हर्षित द्विवेदी चले 2000 साल पुराने सफर पर
प्रलभ शरण चौधरी, ट्रुथ इंडिया टाइम्स
उन्नाव (बांगरमऊ): जब हौसले लहरों से ऊंचे हों और इरादे चट्टानों जैसे मजबूत, तो इतिहास खुद-ब-खुद अपनी राह बनाता है। उन्नाव जिले के बांगरमऊ का नाम आज भारतीय नौसेना के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है। यहाँ के लाल, नौसैनिक हर्षित द्विवेदी, भारतीय नौसेना के उस विशिष्ट 18 सदस्यीय दल का हिस्सा बने हैं, जो प्राचीन भारतीय नौवहन कला को पुनर्जीवित करने के लिए INSV कौंडिन्य के जरिए पोरबंदर से मस्क़त (ओमान) की ऐतिहासिक यात्रा पर निकले हैं।
बांगरमऊ के कटरा से मस्क़त तक का सफर
मोहल्ला कटरा निवासी कृष्ण मुरारी द्विवेदी के पुत्र हर्षित की यह यात्रा केवल एक समुद्री मिशन नहीं, बल्कि एक साधारण परिवार के युवक के असाधारण सपनों की उड़ान है। आरआरडीएस इंटर कॉलेज से शिक्षा प्राप्त करने वाले हर्षित ने 2016 में नौसेना ज्वाइन की थी। 9 वर्षों के कठिन परिश्रम और अटूट अनुशासन के बल पर आज उन्हें भारत की 2000 साल पुरानी समुद्री विरासत को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का मौका मिला है।
बीते सोमवार को जब पोरबंदर तट से ओमान के राजदूत ईसा सालेह अल शिबानी की उपस्थिति में इस अभियान को हरी झंडी दिखाई गई, तो पूरा उन्नाव गर्व से भर उठा।
INSV कौंडिन्य: बिना कील का जहाज और हमारी प्राचीन इंजीनियरिंग
यह मिशन तकनीकी रूप से जितना कठिन है, ऐतिहासिक रूप से उतना ही महत्वपूर्ण। INSV कौंडिन्य कोई साधारण जहाज नहीं है। इसे “स्टिच्ड-प्लैंक” (Stitched-Plank) तकनीक से बनाया गया है, जिसमें लकड़ी के तख्तों को लोहे की कीलों के बजाय रस्सियों से सिला जाता है।
यह वही तकनीक है जिससे सदियों पहले भारतीय व्यापारी और नाविक अरब सागर को पार कर व्यापार किया करते थे। करीब 1400 किलोमीटर की यह यात्रा यह सिद्ध करने के लिए है कि आधुनिक मशीनों के बिना भी भारतीय पूर्वजों के पास ऐसी इंजीनियरिंग थी, जो समुद्र की प्रचंड लहरों को मात दे सकती थी।
सरकार की जवाबदेही और ‘मैरीटाइम’ विजन पर सवाल
हर्षित द्विवेदी जैसे युवाओं की उपलब्धि सराहनीय है, लेकिन ‘ट्रुथ इंडिया टाइम्स’ इस मिशन के बहाने कुछ गंभीर सवाल भी उठाता है:
- शिक्षा और कौशल विकास: हर्षित ने स्थानीय इंटर कॉलेज से पढ़ाई कर यह मुकाम पाया। क्या सरकार उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे तकनीकी और रक्षा प्रशिक्षण केंद्र खोल रही है, जहाँ से और भी ‘हर्षित’ निकल सकें? प्रतिभा केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
- समुद्री विरासत का संरक्षण: भारत का 7,500 किलोमीटर से लंबा तटवर्ती क्षेत्र है। वर्षों तक हमारी समुद्री शक्ति को भुला दिया गया। सरकार को जवाब देना चाहिए कि क्या यह मिशन केवल एक सांकेतिक यात्रा है या फिर हमारी प्राचीन नौवहन तकनीकों को आधुनिक स्टार्टअप्स और शिपिंग इंडस्ट्री में शामिल करने की कोई ठोस नीति है?
- सुरक्षा और सुविधाएं: ऐसे जोखिम भरे मिशनों पर जाने वाले नौसैनिकों के परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा और सम्मान की एक स्थायी नीति होनी चाहिए, ताकि देश सेवा का जज्बा और मजबूत हो।
“भारत को फिर से जगतगुरु बनाना लक्ष्य”
मिशन पर रवाना होने से पहले हर्षित ने दूरभाष पर बताया कि उनका उद्देश्य केवल ओमान पहुँचना नहीं है, बल्कि दुनिया को यह दिखाना है कि भारत के पास वह ज्ञान था, जिसे आज का आधुनिक विज्ञान भी अचंभित होकर देखता है। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपनी माता सुमन द्विवेदी, पिता और गुरुजनों को दिया।
बांगरमऊ में उनके आवास पर जश्न का माहौल है। सैकड़ों लोग उनके माता-पिता को बधाई देने पहुँच रहे हैं। लोगों का कहना है कि हर्षित ने न केवल जिले का, बल्कि पूरे देश का मान बढ़ाया है।
निष्कर्ष
हर्षित द्विवेदी और INSV कौंडिन्य का यह सफर हमें याद दिलाता है कि हमारी जड़ें कितनी गहरी और गौरवशाली हैं। एक ओर जहाँ हर्षित जैसे नौसैनिक समंदर की लहरों को चीरकर इतिहास लिख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार और समाज की यह जिम्मेदारी है कि वे ऐसी प्रतिभाओं को उचित मंच और प्रोत्साहन प्रदान करें।
भारत को ‘ब्लू इकोनॉमी’ और समुद्री शक्ति बनाने के लिए केवल जहाजों की नहीं, बल्कि हर्षित जैसे दृढ़निश्चयी युवाओं की जरूरत है। हम इस बहादुर चालक दल की सुरक्षित और सफल यात्रा की मंगल कामना करते हैं।
ट्रुथ इंडिया टाइम्स के लिए प्रलभ शरण चौधरी की विशेष रिपोर्ट।
About The Author
Discover more from Truth India Times
Subscribe to get the latest posts sent to your email.