बांदा में 'पुल' की मरम्मत या जनता की 'परीक्षा'
Banda/Truth India Times Digital Desk
बांदा। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में विकास की रफ्तार का दावा करने वाला सरकारी तंत्र एक बार फिर सवालों के घेरे में है। बांदा-नरैनी-कालिंजर राज्य मार्ग (SH-113) पर स्थित बागेन नदी का पुल अब जनता के लिए जी का जंजाल बनने वाला है। लोक निर्माण विभाग (PWD) ने मरम्मत का हवाला देकर इस पुल पर भारी वाहनों के आवागमन को जनवरी 2026 तक के लिए प्रतिबंधित कर दिया है।
हैरानी की बात यह है कि हल्के वाहनों को भी दिन के उजाले में (सुबह 9 से शाम 5 बजे तक) पुल पार करने की इजाजत नहीं होगी। यानी एक साल से ज्यादा वक्त तक इस रूट पर सफर करने वाले हजारों लोग, छात्र और मरीज प्रशासन की ‘कछुआ चाल’ और अधूरी प्लानिंग की भेंट चढ़ेंगे।
2026 तक का ‘वनवास’: क्या साल भर चलेगी बियरिंग की मरम्मत?
PWD के अधिशाषी अभियंता का कहना है कि सेतु की बियरिंग और एक्सपेंशन जॉइंट बदले जाने हैं। तकनीकी रूप से यह काम जरूरी हो सकता है, लेकिन सवाल इसकी समय सीमा पर है।
- क्या एक पुल की बियरिंग बदलने में एक साल से अधिक का समय लगेगा?
- क्या विभाग के पास ऐसी कोई आधुनिक तकनीक नहीं है जिससे यातायात को कम से कम प्रभावित कर काम पूरा किया जा सके?
- क्या 2026 तक का समय देकर विभाग अपनी सुस्ती पर कानूनी मुहर लगा रहा है?
जनता की जेब पर डाका: वैकल्पिक मार्ग या ‘भटकाव मार्ग’?
प्रशासन ने नरैनी से कालिंजर जाने वालों के लिए जो वैकल्पिक मार्ग बताया है, वह नरैनी-अतर्रा-बदौसा-बघेलाबारी होकर गुजरता है। इस डायवर्जन के कारण:
- दूरी और डीजल: यात्रियों को अब कई किलोमीटर का अतिरिक्त चक्कर काटना होगा, जिससे समय और पैसे दोनों की बर्बादी होगी।
- महंगाई की मार: भारी वाहनों (ट्रकों) के लंबे रूट से आने-जाने के कारण क्षेत्र में निर्माण सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ना तय है।
- जाम का झाम: वैकल्पिक मार्गों पर अचानक बढ़े दबाव से अतर्रा और बदौसा जैसे कस्बों में भीषण जाम की स्थिति पैदा होगी।
सरकार और PWD से सीधे सवाल
यह खबर केवल एक ट्रैफिक डायवर्जन नहीं, बल्कि सरकारी कार्यप्रणाली की नाकामी की कहानी है:
- दिन में पाबंदी क्यों? हल्के वाहनों (बाइक, कार) को सुबह 9 से शाम 5 बजे तक क्यों रोका जा रहा है? क्या मरम्मत का काम केवल इन्ही घंटों में होगा? क्या रात के समय काम कर दिन में जनता को राहत नहीं दी जा सकती?
- पर्यटन पर चोट: कालिंजर दुर्ग एक ऐतिहासिक पर्यटन स्थल है। इस महत्वपूर्ण मार्ग को इतने लंबे समय तक बाधित करने से पर्यटन उद्योग को जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई कौन करेगा?
- आपातकालीन स्थिति में क्या? यदि किसी मरीज को तत्काल नरैनी से कालिंजर या वापस ले जाना हो, तो क्या उसे भी घंटों इंतजार करना होगा या लंबा चक्कर काटना होगा?
पिछड़े बुंदेलखंड पर एक और बोझ
बुंदेलखंड पहले से ही कनेक्टिविटी की समस्याओं से जूझ रहा है। बागेन नदी पर बना यह पुल कालिंजर और नरैनी के बीच की लाइफलाइन है। प्रशासन ने आदेश तो जारी कर दिया, लेकिन क्या यह सोचा कि रोज मजदूरी के लिए इधर से उधर जाने वाले गरीब मजदूरों का क्या होगा? क्या छात्रों को स्कूल पहुँचने के लिए अब अंधेरे में घर से निकलना होगा?
निष्कर्ष: जवाबदेही तय होनी चाहिए
विकास कार्यों के नाम पर जनता को बंधक बनाना अब एक रिवाज सा बन गया है। PWD को यह स्पष्ट करना चाहिए कि 9 जनवरी 2026 की जो तारीख तय की गई है, क्या तब तक काम वाकई पूरा हो जाएगा? और अगर काम पहले हो सकता है, तो जनता को इतनी लंबी ‘सजा’ क्यों दी जा रही है?
स्थानीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी इस मामले में रहस्यमयी है। बांदा की जनता अब यह पूछ रही है कि उनके टैक्स के पैसे से चलने वाला विभाग उन्हें सहूलियत दे रहा है या मुसीबत?
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