बरामदगी में गिरफ्तारी को माना 'अवैध'
प्रलभ शरण चौधरी | ट्रुथ इंडिया टाइम्स
उन्नाव। उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। गांजा बरामदगी के एक मामले में न्यायालय ने पुलिस की कार्रवाई को पूरी तरह ‘अवैध’ करार देते हुए अभियुक्त को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट ने रिमांड मेमो और बरामदगी फर्द में ऐसी गंभीर प्रक्रियागत कमियां पाईं, जिससे पुलिस की पूरी कहानी संदिग्ध नजर आई। स्थिति यह बनी कि कोर्ट के कड़े रुख के बाद पुलिस को युवक को सम्मानपूर्वक घर छोड़ना पड़ा।
क्या था पुलिस का दावा?
पुलिस के आधिकारिक बयान के अनुसार, यह मामला 22 फरवरी 2024 का है। एसआई लक्ष्मी नारायण द्विवेदी, सुभाष चंद्र, हेड कांस्टेबल जितेंद्र और लोकेंद्र की टीम गंगाबैराज रोड पर प्रखर जी महाराज मोड़ के पास संदिग्ध व्यक्तियों और वाहनों की चेकिंग कर रही थी। पुलिस ने दावा किया कि इसी दौरान शुक्लागंज निवासी विजय अवस्थी को घेराबंदी कर पकड़ा गया।
पुलिस की फर्द बरामदगी रिपोर्ट के मुताबिक, विजय के कब्जे से 4 किलोग्राम अवैध गांजा बरामद हुआ था। इस आधार पर पुलिस ने अभियुक्त के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट (NDPS Act) की धारा 8/20 के तहत मुकदमा दर्ज किया और उसे जेल भेजने की तैयारी करते हुए न्यायालय में पेश किया।
कोर्ट में कैसे खुली पुलिस की पोल?
चूंकि गिरफ्तारी के बाद पेशी का दिन रविवार था, इसलिए ग्राम न्यायालय हसनगंज के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रतीक गुप्ता रिमांड ड्यूटी पर थे। अभियुक्त पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज सिंह चंदेल ने पुलिस की पूरी कार्रवाई को चुनौती दी। बचाव पक्ष ने न्यायालय के सामने वे सभी तकनीकी और कानूनी खामियां रखीं, जिन्हें आमतौर पर पुलिस “जल्दबाजी” का नाम देकर नजरअंदाज कर देती है।
अधिवक्ता मनोज सिंह चंदेल ने आरोप लगाया कि यह पूरा मामला फर्जी है। उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पुलिसकर्मियों ने पहले युवक से अवैध धन (पैसों) की मांग की थी। जब मांग पूरी नहीं हुई, तो उसे ‘एनकाउंटर’ की धमकी दी गई और अंततः झूठे एनडीपीएस मामले में फंसा दिया गया।
वे 5 बड़ी खामियां, जिन्होंने गिरफ्तारी को ‘अवैध’ बनाया
न्यायालय ने जब पुलिस द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों (रिमांड मेमो, फर्द बरामदगी और चालानी रिपोर्ट) की बारीकी से जांच की, तो पुलिस की दलीलें ताश के पत्तों की तरह ढह गईं। कोर्ट ने निम्नलिखित बिंदुओं को गंभीर माना:
- हस्ताक्षर का अभाव: जिस फर्द बरामदगी रिपोर्ट पर अभियुक्त के हस्ताक्षर होने अनिवार्य थे, वहां अभियुक्त के हस्ताक्षर ही नहीं पाए गए।
- अस्पष्ट सूचना: कानूनी प्रक्रिया के अनुसार गिरफ्तारी की सूचना परिजनों को देना अनिवार्य है। फर्द के सूचना वाले कॉलम में पुलिस ने केवल “गंगाघाट” लिख दिया था, जबकि वहां स्पष्ट विवरण और संपर्क सूत्र होना चाहिए था।
- समय में विरोधाभास: गिरफ्तारी का समय और बरामदगी का समय आपस में मेल नहीं खा रहा था, जिससे पूरी घटना की सत्यता पर सवाल खड़ा हो गया।
- सैंपल की कमी: नियमानुसार बरामद माल का नमूना (Sample) मौके पर लिया जाना चाहिए था, जो कि इस मामले में नहीं किया गया था।
- प्रक्रियागत चूक: रिमांड मेमो तैयार करने में उन विधिक प्रावधानों की अनदेखी की गई थी जो किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े होते हैं।
कोर्ट का कड़ा फैसला: “गिरफ्तारी अवैध”
इन गंभीर त्रुटियों को देखते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रतीक गुप्ता ने पुलिस की गिरफ्तारी को ‘अवैध’ घोषित कर दिया। न्यायालय ने पुलिस की रिमांड अर्जी को सिरे से खारिज करते हुए रिमांड मेमो निरस्त कर दिया। कोर्ट के इस आदेश के बाद पुलिस के पास कोई कानूनी आधार नहीं बचा, जिसके कारण उन्हें विजय अवस्थी को तुरंत रिहा करना पड़ा।
पुलिस महकमे में हड़कंप
इस फैसले के बाद उन्नाव पुलिस की काफी किरकिरी हो रही है। एनडीपीएस जैसे गंभीर मामले में इतनी लापरवाही बरतना पुलिस की कार्यक्षमता पर सवाल उठाता है। हालांकि, पुलिस के आला अधिकारियों ने अभी तक अधिवक्ता द्वारा लगाए गए ‘रिश्वत और धमकी’ के आरोपों पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन कोर्ट के इस रुख ने विवेचना अधिकारियों की मुश्किल जरूर बढ़ा दी है।
यह मामला कानून के छात्रों और पुलिस कर्मियों के लिए एक नजीर है कि यदि विधिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया, तो कितनी भी बड़ी बरामदगी क्यों न हो, वह न्यायालय में टिक नहीं पाएगी।
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