सरकारी जमीन की पैमाइश में 'खेल'
प्रलभ शरण चौधरी | ट्रुथ इंडिया टाइम्स
उन्नाव। उत्तर प्रदेश में योगी सरकार एक ओर भू-माफियाओं के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाते हुए बुलडोजर कार्रवाई और सरकारी संपत्तियों की बहाली का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर उन्नाव प्रशासन के निचले स्तर के अधिकारी और राजस्व टीम इस मंशा को ठेंगा दिखाती नजर आ रही है। जनपद के मझरा पीपरखेड़ा एहतमाली गांव में सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे की जांच और सीमांकन की प्रक्रिया विवादों के घेरे में आ गई है। छह सदस्यीय टीम के गठन के बावजूद मौके पर केवल तीन सदस्यों का पहुंचना और नक्शे से महत्वपूर्ण सड़कों का गायब होना प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
क्या है पूरा मामला?
मझरा पीपरखेड़ा एहतमाली गांव में ग्राम सभा की बेशकीमती भूमि पर अवैध कब्जे का मामला तब गरमाया जब स्थानीय निवासियों ने आईजीआरएस (IGRS) पोर्टल का सहारा लिया। परमसुख खेड़ा निवासी कमलेश ने बीते 26 दिसंबर को शिकायत दर्ज कराई थी कि गाटा संख्या 454 और 455 पर भू-माफियाओं का वर्चस्व बढ़ रहा है। इसी क्रम में शक्ति नगर की दिव्या अवस्थी ने गाटा संख्या 417 (रकबा लगभग 29 बीघा 5 बिस्वा) पर अवैध कब्जे की शिकायत की थी।
इतने बड़े रकबे और गंभीर आरोपों को देखते हुए प्रशासन ने आनन-फानन में छह सदस्यीय विशेष जांच एवं सीमांकन टीम का गठन किया। उम्मीद थी कि मौके पर दूध का दूध और पानी का पानी होगा, लेकिन पहले ही दिन टीम की कार्यशैली ने जांच को संदेह के घेरे में डाल दिया।
आधी-अधूरी टीम और ‘भटकाऊ’ सीमांकन
गुरुवार को जब जांच टीम मौके पर पहुंची, तो वहां का नजारा देख ग्रामीण दंग रह गए। छह सदस्यों की जगह केवल तीन सदस्य ही फील्ड पर उतरे। स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि टीम उस जमीन की पैमाइश ही नहीं कर रही है, जिसकी शिकायत की गई थी। दिव्या अवस्थी का स्पष्ट कहना है कि शिकायत गाटा संख्या 417 की थी, लेकिन टीम किसी अन्य स्थान पर फीता डालकर खानापूर्ति कर रही है। यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि कहीं न कहीं जांच की दिशा मोड़ने और रसूखदारों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।
नक्शे से ‘पोनी रोड’ गायब: राजस्व विभाग की बड़ी लापरवाही
जांच में सबसे बड़ा तकनीकी पेंच तब फंसा जब सर्वे टीम द्वारा लाए गए नक्शे का मिलान धरातल की स्थिति से नहीं हुआ। क्षेत्रीय सभासद प्रतिनिधि उदय कश्यप ने टीम के नक्शे को ‘अपुष्ट’ बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस ‘पोनी रोड’ के सहारे सीमांकन होना था, वह टीम के पास मौजूद नक्शे में अंकित ही नहीं है। बिना मुख्य रास्तों के मिलान के की जा रही पैमाइश केवल एक कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है। अधिकारियों ने अब स्वीकार किया है कि नक्शे में सुधार के बिना सही सीमांकन संभव नहीं है, जिससे जांच में 3-4 दिन का और विलंब होगा।
अवैध निर्माण के समय क्यों मौन था राजस्व विभाग?
ग्रामीणों का आक्रोश केवल वर्तमान जांच तक सीमित नहीं है। लोगों का आरोप है कि जब संबंधित भूमि पर धड़ल्ले से अवैध निर्माण और प्लॉटिंग हो रही थी, तब राजस्व विभाग के लेखपाल और कानूनगो ने अपनी आंखें मूंद रखी थीं। यदि समय रहते कार्रवाई की गई होती, तो आज 29 बीघा सरकारी जमीन को बचाने के लिए इस तरह की जटिल स्थिति पैदा न होती।
आईजीआरएस की समय सीमा समाप्त, रिपोर्ट का क्या होगा?
एक और गंभीर पहलू यह है कि आईजीआरएस पोर्टल पर दर्ज इन शिकायतों की रिपोर्ट सबमिट करने की अंतिम तिथि गुरुवार ही थी। अब सवाल यह उठता है कि जब जांच ही अधूरी है और सीमांकन में भारी भ्रम की स्थिति बनी हुई है, तो राजस्व विभाग ऑनलाइन क्या रिपोर्ट लगाएगा? क्या एक बार फिर ‘मामला विचाराधीन है’ लिखकर शिकायतों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
जनता की मांग: पारदर्शिता और निष्पक्षता
शिकायतकर्ता कमलेश और दिव्या अवस्थी ने जिला प्रशासन से मांग की है कि:
- गठित की गई पूरी छह सदस्यीय टीम की उपस्थिति में दोबारा पारदर्शी सीमांकन कराया जाए।
- पैमाइश के दौरान शिकायतकर्ताओं को विधिवत सूचना दी जाए और उनकी उपस्थिति सुनिश्चित की जाए।
- त्रुटिपूर्ण नक्शे के बजाय वास्तविक और अपडेटेड नक्शे का उपयोग हो।
- लापरवाही बरतने वाले राजस्व कर्मियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
उन्नाव का यह मामला केवल एक जमीन का विवाद नहीं है, बल्कि यह सरकारी तंत्र की साख का सवाल है। अगर इतनी बड़ी ग्राम सभा की भूमि पर कब्जे की जांच इसी तरह ‘आधी-अधूरी’ रही, तो भू-माफियाओं के हौसले और बुलंद होंगे। अब देखना यह है कि जिलाधिकारी इस मामले में हस्तक्षेप कर दोषियों पर नकेल कसते हैं या फिर सरकारी जमीन फाइलों के फेर में यूं ही गुम हो जाती है।
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