हिंदू संगठन ने किया 51,000 के इनाम का ऐलान
बांदा। बुंदेलखंड के बांदा जिले में उस वक्त सनसनी फैल गई जब जेल रोड स्थित स्वराज कॉलोनी के एक मंदिर के ठीक सामने गोवंश (बछड़े) का कटा हुआ सिर बरामद हुआ। इस घटना ने न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत किया है, बल्कि जिले की कानून-व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस जहाँ इसे ‘आवारा कुत्तों’ की करतूत बताकर मामले को शांत करने में जुटी है, वहीं हिंदू संगठनों ने इसे सोची-समझी साजिश करार देते हुए 51,000 रुपये के इनाम का ऐलान कर दिया है।
“साजिशकर्ता का नाम बताओ, 51 हजार पाओ”
विश्व हिंदू महासंघ गौरक्षा के जिलाध्यक्ष महेश कुमार प्रजापति ने इस घटना पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। उन्होंने साफ कहा है कि यह हिंदू समाज को उकसाने और शहर का माहौल बिगाड़ने की बड़ी साजिश है। उन्होंने घोषणा की है कि जो भी व्यक्ति इस घिनौनी हरकत को अंजाम देने वाले आरोपी का नाम या सुराग देगा, उसे संगठन की ओर से 51,000 रुपये का नगद इनाम दिया जाएगा। इस घोषणा ने प्रशासन की धड़कनें बढ़ा दी हैं, क्योंकि अब यह मामला महज एक पुलिस फाइल नहीं बल्कि ‘अस्मिता’ की जंग बन चुका है।
पुलिस की ‘थ्योरी’ बनाम जनता का ‘आक्रोश’
नगर कोतवाली पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि कटा हुआ सिर लगभग तीन महीने के बछड़े का था। पुलिस का प्रारंभिक निष्कर्ष है कि किसी मरे हुए बछड़े को कूड़े में फेंका गया था, जिसे कुत्ते खींचकर मंदिर तक ले आए। लेकिन स्थानीय लोग और बजरंग दल जैसे संगठन इस थ्योरी को गले उतारने को तैयार नहीं हैं।
लोगों का सवाल सीधा है: क्या कुत्ते इतने ‘समझदार’ हैं कि वे कूड़े के ढेर से सिर्फ कटा हुआ सिर उठाकर सीधे मंदिर के दरवाजे पर ही छोड़ेंगे? क्या यह शहर की शांति भंग करने की प्रोफेशनल प्लानिंग नहीं है?
सरकार और जिला प्रशासन से 5 तीखे सवाल:
- खुफिया तंत्र (LIU) क्या कर रहा था? जेल रोड जैसा संवेदनशील इलाका, जहाँ जेल और कई महत्वपूर्ण दफ्तर हैं, वहां ऐसी घटना पुलिस की सतर्कता पर बड़ा धब्बा है।
- सीसीटीवी का ‘अंधापन’: शहर को स्मार्ट बनाने के नाम पर करोड़ों के कैमरे लगे हैं। क्या उन कैमरों में यह ‘कुत्ता’ या ‘साजिशकर्ता’ कैद नहीं हुआ? आखिर फुटेज सार्वजनिक करने में देरी क्यों?
- कूड़ा प्रबंधन की नाकामी: अगर पुलिस की बात सच मान ली जाए, तो नगर पालिका क्या कर रही थी? क्या मरे हुए जानवरों को खुले कूड़ेदानों में सड़ने के लिए छोड़ना नियमों का उल्लंघन नहीं है?
- सांप्रदायिक माहौल का खतरा: ऐसी घटनाएं बांदा जैसे संवेदनशील शहरों में दंगे की आग भड़का सकती हैं। क्या प्रशासन सिर्फ ‘शांति समितियों’ की बैठक तक सीमित रहेगा या दोषियों को जेल भेजेगा?
- पुलिस का ‘शॉर्टकट’ रवैया: क्या मामला शांत करने के लिए इसे ‘प्राकृतिक घटना’ बता देना न्यायसंगत है? क्या इसकी फॉरेंसिक जांच गहराई से नहीं होनी चाहिए?
प्रदर्शन और पुलिस का पहरा
मंगलवार को हुई इस घटना के बाद बांदा की सड़कों पर भारी आक्रोश देखा गया। हिंदू संगठनों ने चक्का जाम कर प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की। अपर पुलिस अधीक्षक शिवराज ने भारी पुलिस बल के साथ मोर्चा संभाला और स्थिति को नियंत्रण में किया। हालांकि, स्वराज कॉलोनी और आसपास के इलाकों में अब भी तनावपूर्ण शांति बनी हुई है। पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ मुकदमा तो दर्ज कर लिया है, लेकिन बिना किसी गिरफ्तारी के संगठनों का गुस्सा ठंडा होता नहीं दिख रहा।
निष्कर्ष: जांच की कसौटी पर बांदा पुलिस
बांदा की यह घटना उत्तर प्रदेश सरकार के ‘गौ-संरक्षण’ के दावों की भी परीक्षा है। एक तरफ गौवंश को बचाने के लिए करोड़ों का बजट है, और दूसरी तरफ मंदिर के सामने ऐसी तस्वीरें समाज को बांटने का काम कर रही हैं। अब गेंद पुलिस के पाले में है—क्या वह इनाम जीतने वाले किसी मुखबिर का इंतजार करेगी या वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर असली अपराधी (चाहे वह इंसान हो या लापरवाही करने वाला विभाग) को बेनकाब करेगी?
रिपोर्ट: [प्रलभ शरण चौधरी/Truth India Times]
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