गौशालाओं में गोवंश की दुर्दशा पर कब जागेगा प्रशासन? हडहा माफी में मिलीं भारी कमियां, हिंदू महासंघ ने दी कार्रवाई की चेतावनी

नरैनी (बांदा): उत्तर प्रदेश की सरकार जहाँ एक ओर गोवंश संरक्षण को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में गिनाती है, वहीं दूसरी ओर बुंदेलखंड के जमीनी हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। बांदा जिले के नरैनी ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पंचायत हडहा माफी (नाहरी) में संचालित अस्थायी गौशाला का हालिया औचक निरीक्षण व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। विश्व हिंदू महासंघ गौरक्षा समिति के प्रदेश प्रभारी प्रवीण दुबे और प्रदेश उपाध्यक्ष सरिता गुप्ता ने जब मौके पर दस्तक दी, तो गौशाला की हकीकत सरकारी दावों के विपरीत नजर आई।

औचक निरीक्षण में खुली पोल: अव्यवस्थाओं का अंबार

निरीक्षण के दौरान गौरक्षा समिति की टीम ने गौशाला के संचालन में कई गंभीर तकनीकी और व्यावहारिक कमियां पाईं। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि गोवंशों के रख-रखाव और उनके चारे-पानी की व्यवस्था मानकों के अनुरूप नहीं थी। टीम ने तत्काल ग्राम प्रधान को मौके पर तलब किया और गौशाला की दुर्दशा पर कड़ी फटकार लगाई।

निरीक्षण के दौरान यह पाया गया कि गौशाला केवल ‘अस्थायी’ नाम की है, लेकिन वहां स्थायी समस्याओं का जमावड़ा है। गोवंशों के स्वास्थ्य परीक्षण से लेकर उनकी सुरक्षा तक के इंतजामों में ढिलाई बरती जा रही थी, जो सीधे तौर पर शासन के निर्देशों की अवहेलना है।

अंतिम संस्कार पर ‘सम्मान’ की मांग और चेतावनी

प्रदेश प्रभारी प्रवीण दुबे ने निरीक्षण के दौरान एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दे पर जोर दिया— गोवंशों का अंतिम संस्कार। उन्होंने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि अक्सर गौशालाओं में मृत्यु होने पर गोवंशों के साथ अमानवीय व्यवहार की खबरें आती हैं। उन्होंने ग्राम प्रधान को सख्त निर्देश दिए कि किसी भी गोवंश की मृत्यु होने पर उसका अंतिम संस्कार पूर्ण सम्मान और हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार किया जाना चाहिए।

दुबे ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी— “यदि गोवंशों के अंतिम संस्कार या उनकी देखरेख में रत्ती भर भी लापरवाही पाई गई, तो केवल ग्राम प्रधान ही नहीं, बल्कि संबंधित क्षेत्रीय पंचायत अधिकारी (VDO) और सचिव के खिलाफ भी कठोर विधिक कार्रवाई सुनिश्चित कराई जाएगी।”

‘ट्रुथ इंडिया टाइम्स’ की नजर से सरकार और ब्लॉक प्रशासन की जवाबदेही

यह निरीक्षण एक बड़े संकट की ओर इशारा करता है। सरकार को इन सवालों के जवाब देने होंगे:

  1. बजट का बंदरबांट: सरकार प्रत्येक गोवंश के लिए प्रतिदिन के हिसाब से एक निश्चित राशि आवंटित करती है। हडहा माफी जैसी गौशालाओं में कमियां मिलने का मतलब है कि या तो बजट पहुँच नहीं रहा, या फिर उसका सही उपयोग नहीं हो रहा। क्या इसकी कोई वित्तीय ऑडिट होगी?
  2. ब्लॉक अधिकारियों की उदासीनता: नरैनी ब्लॉक के अधिकारी और पशु चिकित्सा विभाग के लोग महीने में कितनी बार इन गौशालाओं का दौरा करते हैं? क्या केवल विश्व हिंदू महासंघ जैसी संस्थाओं के निरीक्षण का इंतजार किया जाता है?
  3. शीत लहर और सुरक्षा: कड़ाके की ठंड और आवारा कुत्तों के खतरे के बीच, क्या इन अस्थायी गौशालाओं में टिन शेड और तिरपाल की पर्याप्त व्यवस्था है? हडहा माफी की गौशाला में ठंड से बचाव के इंतजाम नाकाफी पाए गए।
  4. मृत गोवंशों की रिपोर्टिंग: कितनी मौतों को कागजों पर दबा दिया जाता है? अंतिम संस्कार की निगरानी के लिए प्रशासन ने अब तक कोई ठोस मैकेनिज्म क्यों नहीं बनाया?

गौशाला बनी ‘शो-पीस’, समस्या जस की तस

स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि गौशाला होने के बावजूद अन्ना पशुओं की समस्या पूरी तरह हल नहीं हुई है। जब गौशालाओं में ही चारे-पानी का संकट होगा, तो पशुओं को वापस सड़कों या खेतों में छोड़ दिया जाता है। हडहा माफी की स्थिति यह दर्शाती है कि बिना प्रशासनिक इच्छाशक्ति के गौशालाएं केवल ‘शो-पीस’ बनकर रह गई हैं।

निष्कर्ष: कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित न रहे

विश्व हिंदू महासंघ द्वारा दिए गए निर्देश स्वागत योग्य हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या ग्राम प्रधान और ब्लॉक प्रशासन इन निर्देशों को गंभीरता से लेगा? प्रदेश उपाध्यक्ष सरिता गुप्ता ने स्पष्ट किया कि संगठन द्वारा समय-समय पर ऐसे औचक निरीक्षण जारी रहेंगे।

सरकार को चाहिए कि वह केवल गौशाला बनाने तक सीमित न रहे, बल्कि उनके वास्तविक संचालन की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र ‘विजिलेंस टीम’ का गठन करे। नरैनी की हडहा माफी गौशाला की स्थिति सुधारना अब प्रशासन के लिए साख का सवाल बन गया है।


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