कानपुर में कानून को ‘रौंद’ कर निकले कार सवार: तीन बैरियर तोड़ दरोगा-होमगार्ड को उड़ाया; 10 फीट दूर जा गिरे SI, खाकी का इकबाल खत्म या अपराधियों में चुनाव का जोश?

कानपुर। उत्तर प्रदेश के कानपुर में बेखौफ अपराधियों ने न केवल पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़ी, बल्कि सीधे कानून के रखवालों के शरीर पर कार चढ़ा दी। यह दुस्साहसिक घटना मुख्यमंत्री के उस दावे पर करारा तमाचा है जिसमें कहा जाता है कि ‘यूपी में अपराधी या तो जेल में हैं या प्रदेश छोड़ चुके हैं।’ कानपुर की सड़कों पर जिस तरह से कार सवारों ने दो दरोगा (SI) और एक होमगार्ड को रौंदा, वह राज्य की कानून-व्यवस्था की बदहाली की एक भयावह तस्वीर पेश करता है।

इस हमले में एक दरोगा का पैर टूट गया है और वे गंभीर रूप से घायल हैं, जबकि होमगार्ड मौत से जंग लड़ रहा है। क्या अब अपराधियों के मन से वर्दी का खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है?

वारदात: जैसे कोई फिल्मी स्टंट नहीं, बल्कि खूनी मंजर हो

जानकारी के अनुसार, पुलिस की टीम नियमित चेकिंग और सुरक्षा के मद्देनजर बैरियर लगाकर तैनात थी। तभी एक तेज रफ्तार कार वहां पहुंची। पुलिसकर्मियों ने जब उसे रुकने का इशारा किया, तो ड्राइवर ने रफ्तार कम करने के बजाय एक्सीलेटर पर पैर रख दिया। कार ने एक के बाद एक तीन बैरियर तोड़ डाले और सामने खड़े दो दरोगा और एक होमगार्ड को अपनी चपेट में ले लिया।

प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि टक्कर इतनी भीषण थी कि एक दरोगा हवा में उछलकर करीब 10 फीट दूर जा गिरे। टक्कर मारने के बाद आरोपी अपनी कार लेकर मौके से फरार हो गए। पुलिस विभाग में इस घटना के बाद हड़कंप मच गया है।

घायलों की स्थिति: अस्पताल में जिंदगी की जंग

इस जानलेवा हमले में:

  1. SI (दरोगा): गंभीर रूप से घायल दरोगा का बायां पैर बुरी तरह टूट गया है। उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है जहाँ उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है।
  2. होमगार्ड: होमगार्ड की स्थिति नाजुक बनी हुई है। उनके सिर और शरीर के अंदरूनी अंगों में गहरी चोटें आई हैं।
  3. दूसरे दरोगा: उन्हें भी हल्की चोटें आई हैं, लेकिन वे इस सदमे में हैं कि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के साथ ऐसा व्यवहार कैसे संभव है।

सरकार और पुलिस महानिदेशक (DGP) से तीखे सवाल

यह घटना केवल एक हादसा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर यूपी शासन को दी गई चुनौती है। जनता और विपक्ष अब सरकार से ये सवाल पूछ रहे हैं:

  • अपराधियों का इतना हौसला कैसे? क्या कानपुर में पुलिस का इंटेलिजेंस और खौफ खत्म हो चुका है कि अपराधी तीन-तीन बैरियर तोड़कर भागने की हिम्मत कर रहे हैं?
  • सुरक्षा प्रोटोकॉल कहाँ है? हाई-वे और बैरियर पॉइंट्स पर तैनात पुलिसकर्मियों के पास ऐसे वाहनों को रोकने के लिए ‘टायर किलर’ या अन्य आधुनिक उपकरण क्यों नहीं थे?
  • सीसीटीवी और सर्विलांस का क्या हुआ? शहर को ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘सेफ सिटी’ बनाने के दावे किए जाते हैं, फिर भी एक कार पुलिसकर्मियों को रौंदकर शहर की सीमाओं से बाहर कैसे निकल गई?

अपराधियों की पहचान और राजनीतिक संरक्षण का शक?

स्थानीय लोगों और सोशल मीडिया पर यह चर्चा जोरों पर है कि कार में सवार लोग आखिर कौन थे? क्या उन्हें किसी बड़े रसूखदार का संरक्षण प्राप्त है? अक्सर देखा गया है कि चुनाव के समय बाहुबलियों और उनके गुर्गों की सक्रियता बढ़ जाती है। क्या यह हमला उसी गुंडागर्दी का हिस्सा है? कानपुर पुलिस अब तक आरोपियों का सुराग लगाने में नाकाम रही है, जो प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा धब्बा है।

पुलिस की कार्रवाई: हाथ अब भी खाली

कानपुर पुलिस के आला अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने जिले भर में नाकाबंदी कर दी है और सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं। पुलिस ने हत्या के प्रयास और सरकारी कार्य में बाधा डालने जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। लेकिन सवाल वही है—जब तक अपराधी पकड़े नहीं जाते, तब तक ये दावे केवल कागजी हैं।

निष्कर्ष: जब रक्षक ही सुरक्षित नहीं, तो जनता का क्या?

उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था को लेकर अक्सर बड़े-बड़े विज्ञापन दिए जाते हैं, लेकिन कानपुर की इस घटना ने उन विज्ञापनों की हकीकत बयां कर दी है। अगर सड़क पर वर्दी पहनकर खड़ा दरोगा सुरक्षित नहीं है, अगर अपराधी पुलिस को कुचलने में संकोच नहीं कर रहे, तो आम जनता की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है।

सरकार को चाहिए कि वह केवल भाषणों में नहीं, बल्कि धरातल पर अपराधियों के भीतर कानून का डर पैदा करे। आरोपियों की गिरफ्तारी के साथ-साथ उनके खिलाफ ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए जो पूरे प्रदेश के लिए एक मिसाल बने।

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