यूजीसी के नए नियमों के समर्थन में उतरा दलित-पिछड़ा समाज, कलेक्ट्रेट में गूंजे ‘समानता’ के नारे

कन्नौज: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले नियम-2026’ को लेकर उत्तर प्रदेश के कन्नौज में राजनीति और सामाजिक हलचल तेज हो गई है। जहाँ एक ओर सवर्ण समाज के कुछ संगठन इसे ‘काला कानून’ बताकर विरोध कर रहे हैं, वहीं शनिवार को दलित और पिछड़े वर्ग के सैकड़ों लोगों ने सड़कों पर उतरकर इन नियमों के पक्ष में जोरदार शक्ति प्रदर्शन किया। तिर्वा रोड से शुरू हुआ यह जुलूस नारों और नारों के बीच डीएम कार्यालय पहुँचा, जहाँ राज्यपाल को संबोधित ज्ञापन सौंपा गया।

यूजीसी नियम-2026: आखिर क्यों है समर्थन की गूंज?

प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रहे छात्र नेताओं और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यूजीसी द्वारा 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित ये नियम शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए एक ऐतिहासिक कदम हैं। समर्थकों का तर्क है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में अक्सर एससी (SC), एसटी (ST) और ओबीसी (OBC) वर्ग के छात्रों को अदृश्य भेदभाव और मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

समर्थकों ने ज्ञापन में मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर जोर दिया:

  • इक्विटी कमेटी का गठन: नए नियमों के तहत हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में ‘इक्विटी कमेटी’ बनाना अनिवार्य होगा, जो भेदभाव की शिकायतों की सुनवाई करेगी।
  • इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर: परिसरों में ‘इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर’ की स्थापना से पिछड़े वर्ग के छात्रों को समान अवसर मिल सकेंगे।
  • उत्पीड़न पर लगाम: कैंपस के भीतर जातिगत टिप्पणियों और किसी भी प्रकार के उत्पीड़न को रोकने के लिए अब एक सख्त निगरानी तंत्र काम करेगा।

विरोध बनाम समर्थन: बंटा नजर आया समाज

कन्नौज में पिछले कुछ दिनों से इन नियमों को लेकर विरोध की आग सुलग रही थी। सवर्ण आर्मी जैसे संगठनों का आरोप है कि ये नियम एकतरफा हैं और इनका दुरुपयोग सवर्ण समाज के खिलाफ हो सकता है। इसके विपरीत, शनिवार के प्रदर्शन में शामिल लोगों ने साफ कर दिया कि यह नियम किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि दलितों और पिछड़ों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए हैं।

प्रदर्शन में शामिल रामू कठेरिया और अनिल गुप्ता ने कहा कि यह नियम पिछड़े और दलित छात्र-छात्राओं के साथ होने वाले ऐतिहासिक भेदभाव को रोकने में कारगर साबित होंगे। उनके अनुसार, कैंपस में सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल मिलना हर छात्र का संवैधानिक अधिकार है।

‘पीछे हटे तो होगा बड़ा आंदोलन’

कलेक्ट्रेट परिसर में ज्ञापन सौंपते समय समर्थकों ने प्रशासन के माध्यम से सरकार को चेतावनी भी दी। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि दबाव में आकर इन प्रगतिशील नियमों को वापस लिया गया या इनमें किसी भी प्रकार की ढील दी गई, तो पिछड़ा और दलित समाज सड़कों पर उतरकर बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होगा।

इस प्रदर्शन के दौरान राकेश सिंह, छोटू यादव, सुमित दिवाकर, कुनाल दिवाकर और नीरज कुमार कुशवाहा सहित सैकड़ों की संख्या में युवा और छात्र मौजूद रहे।

निष्कर्ष

कन्नौज में यूजीसी नियमों को लेकर मची यह रार अब सामाजिक वर्चस्व की लड़ाई बनती दिख रही है। जहाँ एक पक्ष इसे अधिकारों का हनन बता रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे ‘समानता की नई सुबह’ मान रहा है। अब गेंद सरकार और राज्यपाल के पाले में है कि वे इस सामाजिक गतिरोध को कैसे सुलझाते हैं।

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