उन्नाव पुलिस की बड़ी कामयाबी: साइबर ठगों के चंगुल से छुड़ाए 12.99 लाख रुपये, पर क्या सुरक्षित है आपका डिजिटल डेटा?
प्रलभ शरण चौधरी, ट्रुथ इंडिया टाइम्स
उन्नाव: डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहाँ एक ओर बैंकिंग सुविधाएं उंगलियों पर सिमट आई हैं, वहीं दूसरी ओर साइबर अपराधियों का जाल भी गहराता जा रहा है। इसी बीच उन्नाव पुलिस के साइबर सेल ने एक बड़ी सफलता हासिल करते हुए ठगी के शिकार हुए एक सरकारी कर्मचारी के करीब 13 लाख रुपये वापस कराकर पुलिसिंग की एक मिसाल पेश की है। पुलिस अधीक्षक जयप्रकाश सिंह के नेतृत्व में साइबर सेल ने जिस तत्परता से काम किया, उससे पीड़ित के घर की खुशियाँ लौट आई हैं।
क्या था पूरा मामला?
मामला उन्नाव के अचलगंज स्थित राजकीय कृषि बीज भंडार में कार्यरत सुनील कुमार से जुड़ा है। सुनील कुमार, जो मूल रूप से हरदोई के रहने वाले हैं, एक झटके में अपनी जीवन भर की कमाई खोने की कगार पर पहुँच गए थे। 31 मार्च 2025 को अज्ञात हैकर्स ने उनका फोन हैक कर लिया और पलक झपकते ही उनके बैंक खाते से 14,99,970 रुपये पार कर दिए।
करीब 15 लाख रुपये की बड़ी रकम गायब होने के बाद पीड़ित ने तत्काल साइबर थाना उन्नाव में गुहार लगाई। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आईटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया और जाँच शुरू की।
पुलिस की तकनीकी दक्षता और रिकवरी का सफर
साइबर थाना पुलिस ने इस मामले में दो चरणों में रिकवरी की:
- तत्काल कार्रवाई: शिकायत मिलने के तुरंत बाद पुलिस टीम ने संबंधित बैंकों से संपर्क साधा और ट्रांजैक्शन को फ्रीज कराया। प्रारंभिक चरण में ही 1 लाख रुपये सुरक्षित कर लिए गए।
- तकनीकी विवेचना: प्रभारी निरीक्षक राजेश पाठक और उनकी टीम ने डेटा विश्लेषण, बैंक ट्रांजैक्शन ट्रेल और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर बाकी की रकम का पीछा किया। कड़ी मशक्कत के बाद शेष 11,99,970 रुपये भी वापस कराने में सफलता प्राप्त की।
इस तरह पुलिस ने कुल 12.99 लाख रुपये सुरक्षित रूप से पीड़ित के खाते में वापस पहुँचा दिए। पुलिस की इस कार्यप्रणाली ने जनता में विश्वास तो जगाया है, लेकिन इस घटना ने कई अनसुलझे सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
सिस्टम की जवाबदेही: क्या सिर्फ रिकवरी काफी है?
भले ही उन्नाव पुलिस ने सराहनीय कार्य किया है, लेकिन ‘ट्रुथ इंडिया टाइम्स’ इस खबर के जरिए सरकार और बैंकिंग सिस्टम की जवाबदेही पर भी सवाल उठाता है:
- डेटा सुरक्षा का सवाल: पीड़ित सुनील कुमार का फोन हैक कैसे हुआ? क्या हमारे टेलीकॉम ऑपरेटर और सॉफ्टवेयर कंपनियां नागरिकों के डेटा की सुरक्षा करने में विफल हो रही हैं? सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि आम आदमी का डिवाइस अभेद्य हो।
- बैंकों की ढुलमुल सुरक्षा: 15 लाख रुपये जैसी बड़ी राशि एक बार में निकल जाना बैंकों के ‘फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम’ पर सवाल उठाता है। क्या बैंकों के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जो असामान्य रूप से होने वाले बड़े ट्रांजैक्शन को खुद रोक सके?
- साइबर थानों की स्थिति: उन्नाव में तो सफलता मिल गई, लेकिन प्रदेश के कई जिलों में साइबर थाने आज भी संसाधनों और विशेषज्ञ तकनीकी स्टाफ की कमी से जूझ रहे हैं। सरकार को हर जिले में अत्याधुनिक साइबर लैब स्थापित करने की आवश्यकता है।
इन योद्धाओं ने दिलाई सफलता
इस जटिल केस को सुलझाने वाली टीम में प्रभारी निरीक्षक राजेश पाठक, निरीक्षक राजेश कुमार मिश्रा, उपनिरीक्षक सुभाष चन्द्र, मुख्य आरक्षी अजय पाल, तरुण कुमार सिंह, राधेश्याम, आरक्षी शमसुद्दीन, गोपाल द्विवेदी, पंकज यादव, संजय कुमार और महिला मुख्य आरक्षी कुंती अग्रवाल शामिल रहे। इन अधिकारियों की दिन-रात की मेहनत का ही परिणाम है कि आज अपराधी बैकफुट पर हैं।
पुलिस अधीक्षक की अपील: ‘गोल्डन ऑवर’ का रखें ध्यान
पुलिस अधीक्षक जयप्रकाश सिंह ने आम जनता से अपील की है कि साइबर ठगी होने के बाद शुरुआती 1-2 घंटे यानी ‘गोल्डन ऑवर’ सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। यदि आपके साथ कोई ठगी होती है, तो तुरंत 1930 नंबर पर कॉल करें या नजदीकी साइबर थाने को सूचित करें। आपकी सतर्कता ही आपकी पूंजी बचा सकती है।
निष्कर्ष
उन्नाव पुलिस की यह कार्रवाई प्रशंसनीय है, लेकिन सरकार को ‘प्रिवेंशन इज बेटर देन क्योर’ (बचाव ही इलाज से बेहतर है) की तर्ज पर काम करना होगा। जब तक साइबर अपराधियों के गिरोह की जड़ तक पहुँचकर उन्हें खत्म नहीं किया जाता, तब तक हर नागरिक का बैंक खाता खतरे में है। डिजिटल इंडिया को सुरक्षित इंडिया बनाना अब सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
ट्रुथ इंडिया टाइम्स के लिए प्रलभ शरण चौधरी की विशेष रिपोर्ट।
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