गेल इंडिया गैस प्लांट में लीकेज से मचा हड़कंप
प्रलभ शरण चौधरी, ट्रुथ इंडिया टाइम्स
उन्नाव (अचलगंज): औद्योगिक सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के तमाम दावों के बीच बुधवार को उन्नाव के अचलगंज थाना क्षेत्र स्थित गेल इंडिया (GAIL India) के लोहचा गैस प्लांट में हुई गैस लीकेज की घटना ने प्रशासन और स्थानीय निवासियों की सांसें अटका दीं। हालांकि, फिलहाल स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है, लेकिन इस घटना ने औद्योगिक क्षेत्रों में सुरक्षा ऑडिट और आपातकालीन तैयारियों की पोल खोलकर रख दी है।
दहशत का बुधवार: जब हवाओं में घुली चिंता
बुधवार दोपहर जब लोहचा स्थित गेल इंडिया के प्लांट से गैस रिसाव की सूचना बाहर आई, तो आसपास के ग्रामीण इलाकों में हड़कंप मच गया। गैस की गंध और अनहोनी की आशंका के चलते लोग घरों से बाहर निकल आए। सूचना मिलते ही अचलगंज पुलिस और फायर सर्विस की टीमें सायरन बजाती हुई मौके पर पहुँचीं। पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी गई और प्लांट के भीतर बाहरी लोगों का प्रवेश तत्काल रोक दिया गया।
तकनीकी खराबी या लापरवाही?
प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, रिसाव पाइपलाइन या किसी वाल्व में तकनीकी खराबी के कारण हुआ। लेकिन सवाल यह उठता है कि गेल इंडिया जैसे महारत्न सार्वजनिक उपक्रम (PSU) के प्लांट में, जहाँ सुरक्षा के ‘जीरो टॉलरेंस’ मानक होने चाहिए, वहां ऐसी खराबी कैसे आई?
तकनीकी टीम ने घंटों की मशक्कत के बाद दबाव को नियंत्रित किया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रिसाव का समय पर पता न चलता, तो यह एक बड़ी औद्योगिक त्रासदी का रूप ले सकता था।
सरकार और प्रशासन की जवाबदेही पर ‘ट्रुथ इंडिया टाइम्स’ के तीखे सवाल
इस घटना ने सीधे तौर पर केंद्र और राज्य सरकार के औद्योगिक सुरक्षा विभागों को कठघरे में खड़ा कर दिया है:
- नियमित सुरक्षा ऑडिट का अभाव: क्या इस प्लांट का हाल ही में कोई ‘थर्ड पार्टी’ सुरक्षा ऑडिट हुआ था? यदि हाँ, तो पाइपलाइन या उपकरणों की जर्जर स्थिति को पहले क्यों नहीं पहचाना गया?
- बफर ज़ोन और रिहायशी इलाका: प्लांट के आसपास बढ़ती आबादी के बावजूद, क्या प्रशासन ने गैस रिसाव जैसी स्थिति के लिए ग्रामीणों को प्रशिक्षित किया है? मॉक ड्रिल केवल कागजों पर क्यों सिमट कर रह जाती है?
- प्रबंधन की पारदर्शिता: गैस रिसाव शुरू होने और पुलिस को सूचना देने के बीच कितना ‘लैग टाइम’ (समय का अंतर) था? क्या प्रबंधन ने शुरू में इसे दबाने की कोशिश की?
- प्रदूषण और स्वास्थ्य पर प्रभाव: गैस लीकेज से पर्यावरण और स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर क्या तात्कालिक प्रभाव पड़ा, इसकी जांच के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम अब तक सक्रिय क्यों नहीं हुई?
स्थानीय लोगों में आक्रोश: “हम बारूद के ढेर पर बैठे हैं”
लोहचा और आसपास के ग्रामीणों का कहना है कि वे हर वक्त एक अनजाने डर के साये में जीते हैं। प्रदर्शन कर रहे स्थानीय युवाओं ने कहा, “विकास के नाम पर प्लांट तो लगा दिए गए, लेकिन हमारी जान की सुरक्षा के लिए न तो यहाँ कोई बड़ा अस्पताल है और न ही गैस रिसाव से बचने के आधुनिक उपकरण। अगर आज कुछ बड़ा हो जाता, तो इसका जिम्मेदार कौन होता?”
पुलिस और फायर सर्विस की तत्परता
निश्चित रूप से, अचलगंज पुलिस और फायर सर्विस के जवानों ने त्वरित कार्रवाई कर स्थिति को बिगड़ने से बचाया। थाना प्रभारी ने बताया कि सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस बल अभी भी मौके पर तैनात है। जब तक तकनीकी टीम पूरी तरह ‘ग्रीन सिग्नल’ नहीं दे देती, तब तक प्लांट के संवेदनशील हिस्सों में आवाजाही प्रतिबंधित रहेगी।
निष्कर्ष: अब सख्त कार्रवाई की जरूरत
उन्नाव का यह गैस रिसाव मामला एक चेतावनी है। सरकार को केवल “स्थिति नियंत्रण में है” कहकर पल्ला नहीं झाड़ना चाहिए। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय को इस मामले में उच्च स्तरीय जांच के आदेश देने चाहिए। यदि यह रखरखाव (Maintenance) में लापरवाही का मामला है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और उन पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
जनता की जान की कीमत पर औद्योगिक प्रगति को स्वीकार नहीं किया जा सकता। क्या शासन इस घटना से सबक लेकर प्रदेश के अन्य गैस प्लांटों का सुरक्षा निरीक्षण कराएगा, या फिर किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार किया जाएगा?
ट्रुथ इंडिया टाइम्स के लिए प्रलभ शरण चौधरी की विशेष रिपोर्ट।
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