शराब की चुस्की और ‘ईंट’ से कत्ल: बांदा में नशे के जुनून ने उजाड़ा घर; पुलिस ने हत्यारे को दबोचा, पर अवैध शराब की मंडियों पर कब चलेगा हंटर?

बांदा (तिंदवारी)। बुंदेलखंड के बांदा जिले में शराब के नशे ने एक और हंसते-खेलते परिवार की खुशियां छीन लीं। तिंदवारी थाना क्षेत्र के मिरगहनी गांव में महज शराब पीने के दौरान हुए मामूली विवाद ने ‘गैर-इरादतन हत्या’ का रूप ले लिया। पुलिस ने इस मामले में तत्परता दिखाते हुए वांछित आरोपी दीपू उर्फ योगेंद्र को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन यह गिरफ्तारी उन सवालों को दबा नहीं सकती जो जिले में धड़ल्ले से बिक रही शराब और उससे जनमते अपराधों पर खड़े हो रहे हैं।

नशे का ‘तांडव’: मिरगहनी में खूनी संघर्ष

घटना 21 दिसंबर की काली रात की है। मिरगहनी गांव में शराब के दौर चल रहे थे, तभी दो पक्षों के बीच कहासुनी शुरू हुई। गाली-गलौज से शुरू हुआ यह विवाद देखते ही देखते हिंसक हो गया। आरोपी दीपू उर्फ योगेंद्र ने आपा खो दिया और पास पड़ी एक ईंट उठाकर दुर्विजय के सिर पर दे मारी। ईंट का प्रहार इतना घातक था कि दुर्विजय लहूलुहान होकर गिर पड़ा। उपचार के दौरान अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया, जिसके बाद गांव में मातम और तनाव फैल गया।

पुलिस की कार्रवाई: गजनी मोड़ पर धरा गया ‘कातिल’

पुलिस अधीक्षक पलाश बंसल के निर्देश पर वांछितों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत तिंदवारी पुलिस ने जाल बिछाया। 24 दिसंबर को मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने गजनी मोड़ के पास घेराबंदी की और आरोपी दीपू को धर दबोचा। पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त वह खूनी ‘ईंट’ भी बरामद कर ली है, जिसे आरोपी ने सबूत मिटाने के इरादे से छिपा दिया था। आरोपी को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया है।

सरकार और आबकारी विभाग से 5 चुभते सवाल:

  1. गांव-गांव शराब, घर-घर विवाद: बांदा के ग्रामीण इलाकों में शराब की सुलभ उपलब्धता क्या अपराधों का मुख्य कारण नहीं है? आबकारी विभाग और पुलिस ‘अवैध शराब’ के ठिकानों पर छापेमारी केवल कागजों पर क्यों करती है?
  2. नशे के खिलाफ जागरूकता शून्य: सरकार राजस्व (Revenue) के लालच में शराब की दुकानें तो खोल रही है, लेकिन ग्रामीण युवाओं को नशे की गर्त से निकालने के लिए कोई ठोस सामाजिक अभियान क्यों नहीं चलाया जाता?
  3. छोटी रंजिश, बड़ी वारदात: छोटी-छोटी बातों पर हत्या जैसे कदम उठाना समाज में बढ़ती मानसिक अस्थिरता को दर्शाता है। क्या प्रशासन ने कभी अपराध के इन ‘मूल कारणों’ पर सर्वे या काउंसलिंग की सोची है?
  4. पुलिस की ‘नाइट गश्त’ पर सवाल: मिरगहनी जैसी घटनाएं अक्सर देर रात होती हैं। क्या ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस की रात्रि गश्त सिर्फ मुख्य सड़कों तक सीमित है? गलियों के भीतर हो रहे इन ‘शराब सत्रों’ पर लगाम क्यों नहीं?
  5. फास्ट ट्रैक ट्रायल: क्या दुर्विजय के परिवार को न्याय दिलाने के लिए सरकार इस मामले को फास्ट ट्रैक में ले जाएगी, या यह केस भी सालों तक तारीखों के फेर में फंसा रहेगा?

प्रशासन की पीठ थपथपाना काफी नहीं

बेशक, तिंदवारी पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर अपनी ड्यूटी निभाई है, लेकिन क्या एक गिरफ्तारी से बांदा सुरक्षित हो जाएगा? जब तक गांवों में खुलेआम बिकने वाली कच्ची और अवैध शराब पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगता, तब तक ‘दुर्विजय’ जैसे मासूम नशे की भेंट चढ़ते रहेंगे।

निष्कर्ष: सजा तो मिलेगी, पर सुधरेगा कौन?

दीपू अब जेल की सलाखों के पीछे है और पुलिस की विवेचना जारी है। लेकिन मिरगहनी की गलियां आज भी उस खूनी रात को याद कर सहमी हुई हैं। प्रशासन को चाहिए कि वह केवल अपराधियों को पकड़ने तक सीमित न रहे, बल्कि उन परिस्थितियों को खत्म करे जहाँ शराब और ईंट मिलकर किसी की जान ले लेते हैं।

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