलाकों और खेतों में बहाया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों ने बताया कि इस गंदगी के कारण पूरा इलाका दलदल में तब्दील हो चुका है। सबसे गंभीर आरोप यह लगाया गया कि इस प्रदूषण और इसके दुष्प्रभावों के कारण गांव के दो लोगों की असमय मौत भी हो चुकी है, जिसके बावजूद प्रशासन मौन साधे हुए है।
होली के पकवान भी हुए जहरीले
प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों ने अपनी व्यथा सुनाते हुए एक अनोखा लेकिन डरावना उदाहरण दिया। महिलाओं का कहना है कि होली के त्यौहार के लिए घरों में जो पापड़ और चिप्स बनाए जा रहे हैं, वे हवा में मौजूद प्रदूषण के कारण अपना रंग बदल रहे हैं। ग्रामीणों ने दावा किया कि प्रदूषण की मार ऐसी है कि पापड़ों का रंग इतना खराब और जहरीला हो जाता है कि उन्हें जानवर भी सूंघकर छोड़ देते हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि क्षेत्र की वायु और जल गुणवत्ता किस खतरनाक स्तर तक गिर चुकी है।
कलेक्ट्रेट में घंटों चला हाई-वोल्टेज ड्रामा
कांग्रेस जिलाध्यक्ष सुरेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व में ग्रामीण सुबह ही कलेक्ट्रेट पहुंच गए थे। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उन्होंने तीन दिन पहले ही जिलाधिकारी (DM) से मुलाकात का समय मांगा था और इसके बारे में सूचित किया था। बावजूद इसके, घंटों बीत जाने के बाद भी जब कोई जिम्मेदार अधिकारी उनसे मिलने नहीं आया, तो ग्रामीणों का धैर्य जवाब दे गया।
हालाँकि, स्थिति को बिगड़ते देख एडीएम (ADM) और सिटी मजिस्ट्रेट मौके पर पहुंचे और ग्रामीणों को समझाने की कोशिश की। उन्होंने समस्या के निस्तारण का आश्वासन दिया, लेकिन प्रदर्शनकारी टस से मस नहीं हुए। उनकी स्पष्ट मांग थी कि वे केवल जिलाधिकारी से ही बात करेंगे और जब तक फैक्ट्री पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, वे वहां से नहीं हटेंगे।
प्रशासन और सरकार की मंशा पर सवाल
ग्रामीणों ने सीधे तौर पर प्रशासन की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने पूछा कि:
- आखिर इस सरिया फैक्ट्री को आबादी के इतने करीब लाइसेंस किसने दिया?
- क्या फैक्ट्री के पास प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Pollution Control Board) की एनओसी है?
- 14 फरवरी को ज्ञापन सौंपने के बाद भी प्रशासन ने अब तक फैक्ट्री का निरीक्षण क्यों नहीं किया?
प्रदर्शनकारियों ने सरकार के ‘स्वच्छ भारत’ और ‘पर्यावरण संरक्षण’ के दावों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि एक तरफ गांवों को स्मार्ट बनाने की बातें होती हैं, दूसरी तरफ पूंजीपतियों की फैक्ट्रियां ग्रामीणों का दम घोंट रही हैं।
मुख्य मांगें और भविष्य की चेतावनी
सिंगरोसी गांव के निवासियों ने प्रशासन के सामने निम्नलिखित मांगें रखी हैं:
- संबंधित सरिया फैक्ट्री की तत्काल तकनीकी जांच कराई जाए।
- प्रदूषण मानकों का उल्लंघन पाए जाने पर फैक्ट्री को तुरंत सील किया जाए।
- प्रदूषण से हुई मौतों और फसल के नुकसान का उचित मुआवजा दिया जाए।
- गांव के जल स्रोतों की शुद्धता की जांच की जाए।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला गया, तो वे उग्र आंदोलन के लिए मजबूर होंगे, जिसकी जिम्मेदारी पूरी तरह से जिला प्रशासन की होगी। खबर लिखे जाने तक कलेक्ट्रेट परिसर में गहमागहमी का माहौल बना हुआ था और ग्रामीण अपनी मांगों को लेकर डटे हुए थे।
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