धान खरीद केंद्रों की मनमानी के खिलाफ फूटा किसानों का गुस्सा, जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन कर सौंपा ज्ञापन

बांदा। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में अन्नदाता एक बार फिर व्यवस्था की बेरुखी और प्रशासनिक उदासीनता की मार झेलने को मजबूर है। सोमवार को बड़ी संख्या में किसानों ने जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचकर जोरदार प्रदर्शन किया और मुख्यमंत्री को संबोधित एक ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपा। किसानों का सीधा आरोप है कि मंडी समिति स्थित धान खरीद केंद्रों पर पिछले एक महीने से उनकी उपज खुले आसमान के नीचे पड़ी है, लेकिन अब केंद्र प्रभारी और संबंधित अधिकारी धान खरीदने से साफ इनकार कर रहे हैं।

महीने भर का इंतजार, अब खरीद से इनकार

बांदा की कृषि उपज मंडी में अपना धान लेकर आए किसानों की व्यथा बेहद मार्मिक है। ज्ञापन देने आए किसानों ने बताया कि वे लगभग 25 से 30 दिनों से मंडी परिसर में डेरा डाले हुए हैं। कड़ाके की ठंड और खुले आसमान के नीचे अपनी फसल की रखवाली कर रहे इन किसानों को उम्मीद थी कि आज नहीं तो कल उनकी फसल सरकारी कांटे पर तौली जाएगी। लेकिन, अब अचानक खरीद केंद्रों द्वारा यह कहकर हाथ खड़े कर दिए गए हैं कि लक्ष्य पूरा हो चुका है या तकनीकी कारणों से अब खरीद संभव नहीं है।

किसानों का कहना है कि उन्होंने बाकायदा पंजीकरण कराया था और उनके पास टोकन भी मौजूद है। इसके बावजूद, उन्हें दर-दर भटकने पर मजबूर किया जा रहा है। “एक महीने तक मंडी में पड़े रहने के बाद अब हमें वापस घर जाने को कहा जा रहा है, हम अपनी फसल लेकर कहाँ जाएं?” यह सवाल आज बांदा के हर पीड़ित किसान की जुबान पर है।

बिचौलियों और केंद्र प्रभारियों की मिलीभगत का आरोप

प्रदर्शनकारी किसानों ने आरोप लगाया कि सरकारी केंद्रों पर खरीद की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। किसानों के अनुसार, केंद्र प्रभारी जानबूझकर वास्तविक किसानों को परेशान कर रहे हैं ताकि वे कम दामों पर अपनी फसल बिचौलियों को बेचने पर मजबूर हो जाएं। किसानों ने यह भी दावा किया कि कई प्रभावशाली लोगों और व्यापारियों का धान पिछले दरवाजे से खरीदा जा रहा है, जबकि आम किसान अपनी बारी का इंतजार करते-करते थक चुका है।

मंडी में धान की सुरक्षा को लेकर भी किसानों ने चिंता जताई। पिछले दिनों हुई हल्की बूंदाबांदी और नमी के कारण धान की गुणवत्ता पर भी असर पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि यदि उनकी उपज तुरंत नहीं खरीदी गई, तो उनकी पूरी मेहनत की कमाई मिट्टी में मिल जाएगी।

आर्थिक संकट की दहलीज पर अन्नदाता

धान की खरीद न होने से किसानों के सामने गहरा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। रबी की फसल (गेहूं, सरसों, चना) की बुवाई और उसमें खाद-पानी के लिए किसानों को नकदी की सख्त जरूरत है। किसानों ने बताया कि उन्होंने साहूकारों से कर्ज लेकर खेती की थी, और अब जब फसल बेचकर कर्ज चुकाने का समय आया है, तो सरकारी तंत्र ने मुंह मोड़ लिया है।

ज्ञापन के माध्यम से किसानों ने मांग की है कि:

  1. मंडी समिति के सभी केंद्रों पर तत्काल प्रभाव से तौल शुरू की जाए।
  2. जिन किसानों के पास वैध टोकन हैं, उनकी फसल प्राथमिकता के आधार पर खरीदी जाए।
  3. खरीद केंद्रों पर व्याप्त भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की उच्च स्तरीय जांच हो।
  4. यदि निर्धारित लक्ष्य पूरा हो गया है, तो शासन से अतिरिक्त लक्ष्य आवंटित कराकर खरीद जारी रखी जाए।

प्रशासन का रुख

जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपने के दौरान प्रशासनिक अधिकारियों ने किसानों को आश्वासन दिया कि उनकी समस्याओं का जल्द समाधान निकाला जाएगा। प्रशासन का कहना है कि वे इस मामले में विपणन विभाग और मंडी समिति के अधिकारियों से रिपोर्ट तलब करेंगे। हालांकि, किसान अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि अगर अगले 48 घंटों के भीतर खरीद प्रक्रिया सुचारू रूप से शुरू नहीं हुई, तो वे उग्र आंदोलन और चक्का जाम करने के लिए बाध्य होंगे।

बांदा के किसानों का यह विरोध प्रदर्शन इस बात का प्रमाण है कि धरातल पर सरकारी योजनाएं और दावे किस कदर दम तोड़ रहे हैं। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इन बेबस किसानों को राहत दिला पाता है या फिर ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा केवल कागजों तक ही सीमित रह जाता है।

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