गंदगी का अंबार, दवाओं का टोटा और बेबस मरीज; व्यवस्था देख भड़के IAS अमित घोष
उन्नाव | प्रलभ शरण चौधरी (Truth India Times)
उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को चुस्त-दुरुस्त करने के दावों के बीच शुक्रवार को उन्नाव जिला अस्पताल की एक डरावनी तस्वीर सामने आई। जब सूबे के चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव और 1994 बैच के कड़क आईएएस अधिकारी अमित कुमार घोष ने अचानक अस्पताल परिसर में कदम रखा, तो वहां मचे हड़कंप ने खुद-ब-खुद पूरी कहानी बयां कर दी। सफेद एप्रन पहने डॉक्टर गलियों में भागते नजर आए और आनन-फानन में फाइलों को दुरुस्त किया जाने लगा, लेकिन अस्पताल की बदहाली को प्रमुख सचिव की पारखी नजरों से छिपाया नहीं जा सका।
व्यवस्थाओं में ‘कैंसर’: निरीक्षण की मुख्य बिंदु
प्रमुख सचिव अमित घोष ने अस्पताल के हर उस कोने की पड़ताल की, जहां आम आदमी रोज जिल्लत झेलता है। निरीक्षण के दौरान जो खामियां मिलीं, वे केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ जैसी प्रतीत हुईं।
1. ओपीडी में ‘बाजार’ जैसा मंजर, सोशल डिस्टेंसिंग तार-तार
प्रमुख सचिव जैसे ही ओपीडी (OPD) पहुंचे, वहां भारी भीड़ और धक्का-मुक्की देखकर वह दंग रह गए। मरीजों को नियंत्रित करने के लिए न तो कोई क्यू-सिस्टम काम कर रहा था और न ही अस्पताल प्रबंधन की कोई संवेदनशीलता नजर आई। टोकन सिस्टम फेल था और बीमार लोग घंटों तक खड़े रहने को मजबूर थे। प्रमुख सचिव ने अस्पताल प्रबंधन से सीधा सवाल किया— “क्या इंसान इसी तरह इलाज के लिए तरसेंगे?”
2. वार्डों में गंदगी और बदबू का साम्राज्य
अस्पताल के वार्डों में साफ-सफाई की स्थिति इतनी भयावह मिली कि स्वस्थ व्यक्ति भी वहां बीमार पड़ जाए। बेडशीट (चादरें) पीली पड़ चुकी थीं और उन्हें हफ्तों से बदला नहीं गया था। कोनों में लगे कचरे के ढेर और शौचालय से आती दुर्गंध पर प्रमुख सचिव ने सफाई कर्मचारियों और सुपरवाइजर को मौके पर ही जमकर फटकार लगाई। उन्होंने दो टूक कहा कि अगर सफाई नहीं हो सकती, तो जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग इस्तीफा दे दें।
3. ‘दवा नहीं, केवल पर्चा’: मरीजों का छलका दर्द
निरीक्षण के दौरान सबसे ज्यादा नाराजगी दवा वितरण काउंटर पर देखी गई। प्रमुख सचिव ने जब वहां कतार में लगे मरीजों से बात की, तो सच्चाई सामने आई। मरीजों ने आरोप लगाया कि डॉक्टर ऐसी दवाइयां लिख रहे हैं जो अस्पताल के स्टोर में उपलब्ध ही नहीं हैं। गरीब मरीजों को बाहर की प्राइवेट दुकानों से महंगी दवाइयां खरीदने पर मजबूर किया जा रहा है।
4. पैथोलॉजी: जांच रिपोर्ट के लिए ‘अनंत’ इंतजार
अस्पताल की पैथोलॉजी लैब की स्थिति भी दयनीय पाई गई। जांच रिपोर्ट समय पर न मिलने के कारण मरीजों का इलाज लटका रहता है। प्रमुख सचिव ने इस पर गहरी चिंता जताई और इसे मरीजों के मौलिक अधिकार का हनन बताया।
प्रमुख सचिव की चेतावनी: “सुधर जाइए, वरना कुर्सी खाली कीजिए”
निरीक्षण के बाद प्रमुख सचिव अमित कुमार घोष ने जिले के स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ एक बंद कमरे में मैराथन बैठक की। सूत्रों के अनुसार, बैठक का स्वर काफी कड़ा था। घोष ने अधिकारियों को स्पष्ट चेतावनी दी:
- सरकारी अस्पताल गरीबों की रीढ़ हैं, उसे व्यापार का केंद्र न बनाएं।
- बाहर की दवाइयां लिखने वाले डॉक्टरों की लिस्ट तैयार की जाए और उन पर विभागीय कार्रवाई हो।
- अगले निरीक्षण तक यदि बेडशीट, सफाई और दवाइयों की व्यवस्था दुरुस्त नहीं हुई, तो निलंबन (Suspension) की कार्रवाई सीधे शासन स्तर से होगी।
सरकार की साख पर सवाल?
एक तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश को उत्तम स्वास्थ्य सेवाओं का मॉडल बनाने में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्नाव जिला अस्पताल की यह जमीनी हकीकत अधिकारियों की उदासीनता की पोल खोलती है। करोड़ों का बजट आता है, लेकिन वह बजट मरीजों की थाली और दवा तक क्यों नहीं पहुंचता?
Truth India Times जिला प्रशासन और स्वास्थ्य मंत्रालय से सवाल पूछता है— आखिर कब तक ‘औचक निरीक्षण’ के बाद ही व्यवस्थाएं सुधरने का नाटक किया जाएगा? क्या आम जनता को सम्मानजनक और मुफ्त इलाज के लिए हमेशा किसी बड़े अधिकारी के दौरे का इंतजार करना होगा?
प्रकाशित: प्रलभ शरण चौधरी (Truth India Times)
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