नलों से आ रहा ‘मलमूत्र’ वाला पानी, गर्भवती पार्षद का भूख हड़ताल का ऐलान; बोलीं- ‘मेरे बच्चे को कुछ हुआ तो प्रशासन होगा जिम्मेदार’

स्मार्ट सिटी का दावा करने वाले कानपुर महानगर के एक वार्ड में हालात इस कदर बदतर हो चुके हैं कि वहां के नागरिकों को ‘नरक’ में रहने को मजबूर होना पड़ रहा है। वार्ड की पेयजल पाइपलाइन में सीवर और मलमूत्र का पानी मिक्स होकर आ रहा है। अधिकारियों की संवेदनहीनता से तंग आकर क्षेत्रीय महिला पार्षद ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। खास बात यह है कि पार्षद स्वयं गर्भवती हैं, लेकिन उन्होंने अपने और अपने होने वाले बच्चे की परवाह किए बिना भूख हड़ताल पर बैठने का ऐलान कर दिया है।

20 हजार की आबादी, 2 साल से ‘जहर’ पीने को मजबूर

यह मामला कानपुर के उस क्षेत्र का है जहाँ पिछले दो वर्षों से पेयजल की समस्या नासूर बन चुकी है। पार्षद का आरोप है कि उनके वार्ड के लगभग 20 हजार लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। मेट्रो रेल परियोजना और अन्य निर्माण कार्यों की लापरवाही के कारण क्षेत्र की पुरानी पेयजल लाइनें जगह-जगह से क्षतिग्रस्त हो गई हैं।

हालात यह हैं कि टूटी हुई पेयजल पाइपलाइन में सीवर का गंदा पानी रिसकर मिल रहा है। जब घरों में नल खुलते हैं, तो साफ पानी के बजाय काली रंग का बदबूदार पानी निकलता है, जिसमें मलमूत्र तक बहकर आता है। पार्षद ने तुलना करते हुए कहा, “मेरे वार्ड के हालात मध्य प्रदेश के इंदौर जैसे (जहाँ जलजनित बीमारियों का प्रकोप हुआ था) हो गए हैं, प्रशासन किसी बड़ी महामारी का इंतजार कर रहा है।”

1 किलोमीटर पैदल चलकर पानी लाने की विवशता

क्षेत्रीय निवासियों का दर्द बयां करते हुए पार्षद ने बताया कि पिछले कई महीनों से लोग 1 किलोमीटर दूर जाकर दूसरे मोहल्लों या हैंडपंपों से पानी ढोकर लाने को मजबूर हैं। जिनके पास साधन नहीं है, वे गंदा पानी पीने के कारण बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। बच्चों और बुजुर्गों में पेट की बीमारियाँ और त्वचा संबंधी संक्रमण तेजी से फैल रहे हैं। मेट्रो निर्माण में लगी एजेंसियों ने लाइनें तो तोड़ दीं, लेकिन उनकी मरम्मत की सुध लेना जरूरी नहीं समझा।

गर्भवती पार्षद की ‘हुंकार’: जीवन दांव पर

इस अव्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए महिला पार्षद ने प्रशासन को सीधी चेतावनी दी है। उन्होंने भावुक और आक्रोशित लहजे में कहा:

“मैं वर्तमान में गर्भवती हूँ और मुझे डॉक्टरी देखरेख की जरूरत है। लेकिन मेरे वार्ड की जनता जिस नर्क में रह रही है, उसे देख मैं घर नहीं बैठ सकती। मैंने हर अधिकारी के दरवाजे खटखटाए, पत्र लिखे, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। अब मेरे पास ‘भूख हड़ताल’ के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। अगर इस हड़ताल के दौरान मुझे या मेरे गर्भ में पल रहे बच्चे को कुछ भी होता है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी नगर निगम, जल संस्थान और जिला प्रशासन की होगी।”

मेट्रो और जल संस्थान की आपसी खींचतान में पिसी जनता

जांच में सामने आया है कि इस समस्या की मुख्य जड़ मेट्रो निर्माण के दौरान हुई खुदाई है। अक्सर विकास कार्यों के दौरान पेयजल और सीवर लाइनें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। पार्षद का आरोप है कि मेट्रो अधिकारी इसे जल संस्थान की जिम्मेदारी बताते हैं, और जल संस्थान फंड की कमी का रोना रोता है। विभागों की इसी आपसी खींचतान और ‘फुटबॉल’ वाली राजनीति के बीच 20 हजार की जनता प्यासी मर रही है।

प्रशासनिक अमले में हड़कंप

पार्षद द्वारा भूख हड़ताल के ऐलान और ‘गर्भवती’ होने के बावजूद आंदोलन की बात सुनकर प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है। आनन-फानन में जल संस्थान के अधिकारी मौके पर निरीक्षण की बात कर रहे हैं। हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि अधिकारी पहले भी कई बार आकर ‘खानापूर्ति’ कर चुके हैं, लेकिन समाधान आज तक नहीं निकला।

निष्कर्ष: विकास की कीमत क्या जनता की जान है?

कानपुर के इस वार्ड की स्थिति हमारे सिस्टम की विफलता का जीता-जागता उदाहरण है। एक तरफ हम अरबों रुपये खर्च कर मेट्रो चला रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ शहर के बीचों-बीच लोग मलमूत्र मिला पानी पीने को मजबूर हैं। एक गर्भवती महिला प्रतिनिधि का सड़क पर बैठने का फैसला प्रशासन के मुंह पर तमाचा है। अब देखना यह है कि क्या पार्षद के इस आत्मघाती कदम से पहले अधिकारियों की नींद खुलती है या नहीं।

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