आयोजकों और प्रशासन में ठनी
प्रलभ शरण चौधरी | ट्रुथ इंडिया टाइम्स
उन्नाव। आस्था के महापर्व महाशिवरात्रि से पूर्व उन्नाव जनपद में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। दशकों से निकलने वाली पारंपरिक ‘शिव शोभा यात्रा’ की अनुमति को लेकर आयोजन समिति और जिला प्रशासन के बीच गतिरोध गहरा गया है। जहां एक ओर प्रशासन सुरक्षा और सुचारू यातायात का हवाला देते हुए लिखित अनुमति और कड़े नियमों की शर्त रख रहा है, वहीं दूसरी ओर आयोजक समिति का तर्क है कि पिछले 43 वर्षों से यह यात्रा बिना किसी औपचारिक अनुमति के निर्बाध रूप से निकलती आ रही है, तो इस बार ‘नई परंपरा’ क्यों डाली जा रही है?
43 साल पुरानी परंपरा और आयोजकों का तर्क
उन्नाव के मुख्य मार्गों से निकलने वाली शिव शोभा यात्रा शहर की पहचान बन चुकी है। आयोजन समिति के पदाधिकारियों ने कलेक्ट्रेट परिसर में मीडिया से बात करते हुए अपना पक्ष मजबूती से रखा। समिति के वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि 1980 के दशक से यह यात्रा अनवरत निकल रही है। इन चार दशकों में कभी भी प्रशासन ने लिखित अनुमति की अनिवार्यता नहीं जताई थी।
आयोजकों का आरोप है कि प्रशासन अब नई नियमावली का हवाला देकर धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहा है। उनका कहना है कि यात्रा का मार्ग, समय और रूपरेखा दशकों से तय है, जिसे पूरा शहर जानता है। ऐसे में अचानक अनुमति की फाइलें दौड़वाना और कड़े हलफनामे मांगना आयोजकों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने जैसा है।
प्रशासन का रुख: ‘सुरक्षा सर्वोपरि’
दूसरी ओर, जिला प्रशासन इस मामले में झुकने को तैयार नहीं दिख रहा है। जिलाधिकारी और पुलिस प्रशासन का स्पष्ट कहना है कि वर्तमान समय में भीड़ प्रबंधन (Crowd Management) और सुरक्षा की चुनौतियां बदल गई हैं। हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में शोभा यात्राओं के दौरान हुई छिटपुट घटनाओं को देखते हुए शासन ने सख्त निर्देश जारी किए हैं कि किसी भी सार्वजनिक आयोजन के लिए विधिवत अनुमति और रूट चार्ट का होना अनिवार्य है।
प्रशासन का कहना है कि वे यात्रा पर रोक नहीं लगा रहे, बल्कि उसे व्यवस्थित करना चाहते हैं। प्रशासन ने आयोजकों से निम्नलिखित विवरण मांगे हैं:
- रूट मैप: यात्रा किन-किन संवेदनशील इलाकों से गुजरेगी।
- वॉलिंटियर्स की सूची: भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आयोजकों के कितने लोग तैनात रहेंगे।
- ध्वनि विस्तारक यंत्र: डीजे और लाउडस्पीकर की आवाज निर्धारित मानकों के भीतर रखने का शपथ पत्र।
विवाद की जड़: नई प्रक्रिया या अनावश्यक दबाव?
आयोजन समिति का कहना है कि अनुमति की प्रक्रिया इतनी जटिल बना दी गई है कि कम समय में सभी औपचारिकताओं को पूरा करना संभव नहीं है। समिति के एक पदाधिकारी ने कहा, “हमने हमेशा प्रशासन का सहयोग किया है, लेकिन इस बार पुलिस और राजस्व विभाग के अधिकारी ऐसे पेश आ रहे हैं जैसे हम कोई अवैध काम कर रहे हों। 43 सालों में एक भी अप्रिय घटना नहीं हुई, फिर इस बार इतना अविश्वास क्यों?”
शहर के गणमान्य नागरिकों ने भी इस विवाद पर चिंता जताई है। उनका मानना है कि अगर समय रहते बीच का रास्ता नहीं निकाला गया, तो महाशिवरात्रि के दिन शहर की शांति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। विवाद के चलते शोभा यात्रा की तैयारियों में लगे कलाकारों और झांकी निर्माताओं के बीच भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
हिंदू संगठनों का समर्थन और आंदोलन की चेतावनी
इस विवाद में अब विभिन्न हिंदू संगठनों ने भी कूदने का मन बना लिया है। संगठनों का कहना है कि यदि परंपरा को बाधित करने की कोशिश की गई, तो वे सामूहिक रूप से प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने प्रशासन को चेतावनी दी है कि वे आस्था के मार्ग में ‘लाल फीताशाही’ (Bureaucracy) बर्दाश्त नहीं करेंगे।
बैठकों का दौर जारी है, लेकिन अभी तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है। प्रशासन ने आयोजकों को साफ कर दिया है कि बिना अनुमति के सड़क पर कोई भी बड़ा जमावड़ा कानून का उल्लंघन माना जाएगा, जिसके लिए आयोजक व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे।
क्या निकलेगा समाधान?
जानकारों का मानना है कि इस मामले में राजनीति भी गर्मा सकती है। विपक्षी दल इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बता सकते हैं, जबकि सत्ता पक्ष के नेता प्रशासन और जनता के बीच सामंजस्य बिठाने की कोशिश में जुटे हैं। फिलहाल, पूरा शहर इस बात का इंतजार कर रहा है कि क्या 18 फरवरी को शिवजी की सवारी उसी भव्यता के साथ निकलेगी, या फिर सिस्टम की फाइलों में यह परंपरा दबी रह जाएगी।
उन्नाव की जनता और शिव भक्त उम्मीद कर रहे हैं कि जिलाधिकारी और आयोजन समिति के बीच एक ‘बीच का रास्ता’ निकलेगा, जिससे सुरक्षा भी बनी रहे और 43 साल की आस्था भी खंडित न हो।
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