कानपुर फर्जी डिग्री कांड: घेरे में 10 वकील; शमशाद अली से फिर होगी पूछताछ, बार काउंसिल उपाध्यक्ष के दबाव में पिछली बार छोड़ी थी पुलिस

कानपुर | कानपुर में फर्जी डिग्री और मार्कशीट बेचने वाले गिरोह के खुलासे के बाद अब कानून की पढ़ाई करने वाले अधिवक्ता ही पुलिस के निशाने पर हैं। जूही कलां स्थित शैल ग्रुप ऑफ एजुकेशन से बरामद हुए डिग्रियों के जखीरे के मामले में बाबूपुरवा निवासी अधिवक्ता शमशाद अली की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। पुलिस जल्द ही शमशाद अली को दोबारा पूछताछ के लिए बुलाने की तैयारी में है। खास बात यह है कि पिछली बार जब पुलिस उसे हिरासत में लेकर आई थी, तो भारी राजनीतिक और पेशेवर दबाव के चलते उसे छोड़ना पड़ा था, लेकिन अब पुलिस सभी 10 संदिग्ध अधिवक्ताओं की कुंडली खंगाल रही है।

दबाव की राजनीति और पुलिस की कार्रवाई

बीते सोमवार को किदवई नगर पुलिस ने शमशाद अली को पूछताछ के लिए थाने बुलाया था। जैसे ही शमशाद को थाने लाया गया, वकीलों की भारी भीड़ जमा हो गई। इस दौरान बार काउंसिल के उपाध्यक्ष और महापौर के बेटे अनुराग पांडेय अपने साथियों के साथ थाने पहुंचे और शमशाद को छोड़ने का दबाव बनाया।

पुलिस और अधिवक्ताओं के बीच हुई इस तीखी नोकझोंक का वीडियो भी सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ था। भारी विरोध और ‘लिखापढ़ी’ के आश्वासन के बाद पुलिस ने शमशाद को उनके साथ जाने दिया था। हालांकि, डीसीपी साउथ ने अब साफ कर दिया है कि जांच जारी है और शमशाद को दोबारा बयान दर्ज कराने के लिए आना ही होगा।

कैसे हुआ इस बड़े फर्जीवाड़े का भंडाफोड़?

पूरा मामला 18 फरवरी को शुरू हुआ था, जब किदवई नगर पुलिस ने शैल ग्रुप ऑफ एजुकेशन के कार्यालय पर छापेमारी की थी। इस दबिश में पुलिस के भी होश उड़ गए थे। मौके से उत्तर प्रदेश सहित देश के 9 राज्यों के 14 विश्वविद्यालयों की 1000 से अधिक फर्जी मार्कशीट और डिग्रियां बरामद हुई थीं।

पुलिस ने गिरोह के सरगना शैलेंद्र कुमार ओझा (रायबरेली) समेत नागेंद्र मणि त्रिपाठी, जोगेंद्र और अश्वनी कुमार को गिरफ्तार कर जेल भेजा था। जेल में बंद इन आरोपियों ने पूछताछ के दौरान स्वीकार किया कि उन्होंने शहर के करीब 10 अधिवक्ताओं को फर्जी तरीके से एलएलबी की डिग्रियां उपलब्ध कराई थीं। इन्हीं नामों में शमशाद अली का नाम प्रमुखता से सामने आया था।

कॉल डिटेल और धोखाधड़ी के मामले ने फंसाया पेंच

अधिवक्ता शमशाद अली केवल आरोपियों के बयान के आधार पर ही नहीं, बल्कि तकनीकी साक्ष्यों के कारण भी पुलिस के रडार पर है। पुलिस को गिरोह के सरगना शैलेंद्र ओझा के मोबाइल की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) में शमशाद का नंबर मिला है, जिससे उनके बीच लगातार संपर्क होने की पुष्टि होती है। इसके अलावा, शमशाद अली के खिलाफ बाबूपुरवा थाने में पहले से ही धोखाधड़ी की एक रिपोर्ट दर्ज है।

9 अन्य वकीलों पर भी गिर सकती है गाज

डीसीपी साउथ दीपेंद्र नाथ चौधरी ने बताया कि आरोपियों ने पूछताछ में जिन 10 अधिवक्ताओं के नाम लिए थे, उन सभी की जांच की जाएगी। पुलिस यह पता लगा रही है कि इन वकीलों ने वास्तव में डिग्री खरीदी है या वे इस सिंडिकेट का हिस्सा थे। पुलिस उन विश्वविद्यालयों से भी पत्राचार कर रही है, जिनके नाम की फर्जी डिग्रियां मिली थीं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि ये डिग्रियां डेटाबेस में मौजूद हैं या नहीं।

फरार आरोपियों की तलाश तेज

इस बड़े रैकेट में पुलिस को अभी भी पांच अन्य मुख्य आरोपियों की तलाश है। इनमें शुभम दुबे, शेखू, मयंक भारद्वाज, मनीष उर्फ रवि और विनीत शामिल हैं। ये आरोपी दिल्ली, गाजियाबाद और हैदराबाद जैसे शहरों से तार जुड़े होने के कारण फरार चल रहे हैं। पुलिस की टीमें लगातार दबिश दे रही हैं।

निष्कर्ष: कानपुर पुलिस के इस कड़े रुख से वकीलों के बीच खलबली मची हुई है। अगर जांच में फर्जी डिग्रियों की पुष्टि होती है, तो न केवल इन अधिवक्ताओं का लाइसेंस रद्द होगा, बल्कि उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है। प्रशासन ने साफ कर दिया है कि रसूख या राजनीतिक दबाव के बावजूद दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

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