कानपुर में सिस्टम की ‘बेरहमी’ पर भारी पड़ी ठंड: DM दफ्तर के बाहर लाश रखकर प्रदर्शन, बेटी बोली— “KDA ने घर उजाड़ा, पिता की जान ले ली”; जांच के लिए 3 सदस्यीय कमेटी गठित

कानपुर। उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में मंगलवार को न्याय के सबसे बड़े मंदिर यानी जिलाधिकारी (DM) कार्यालय के बाहर एक ऐसा मंजर देखने को मिला, जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया। कड़ाके की ठंड और सिस्टम की बेरुखी से हार चुके एक गरीब परिवार ने अपनों की ‘डेड बॉडी’ को कलेक्ट्रेट की दहलीज पर रखकर प्रदर्शन किया। केशवनगर निवासी 45 वर्षीय रामपाल की मौत के बाद उनकी बेटी और बिलखते परिजनों ने कानपुर विकास प्राधिकरण (KDA) पर हत्या का आरोप लगाया है।

परिजनों का सीधा सवाल है— “जब छत ही छीन ली गई, तो इस कड़ाके की ठंड में एक इंसान तिरपाल के नीचे कब तक जिंदा रहता?” मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन ने आनन-फानन में तीन सदस्यीय जांच कमेटी का गठन किया है, लेकिन पीड़ित परिवार की आंखों में न्याय से ज्यादा सिस्टम के प्रति आक्रोश और बेबसी साफ दिखाई दे रही है।

केडीए का बुलडोजर और ‘मौत’ का तिरपाल

पूरी घटना की शुरुआत 16 दिसंबर को हुई थी। पीड़ित परिवार का आरोप है कि कानपुर विकास प्राधिकरण (KDA) की टीम भारी पुलिस बल के साथ केशवनगर पहुँची और बिना किसी पूर्व नोटिस या कानूनी चेतावनी के रामपाल के मकान को जमींदोज कर दिया। घर गिर जाने के बाद रामपाल का परिवार बेघर हो गया।

रामपाल की बेटी ने सुबकते हुए बताया, “KDA ने हमारा घर तोड़ दिया, हमारे पास सिर छुपाने की जगह नहीं थी। पिता जी ने मलबे के पास ही एक छोटा सा तिरपाल डालकर रहने का इंतजाम किया था। पिछले 15 दिनों से हम उसी खुले आसमान और प्लास्टिक की पन्नी (तिरपाल) के नीचे सो रहे थे। दिसंबर की इस जानलेवा ठंड ने आखिरकार मेरे पिता को हमसे छीन लिया।”

डीएम दफ्तर पर हाईवोल्टेज ड्रामा: घंटों जमी रही लाश

मंगलवार सुबह जैसे ही रामपाल की मौत हुई, परिजनों का सब्र जवाब दे गया। मोहल्ले वालों के साथ मिलकर परिजन रामपाल के शव को लेकर सीधे कानपुर कलेक्ट्रेट पहुँच गए। डीएम कार्यालय के गेट पर शव रखकर जमकर नारेबाजी शुरू हो गई। देखते ही देखते कलेक्ट्रेट परिसर छावनी में तब्दील हो गया।

प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि लापरवाह केडीए अधिकारियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाए और पीड़ित परिवार को मुआवजा व रहने के लिए आवास दिया जाए। भीड़ को बढ़ता देख पुलिस के आला अधिकारियों ने मोर्चा संभाला, लेकिन परिजन डीएम से मिलने और कार्रवाई की लिखित पुष्टि पर अड़े रहे।

प्रशासनिक जवाब: तीन सदस्यीय कमेटी की घोषणा

मामला बढ़ता देख जिलाधिकारी ने तत्काल संज्ञान लिया। प्रदर्शनकारियों को शांत कराने के लिए प्रशासन ने घोषणा की कि पूरे प्रकरण की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया है। यह कमेटी जांच करेगी कि:

  1. क्या 16 दिसंबर को केडीए द्वारा की गई तोड़फोड़ की कार्रवाई नियमानुसार थी?
  2. क्या परिवार को अपना सामान निकालने और वैकल्पिक व्यवस्था का समय दिया गया था?
  3. रामपाल की मौत के असल कारणों (ठंड या बीमारी) की पुष्टि के लिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट का विश्लेषण।

“गरीब का घर गिराना आसान, इंसाफ दिलाना मुश्किल”

प्रदर्शन में शामिल स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने केडीए की कार्यशैली पर कड़े प्रहार किए। लोगों का कहना है कि शहर में बड़े-बड़े भूमाफियाओं की अवैध इमारतों पर बुलडोजर चलाने में सिस्टम के हाथ कांपते हैं, लेकिन केशवनगर जैसे इलाकों में रहने वाले गरीबों की झोपड़ियां गिराने में विभाग को एक मिनट की भी देरी नहीं लगती। 16 दिसंबर की उस कार्रवाई ने एक हंसते-खेलते परिवार को सड़क पर ला दिया और अंततः एक जान की कीमत चुकानी पड़ी।

बेटी की गुहार: “इंसाफ नहीं मिला तो हम भी मर जाएंगे”

रामपाल की बेटी ने प्रशासनिक अधिकारियों के सामने अपनी बेबसी व्यक्त करते हुए कहा कि उसके पिता ही घर के एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे। अब घर भी नहीं रहा और पिता भी चले गए। प्रशासन ने मदद का आश्वासन तो दिया है, लेकिन पीड़ितों को डर है कि कहीं जांच के नाम पर मामले को रफा-दफा न कर दिया जाए।

KDA का पक्ष: ‘अवैध अतिक्रमण’ की दलील

हालांकि केडीए की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक विस्तृत बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक विभाग का तर्क है कि संबंधित निर्माण सरकारी जमीन पर अवैध अतिक्रमण था, जिसे अभियान के तहत हटाया गया। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या कड़ाके की ठंड के बीच किसी परिवार को बिना वैकल्पिक व्यवस्था के बेघर करना मानवीय दृष्टिकोण से सही है?

निष्कर्ष: रामपाल की मौत केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि उस सिस्टम की विफलता है जो विकास के नाम पर विनाश की इबारत लिखता है। जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर रखी वो ‘डेड बॉडी’ चीख-चीख कर सवाल कर रही है कि आखिर गरीबों की जान की कीमत कितनी सस्ती है? अब सबकी नजरें गठित कमेटी की रिपोर्ट पर टिकी हैं— क्या यह कमेटी रामपाल के परिवार को छत और सम्मान दिला पाएगी या यह भी फाइलों में दफन हो जाएगी?


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