वर्क-लाइफ बैलेंस पर बहस तेज, ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ बिल से कॉर्पोरेट जगत में मंथन

देश में वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ नामक प्रस्तावित बिल ने कॉर्पोरेट सेक्टर का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

इस बिल का उद्देश्य कर्मचारियों को काम के समय के बाहर ऑफिस कॉल, मैसेज और ई-मेल से राहत दिलाना है। कर्मचारियों का मानना है कि इससे मानसिक तनाव कम होगा।

कई कंपनियों ने इस पहल का समर्थन किया है और कहा है कि इससे कर्मचारियों की उत्पादकता बेहतर हो सकती है। संतुलित जीवन से काम की गुणवत्ता बढ़ती है।

हालांकि, कुछ कॉर्पोरेट संगठनों का कहना है कि पूरी तरह से डिस्कनेक्ट होना व्यवहारिक नहीं है, खासकर ग्लोबल कंपनियों के लिए।

आईटी और सर्विस सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए यह मुद्दा खासा अहम माना जा रहा है। यहां काम के घंटे अक्सर तय समय से आगे बढ़ जाते हैं।

मानव संसाधन विशेषज्ञों का कहना है कि स्पष्ट गाइडलाइंस बनने से कंपनियों और कर्मचारियों दोनों को फायदा होगा।

अगर यह बिल कानून का रूप लेता है, तो भारत के कार्य संस्कृति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

फिलहाल इस मुद्दे पर चर्चा जारी है और आने वाले समय में सरकार का रुख महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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