एंबुलेंस के लिए तरसते ग्रामीण
प्रलभ शरण चौधरी | ट्रुथ इंडिया टाइम्स
बांदा। एक तरफ जहां देश और प्रदेश की सरकारें ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘गाम-गाम तक पक्की सड़क’ का ढिंढोरा पीट रही हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के बांदा जिले से आई एक तस्वीर इन दावों की कलई खोलती नजर आ रही है। जिले की अतर्रा तहसील अंतर्गत तुर्रा ग्राम पंचायत का ‘वकीलन पुरवा’ आज भी आदिम युग की समस्याओं से जूझ रहा है। यहाँ के ग्रामीणों के लिए एक अदद पक्की सड़क आज भी किसी सपने जैसी है। स्थिति इतनी भयावह है कि किसी की तबीयत बिगड़ने पर उसे अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस नहीं, बल्कि गांव की पुरानी ‘चारपाई’ ही एकमात्र सहारा बचती है।
मुख्य मार्ग से कटा वकीलन पुरवा: 3 किमी का सफर बना ‘काल’
ग्रामीणों की सबसे बड़ी व्यथा बस्ती से मुख्य सड़क को जोड़ने वाला वह तीन किलोमीटर का रास्ता है, जो दशकों से कच्चा और ऊबड़-खाबड़ पड़ा है। इस रास्ते पर न तो कभी मिट्टी डाली गई और न ही खड़ंजा बिछाया गया। पथरीले और ऊबड़-खाबड़ रास्ते के कारण मोटरसाइकिल चलाना तो दूर, पैदल चलना भी दूभर है।
ग्रामीणों का कहना है कि जब कोई बीमार पड़ता है या किसी गर्भवती महिला को प्रसव के लिए अस्पताल ले जाना होता है, तो उनकी रूह कांप जाती है। गांव तक एंबुलेंस आने का कोई रास्ता नहीं है। मजबूरन, मरीज को चारपाई पर लिटाया जाता है और गांव के चार लोग उसे अपने कंधों पर उठाकर तीन किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य सड़क तक ले जाते हैं। कई बार इस देरी और झटकों के कारण मरीज की स्थिति रास्ते में ही अत्यंत गंभीर हो जाती है।
बरसात में ‘टापू’ बन जाती है बस्ती
गर्मी के दिनों में तो किसी तरह ग्रामीण इस धूल भरे रास्ते से निकल जाते हैं, लेकिन मानसून के दस्तक देते ही वकीलन पुरवा का संपर्क पूरी दुनिया से कट जाता है। कच्ची मिट्टी कीचड़ में तब्दील हो जाती है, जिससे चार पहिया वाहनों का आना असंभव हो जाता है। ग्रामीणों ने बताया कि बरसात में अगर कोई गंभीर रूप से बीमार हो जाए, तो भगवान ही मालिक है। बच्चों को स्कूल जाने में और किसानों को अपनी उपज मंडी तक ले जाने में भारी आर्थिक और शारीरिक क्षति झेलनी पड़ती है।
सिस्टम की बेरुखी: प्रधान और सचिव पर लापरवाही के आरोप
वकीलन पुरवा के निवासियों में स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ भारी आक्रोश है। ग्रामीण सुनीता, रोशनी, लवकुश और लोकेंद्र ने सीधे तौर पर ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव पर लापरवाही का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन वोट मिलने के बाद कोई पलटकर भी नहीं देखता।
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार लिखित और मौखिक रूप से ग्राम पंचायत में गुहार लगाई, लेकिन बजट का रोना रोकर या फाइलों को दबाकर उनकी समस्या को नजरअंदाज किया गया। अजीत, अभिलाष, शिव कुमार, सर्वेश और पवन मिश्रा सहित 50 से अधिक ग्रामीणों ने एक स्वर में कहा कि यदि जल्द ही सड़क का निर्माण शुरू नहीं हुआ, तो वे सामूहिक रूप से प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे।
प्रशासन का पक्ष: जल्द सुधार का आश्वासन
जब इस मामले को लेकर प्रशासन से संपर्क किया गया, तो ग्राम पंचायत सचिव विंध्यवासिनी ने स्वीकार किया कि यह एक गंभीर मानवीय समस्या है। सचिव ने आश्वासन देते हुए कहा कि मामला उनके संज्ञान में है और वे जल्द ही इस पर संज्ञान लेकर रास्ते को दुरुस्त करवाने की प्रक्रिया शुरू करेंगी। उन्होंने कहा कि प्राथमिकता के आधार पर पहले रास्ते पर मिट्टी डलवाई जाएगी ताकि आवागमन सुलभ हो सके, उसके बाद पक्की सड़क के लिए प्रस्ताव भेजा जाएगा।
सवाल जो जवाब मांगते हैं
वकीलन पुरवा की यह दास्तां केवल एक गांव की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस तंत्र पर तमाचा है जो अंत्योदय (अंतिम व्यक्ति का उदय) की बात करता है।
- क्या 21वीं सदी के भारत में किसी मरीज का चारपाई पर ढोया जाना स्वीकार्य है?
- क्या ग्राम पंचायत के पास इतना भी फंड नहीं कि तीन किलोमीटर का रास्ता चलने लायक बनाया जा सके?
- जिम्मेदार अधिकारियों की नींद तब क्यों खुलती है जब मामला मीडिया में आता है?
ग्रामीणों ने अब जिला प्रशासन और जिलाधिकारी बांदा से मांग की है कि इस मामले में हस्तक्षेप कर तत्काल प्रभाव से सड़क निर्माण का कार्य शुरू कराया जाए ताकि वकीलन पुरवा के लोगों को भी सम्मानजनक जीवन और स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें।
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