उन्नाव में 'जल-समाधि' लेते आस्था के केंद्र
प्रलभ शरण चौधरी (Truth India Times)
उन्नाव: उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में आस्था की जीवनदायिनी मां गंगा के तटों पर इस समय संकट के गहरे बादल मंडरा रहे हैं। मकर संक्रांति का पावन पर्व सिर पर है, लेकिन प्रशासन की घोर लापरवाही के कारण उन्नाव के वे ऐतिहासिक घाट अब इतिहास बनने की कगार पर हैं जहाँ कभी लाखों की भीड़ उमड़ती थी। मिश्रा कॉलोनी से लेकर रेलवे पुल तक गंगा के भीषण कटान ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया है। प्रशासन की ‘बांस-बल्ली’ वाली कागजी खानापूर्ति गंगा की लहरों में बह गई है, जिसका नतीजा यह है कि आज श्रद्धालु अपने ही घाटों पर जाने से खौफ खा रहे हैं।
अस्तित्व खोते घाट और मौत का कुआँ बनती गहराई
कभी जो घाट सीढ़ियों और समतल जमीन से श्रद्धालुओं का स्वागत करते थे, आज वहां जानलेवा गड्ढे और खतरनाक ढलान बन गए हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक, गंगा का यह रौद्र रूप और कटान अक्टूबर माह से ही शुरू हो गया था। वर्तमान स्थिति यह है कि गंगा की मुख्य धारा सतह से लगभग तीन से चार फीट नीचे चली गई है। मिट्टी के कटाव के कारण नदी के किनारे इतने खोखले हो चुके हैं कि वहां खड़ा होना भी मौत को दावत देने जैसा है।
आजीविका पर प्रहार: पंडा और स्थानीय दुकानदार बेहाल
घाटों के विलुप्त होने का असर केवल धार्मिक आस्था पर ही नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों पर भी पड़ा है जिनकी रोजी-रोटी गंगा के इन तटों से जुड़ी है। पीढ़ियों से कर्मकांड कराने वाले पंडों की आजीविका ठप हो गई है। स्नानार्थियों की कमी के कारण स्थानीय छोटे दुकानदारों के सामने भुखमरी की नौबत आ गई है। जब घाट ही नहीं रहेंगे, तो श्रद्धालु नहीं आएंगे और जब श्रद्धालु नहीं आएंगे, तो इन घाटों पर निर्भर अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी।
प्रशासन की लापरवाही या केवल बजट की बंदरबांट?
आश्चर्य की बात यह है कि प्रशासन को इस समस्या की जानकारी अक्टूबर से ही थी। कार्तिक पूर्णिमा के समय जब स्थिति अनियंत्रित हुई, तो प्रशासन ने समाधान निकालने के बजाय स्नान पर ‘प्रतिबंध’ लगा दिया। सिंचाई विभाग ने कुछ जगहों पर बांस और बल्लियां लगाकर अपनी ज़िम्मेदारी की इतिश्री कर ली। लेकिन रेलवे पुल और पुराने यातायात पुल के बीच हुए भीषण कटान ने प्रशासनिक दावों की धज्जियां उड़ा दीं। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन हमेशा ‘प्रतिबंध’ को ही विकल्प मानता रहेगा या कभी ठोस स्थायी समाधान की दिशा में काम करेगा?
मकर संक्रांति: बड़ी चुनौती और प्रशासन का ‘शनिवार’ वाला जुमला
मकर संक्रांति का पर्व चंद दिनों में आने वाला है। ऐसे में नगर पालिका अध्यक्ष कौमुदी पांडे ने आश्वासन दिया है कि घाटों के समतलीकरण (Leveling) का कार्य शनिवार से शुरू किया जाएगा। हालांकि, स्थानीय नागरिकों का कहना है कि महज मिट्टी डालने या समतलीकरण करने से समस्या हल नहीं होगी, क्योंकि गंगा का कटान जारी है। जब तक मजबूत ‘पार्किपाइन’ या पत्थरों का तटबंध नहीं बनाया जाता, तब तक श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
‘Truth India Times’ के कड़े सवाल:
- देर से क्यों जागी नगर पालिका?: जब कटान अक्टूबर से जारी था, तो मकर संक्रांति के ठीक पहले समतलीकरण का नाटक क्यों?
- बांस-बल्ली का खेल: सिंचाई विभाग द्वारा लगाई गई बांस-बल्लियां पहली ही लहर में क्यों बह गईं? क्या इसमें मानक विहीन कार्य हुआ है?
- श्रद्धालुओं की सुरक्षा: यदि स्नान के दौरान कोई अप्रिय घटना होती है, तो क्या प्रशासन इसकी नैतिक ज़िम्मेदारी लेगा?
- स्थायी समाधान: क्या कभी उन्नाव के इन ऐतिहासिक घाटों के पक्कीकरण और सुंदरीकरण के लिए ठोस योजना बनाई जाएगी?
निष्कर्ष
आस्था और सुरक्षा के बीच छिड़ी इस जंग में फिलहाल प्रशासन बैकफुट पर नज़र आ रहा है। ‘Truth India Times’ मांग करता है कि मकर संक्रांति से पहले केवल कागजी नहीं, बल्कि धरातल पर मजबूत स्नान घाट तैयार किए जाएं। गंगा के इन विलुप्त होते घाटों को बचाना न केवल हमारी धार्मिक ज़िम्मेदारी है, बल्कि यह उन हजारों लोगों के जीवन का सवाल है जो इन घाटों के सहारे पल रहे हैं।
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