'सीक्रेट रिहाई' पर बड़ा एक्शन
प्रलभ शरण चौधरी | Truth India Times
बांदा/लखनऊ: उत्तर प्रदेश की जेल व्यवस्था और कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाकर फरार हुए स्क्रैप माफिया और गैंगस्टर रवि नागर उर्फ रवि काना मामले में शासन ने अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई की है। बिना कोर्ट के आदेश और बिना किसी कस्टडी वारंट के रवि काना को बांदा जेल से रिहा करने के गंभीर आरोप में जेल अधीक्षक अनिल गौतम और डिप्टी जेलर निर्भय सिंह को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।
इस हाई-प्रोफाइल मामले ने न केवल कारागार विभाग बल्कि यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। विशेष सचिव कारागार अनीता वर्मा द्वारा जारी आदेश के अनुसार, जेल अधीक्षक अनिल गौतम को निलंबित कर कारागार मुख्यालय लखनऊ से संबद्ध कर दिया गया है। इससे पहले जेलर विक्रम सिंह यादव को पहले ही सस्पेंड किया जा चुका है।
क्या है पूरा मामला?
गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) का कुख्यात स्क्रैप माफिया रवि काना अगस्त 2024 से बांदा मंडल कारागार में बंद था। उसके खिलाफ हत्या, रंगदारी और गैंगस्टर एक्ट समेत 20 से अधिक गंभीर मुकदमे दर्ज हैं। हाल ही में नोएडा के सेक्टर-63 थाने में दर्ज एक नए मामले के सिलसिले में नोएडा पुलिस ने 28 जनवरी को रवि काना के खिलाफ ‘बी-वारंट’ जारी करवाया था।
बी-वारंट का स्पष्ट अर्थ होता है कि आरोपी न्यायिक हिरासत में है और उसे हर हाल में संबंधित न्यायालय के समक्ष पेश किया जाना अनिवार्य है। बावजूद इसके, 29 जनवरी की शाम को जेल प्रशासन ने संदिग्ध परिस्थितियों में रवि काना को जेल के गेट से बाहर जाने दिया।
जेल प्रशासन की लचर दलीलें
मामले के तूल पकड़ने पर निलंबित जेल अधीक्षक अनिल गौतम ने तर्क दिया था कि रवि काना के खिलाफ सभी पुराने मुकदमों में रिहाई के आदेश मिल चुके थे। उन्होंने दावा किया कि 29 जनवरी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेशी के बाद शाम 5 बजे तक कोर्ट से कोई नया कस्टडी वारंट प्राप्त नहीं हुआ। जेल प्रशासन का कहना है कि उन्होंने ‘रूटीन प्रक्रिया’ के तहत उसे रिहा कर दिया, जबकि कोर्ट का कस्टडी ईमेल कथित तौर पर शाम पौने 8 बजे आया, जब काना पहले ही रफूचक्कर हो चुका था।
CJM कोर्ट की कड़ी फटकार
गौतमबुद्ध नगर के सीजेएम संजीव कुमार त्रिपाठी ने जेल प्रशासन के इन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि जब अभियुक्त बी-वारंट पर तलब था और उसी दिन रिमांड पर सुनवाई चल रही थी, तो किस आधार पर उसे रिहा किया गया? कोर्ट ने इसे “गंभीर प्रशासनिक चूक” और “मिलीभगत” का संकेत मानते हुए जेल अधीक्षक से 6 फरवरी तक स्पष्टीकरण मांगा है।
एसओजी की एंट्री और एफआईआर
मंगलवार की रात बांदा की जेल चौकी इंचार्ज अनुराग पांडे की तहरीर पर कोतवाली नगर में जेल अधीक्षक, निलंबित जेलर और तीन अज्ञात कर्मियों के खिलाफ आपराधिक धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई है।
बांदा एसपी पलाश बंसल के निर्देश पर एसओजी (SOG) की पांच सदस्यीय टीम ने जेल के भीतर 4 घंटे तक मैराथन पूछताछ की। टीम ने बैरक नंबर 3-ए की तलाशी ली, जहां काना बंद था। साथ ही जेल के सीसीटीवी फुटेज और रिहाई से जुड़े दस्तावेजों को अपने कब्जे में ले लिया है।
14 जिलों में ‘रेड अलर्ट’
रवि काना की ‘अवैध’ रिहाई के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजीपी स्तर के अधिकारी मामले की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। काना की गिरफ्तारी के लिए बांदा, लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद, हापुड़ और मेरठ समेत 14 जिलों में छापेमारी की जा रही है। पुलिस को डर है कि काना फिर से अंडरग्राउंड होकर अपने गैंग को ऑपरेट कर सकता है या देश छोड़कर भाग सकता है।
Truth India Times की राय: यह मामला केवल एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि अपराधियों और सिस्टम के बीच गहरे गठजोड़ की ओर इशारा करता है। एक गैंगस्टर जिसे कोर्ट ने तलब किया हो, उसे जेल प्रशासन का ‘रूटीन’ बताकर छोड़ देना राज्य की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर एक बड़ा धब्बा है।
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