शर्मनाक: उन्नाव में मानवता शर्मसार, किराए के 3000 रुपयों के लिए शव को नहीं मिली दो गज ज़मीनशर्मनाक: उन्नाव में मानवता शर्मसार, किराए के 3000 रुपयों के लिए शव को नहीं मिली दो गज ज़मीन
Unnao/Truth India Times Digital Desk
उन्नाव (शुक्लागंज)। उत्तर प्रदेश के उन्नाव से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसे देखकर किसी भी सभ्य समाज का सिर शर्म से झुक जाएगा। एक तरफ सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘गरीब कल्याण’ के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ शुक्लागंज के इंदिरा नगर में महज 3000 रुपये के किराए के लिए एक शव को घर की दहलीज से दुत्कार दिया गया। आलम यह था कि एक विधवा को अपने पति के शव के साथ सड़क के चौराहे पर बैठना पड़ा क्योंकि शहर के किसी कोने में उस बेजान शरीर को रखने के लिए जगह नहीं मिली।
यह घटना सीधे तौर पर प्रशासन और समाज की संवेदनहीनता पर एक तमाचा है।
मकान मालिक की बेरहमी: बीमार पति के साथ घर से निकाला
मृतक विनोद (50) मूल रूप से फतेहपुर का रहने वाला था और पिछले 20 वर्षों से शुक्लागंज में किराए पर रहकर रिक्शा चलाकर अपना पेट पाल रहा था। पत्नी अनीता ने सिसकते हुए बताया कि उसके पति की तबीयत करीब एक हफ्ते पहले खराब हुई थी। आर्थिक तंगी के चलते वह मकान मालिक शुभम सैनी का 3000 रुपये किराया नहीं चुका पाई थी।
आरोप है कि इंसानियत को ताक पर रखकर मकान मालिक ने दो दिन पहले ही बीमार विनोद और उसकी पत्नी को घर से बाहर निकाल दिया था। बेघर अनीता ने किसी तरह अपने पति को कानपुर के अस्पताल में भर्ती कराया, लेकिन बुधवार सुबह विनोद ने दम तोड़ दिया।
चौराहे पर लाश, खामोश सिस्टम और तमाशबीन दुनिया
बुधवार सुबह करीब 8 बजे जब अनीता अपने पति का शव लेकर कानपुर से शुक्लागंज लौटी, तो उसने उम्मीद की थी कि कम से कम अंतिम विदाई के लिए उसे घर के सामने जगह मिल जाएगी। लेकिन आरोप है कि मकान मालिक शुभम सैनी और सामान रखने वाले पुरुषोत्तम, दोनों ने ही शव को अपने घर के पास रखने से मना कर दिया।
हताश और बेबस अनीता अपने पति की लाश को बीच चौराहे पर रखकर बैठ गई। घंटों तक शव सड़क पर पड़ा रहा, सैकड़ों लोग वहां से गुजरे, लेकिन उस गरीब की चीखें किसी के कानों तक नहीं पहुंचीं। यह दृश्य यूपी की कानून-व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है।
सरकार और प्रशासन से कड़वे सवाल
इस घटना ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं जिनका जवाब मुख्यमंत्री और जिले के अधिकारियों को देना चाहिए:
- गरीबों के हक का घर कहाँ है? 20 साल से उन्नाव में रह रहे इस परिवार के पास अपना एक कमरा क्यों नहीं था? क्या प्रधानमंत्री आवास योजना केवल कागजों तक सीमित है?
- किरायेदारों की सुरक्षा का क्या? क्या कोई मकान मालिक महज कुछ रुपयों के लिए किसी बीमार व्यक्ति को सड़क पर मरने के लिए छोड़ सकता है? क्या पुलिस ने इस दबंग मकान मालिक पर कोई कार्रवाई की?
- मानवता का अंतिम संस्कार: क्या एक गरीब की लाश के लिए नगर पालिका या प्रशासन के पास कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है कि उसे चौराहे पर न बैठना पड़े?
जब मदद को आगे आए हाथ
काफी देर तक चौराहे पर मजमा लगा रहा, जिसके बाद सूचना मिलने पर नगर पालिका अध्यक्ष प्रतिनिधि संदीप पांडे मौके पर पहुंचे। उन्होंने स्थिति की गंभीरता और अनीता की बेबसी को देखते हुए तत्काल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई, जिसके बाद विनोद के अंतिम संस्कार की व्यवस्था हो सकी। पुलिस ने भी मौके पर पहुंचकर औपचारिकताएं पूरी कीं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि पुलिस तब कहाँ थी जब बीमार व्यक्ति को घर से निकाला जा रहा था?
निष्कर्ष: सिस्टम की विफलता की कहानी
विनोद की मौत बीमारी से हुई या गरीबी और अपमान से, यह कहना मुश्किल है। लेकिन यह तय है कि उन्नाव की इस घटना ने सिस्टम को बेनकाब कर दिया है। एक तरफ भव्य आयोजन और दूसरी तरफ सड़क पर पड़ी एक गरीब की लाश—यही आज की कड़वी सच्चाई है। अगर आज एक महिला को अपने पति के शव के साथ चौराहे पर बैठना पड़ रहा है, तो समझ लीजिए कि हमारा समाज और हमारी सरकारें नैतिक रूप से दिवालिया हो चुकी हैं।
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