कोहरे का ‘डेथ वारंट’ या सरकारी सिस्टम की लापरवाही? बांगरमऊ में रोडवेज बस और कंटेनर की भीषण भिड़ंत; 5 जिंदगी दांव पर, 25 की जान से खिलवाड़!

उन्नाव (बांगरमऊ)। उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में आज सुबह कोहरे की सफेद चादर एक बार फिर लाल हो गई। बांगरमऊ कोतवाली क्षेत्र के मुस्तफाबाद गांव के पास दिल्ली से लखनऊ जा रही रोडवेज बस और एक तेज रफ्तार कंटेनर के बीच हुई आमने-सामने की टक्कर ने शासन-प्रशासन के सुरक्षित यात्रा के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। 25 यात्रियों से भरी बस मौत के मुहाने पर खड़ी थी, जिसमें परिचालक सहित 5 लोग जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं।

कोहरा बहाना है, असली वजह ‘सिस्टम’ का अंधापन है

हादसा गुरुवार सुबह करीब 8:30 बजे हुआ। विजिबिलिटी शून्य के करीब थी, लेकिन सवाल यह उठता है कि जब मौसम विभाग ने ‘रेड अलर्ट’ जारी किया था, तो परिवहन निगम ने यात्रियों की सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए? दिल्ली से लखनऊ जैसे लंबे रूट पर चलने वाली बसों में क्या फॉग लाइट (Fog Lights) काम कर रही थीं? क्या चालकों को खराब मौसम में गति सीमा और सुरक्षित ड्राइविंग के लिए विशेष निर्देश दिए गए थे?

टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि बस और कंटेनर के बाएं हिस्से के परखच्चे उड़ गए। अगर यह टक्कर सीधे बीच में होती, तो शायद मृतकों का आंकड़ा दहाई पार कर जाता।

चीख-पुकार और ग्रामीणों का साहस

हादसे के बाद लखनऊ-बांगरमऊ मार्ग पर चीख-पुकार मच गई। मुस्तफाबाद गांव के निवासियों ने जो मंजर देखा, वह रोंगटे खड़े करने वाला था। ग्रामीण तुरंत मदद के लिए दौड़े और पुलिस के आने से पहले यात्रियों को क्षतिग्रस्त बस से बाहर निकाला। घायलों में बस परिचालक शैलेश यादव (मैनपुरी), प्रकाश, सुनील, रेनू (फतेहपुर चौरासी) और उमेश (आसीवन) की हालत नाजुक बनी हुई है। इन्हें पहले सीएचसी बांगरमऊ ले जाया गया, जहाँ सुविधाओं के अभाव और गंभीर स्थिति के कारण जिला अस्पताल रेफर करना पड़ा।

सरकार और परिवहन विभाग से सीधे 5 सवाल:

  1. एंटी-फॉग डिवाइस कहाँ हैं? सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च कर रोडवेज बसों में ‘एंटी-फॉग डिवाइस’ लगाने का वादा किया था। क्या इस बस में वह डिवाइस लगी थी? अगर नहीं, तो इसका जिम्मेदार कौन है?
  2. सड़कों पर रिफ्लेक्टर का अभाव: मुस्तफाबाद जैसे दुर्घटना बाहुल्य क्षेत्रों में सड़कों के किनारे और डिवाइडर पर रेडियम रिफ्लेक्टर क्यों गायब हैं? क्या लोक निर्माण विभाग (PWD) केवल हादसे का इंतजार करता है?
  3. ओवरस्पीडिंग पर लगाम क्यों नहीं? कोहरे में जब 10 फीट दूर का नहीं दिख रहा, तब ये वाहन इतनी गति में क्यों थे कि टकराते ही लोहे की चादरें कागज की तरह फट गईं? हाईवे पेट्रोलिंग और इंटरसेप्टर गाड़ियां कहाँ सो रही थीं?
  4. रेफरल सेंटर क्यों बना सीएचसी? सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में क्या इतनी भी सुविधा नहीं थी कि इन 5 घायलों को वहां स्थिर (Stabilize) किया जा सके? हर बार की तरह मरीजों को जिला अस्पताल रेफर करना सिस्टम की लाचारी दिखाता है।
  5. डिपो की जिम्मेदारी: बुलंदशहर के अरनिया डिपो से निकली इस बस की फिटनेस जांच आखिरी बार कब हुई थी?

कोहरा कुदरती है, लेकिन तैयारी सरकारी होनी चाहिए

प्रशासन अक्सर “घने कोहरे के कारण हादसा” कहकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है। लेकिन सच तो यह है कि यह हादसा ‘मानवीय भूल’ और ‘प्रशासनिक अनदेखी’ का मिश्रण है। कोतवाली प्रभारी अखिलेश चंद्र पाण्डेय ने मौके पर पहुंचकर स्थिति संभाली और जाम खुलवाया, लेकिन क्या पुलिस की जिम्मेदारी सिर्फ हादसा होने के बाद रास्ता साफ करने तक सीमित है? कोहरे के दौरान खतरनाक मोड़ों पर पुलिस की तैनाती और चेतावनी बोर्ड क्यों नहीं लगाए जाते?

अब आगे क्या?

घायलों का इलाज जिला अस्पताल में चल रहा है, लेकिन उनके परिवारों का क्या जो अपने सुरक्षित घर लौटने का इंतजार कर रहे थे? उत्तर प्रदेश परिवहन निगम को इस घटना से सबक लेकर लंबी दूरी की बसों के लिए ‘कोहरा प्रोटोकॉल’ कड़ाई से लागू करना होगा। यदि सरकार और विभाग अब भी नहीं जागे, तो यूपी की सड़कों पर कोहरा इसी तरह निर्दोष लोगों की जान लेता रहेगा।

रिपोर्ट: [प्रलभ शरण चौधरी/उन्नाव/ब्यूरो]

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