350 किलो की डॉल्फिन की मौत से हड़कंप
प्रलभ शरण चौधरी | ट्रुथ इंडिया टाइम्स
कानपुर: ‘नमामि गंगे’ और गंगा की निर्मलता के दावों के बीच कानपुर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने पर्यावरणविदों और जलीय जीव प्रेमियों के होश उड़ा दिए हैं। कानपुर के गंगा घाट पर शुक्रवार शाम करीब 350 किलोग्राम वजनी एक विशालकाय डॉल्फिन मृत अवस्था में मिली। स्थानीय लोगों और नाविकों का सीधा आरोप है कि गंगा के जहरीले होते पानी और फैक्ट्रियों के कचरे ने इस बेजुबान की जान ले ली है। राष्ट्रीय जलीय जीव (National Aquatic Animal) की इस तरह मौत होना केंद्र और राज्य सरकार के सफाई अभियानों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
मंजर: जब नाविकों के उड़े होश
शुक्रवार शाम करीब 5 बजे का वक्त था, जब गंगा में नाव चलाने वाले कुछ मल्लाहों ने पानी की सतह पर एक विशालकाय आकृति को उतराते हुए देखा। पहले तो लोग इसे कोई बड़ी मछली समझ रहे थे, लेकिन जब 10 से अधिक लोगों ने मिलकर रस्सी के सहारे इसे किनारे की ओर खींचा, तो सबके पैरों तले जमीन खिसक गई। यह एक पूर्ण विकसित, करीब 350 किलो वजनी ‘गंगेटिक डॉल्फिन’ थी।
विशालकाय डॉल्फिन को पानी से बाहर निकालने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी। सूचना पाकर मौके पर भारी भीड़ जमा हो गई। स्थानीय निवासियों में इस बात को लेकर गहरा रोष है कि जिस गंगा को हम मां कहते हैं और जिसकी स्वच्छता के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं, वहां डॉल्फिन जैसे दुर्लभ जीव दम तोड़ रहे हैं।
आरोप: प्रदूषण की भेंट चढ़ी डॉल्फिन?
कानपुर हमेशा से चमड़ा उद्योगों और नालों के गंदे पानी के लिए विवादों में रहा है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि डॉल्फिन के शरीर पर चोट के कोई प्रत्यक्ष निशान नहीं दिख रहे थे, जिससे यह आशंका प्रबल हो जाती है कि पानी में घुलते रासायनिक जहर (Chemical Pollution) के कारण उसका दम घुटा होगा।
स्थानीय नागरिकों का कहना है:
“गंगा में सीवर और फैक्ट्रियों का पानी गिरना अभी भी बंद नहीं हुआ है। पानी इतना काला और बदबूदार हो जाता है कि डॉल्फिन जैसे जीव सांस नहीं ले पाते। यह प्राकृतिक मौत नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही से की गई हत्या है।”
वन विभाग और प्रशासन की सुस्ती
घटना की सूचना पुलिस और वन विभाग को तत्काल दी गई, लेकिन विशेषज्ञों के पहुंचने में हुई देरी ने भी स्थानीय लोगों को नाराज किया। गंगेटिक डॉल्फिन एक ‘शेड्यूल-1’ का जीव है, जिसे बाघों के समान ही सुरक्षा प्राप्त है। इसकी मौत के कारणों का पता लगाने के लिए विसरा रिपोर्ट और गहन पोस्टमार्टम की आवश्यकता है, लेकिन अक्सर ऐसे मामलों को ‘सामान्य मृत्यु’ बताकर दबा दिया जाता है।
सरकार और ‘नमामि गंगे’ मिशन से चुभते सवाल
1. कहाँ गया सफाई का बजट? गंगा डॉल्फिन केवल साफ पानी में ही जीवित रह सकती है। यदि कानपुर में डॉल्फिन मर रही है, तो इसका सीधा मतलब है कि गंगा का जल प्रदूषण स्तर (BOD) खतरे के निशान से ऊपर है। करोड़ों के बजट के बाद भी नालों का गिरना बंद क्यों नहीं हुआ?
2. फैक्ट्रियों पर लगाम क्यों नहीं? कानपुर के जाजमऊ और आसपास के इलाकों से अभी भी चोरी-छिपे औद्योगिक कचरा गंगा में बहाया जा रहा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) इन इकाइयों पर कड़ी कार्रवाई करने के बजाय आंखें क्यों मूंदे बैठा है?
3. ‘प्रोजेक्ट डॉल्फिन’ का क्या हुआ? प्रधानमंत्री ने खुद ‘प्रोजेक्ट डॉल्फिन’ की शुरुआत की थी। इसके तहत डॉल्फिन के संरक्षण के लिए विशेष निगरानी दल बनाए जाने थे। कानपुर जैसे संवेदनशील जोन में क्या कोई सक्रिय निगरानी तंत्र काम कर रहा है?
डिमांड: सरकार को लेने होंगे ये कड़े एक्शन
- स्वतंत्र जांच और पोस्टमार्टम: डॉल्फिन की मौत की जांच किसी स्वतंत्र पैनल से कराई जाए और विसरा रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
- नालों की तत्काल सीलिंग: जिन नालों का पानी बिना ट्रीटमेंट के गंगा में गिर रहा है, उनके संबंधित अधिकारियों और नगर निगम के जिम्मेदारों पर एफआईआर दर्ज हो।
- इंडस्ट्रियल ऑडिट: गंगा किनारे स्थित सभी फैक्ट्रियों का तत्काल सुरक्षा और प्रदूषण ऑडिट हो। दोषी पाए जाने पर फैक्ट्रियों को हमेशा के लिए सील किया जाए।
- डॉल्फिन मित्र की तैनाती: स्थानीय नाविकों को ‘डॉल्फिन मित्र’ के रूप में प्रशिक्षित कर उन्हें मानदेय दिया जाए ताकि वे इन जीवों की सुरक्षा और निगरानी कर सकें।
निष्कर्ष: चेतावनी की घड़ी
गंगेटिक डॉल्फिन को ‘गंगा का इंडिकेटर’ माना जाता है। यानी अगर डॉल्फिन खुश है, तो गंगा साफ है। लेकिन आज कानपुर की गंगा में डॉल्फिन की लाश का मिलना इस बात की गवाही है कि हमारी गंगा ‘बीमार’ नहीं, बल्कि ‘दम तोड़’ रही है।
अगर आज सरकार ने सख्त कदम नहीं उठाए और केवल कागजी रिपोर्ट तक सीमित रही, तो वह दिन दूर नहीं जब गंगा केवल कहानियों में रह जाएगी और डॉल्फिन की तस्वीरें किताबों में। इस 350 किलो की डॉल्फिन की मौत प्रशासन के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
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