बांदा के अतर्रा में ‘जाम’ बना जी का जंजाल: रेलवे क्रॉसिंग पर घंटों थम रही जिंदगी, एम्बुलेंस और स्कूली बच्चे बेहाल; क्या चुनाव के बाद ओवरब्रिज का वादा भूल गई सरकार?

बांदा/अतर्रा: उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद का अतर्रा कस्बा इन दिनों विकास की दावों के बीच एक ऐसी समस्या से जूझ रहा है, जिसने स्थानीय नागरिकों का जीना मुहाल कर दिया है। बिसंडा रोड स्थित रेलवे क्रॉसिंग अब केवल एक रास्ता नहीं, बल्कि ‘परेशानी का जंक्शन’ बन चुकी है। यहाँ लगने वाला भीषण जाम न केवल लोगों का समय बर्बाद कर रहा है, बल्कि आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं और मासूम बच्चों के भविष्य के लिए भी बड़ा खतरा बन गया है। क्षेत्रीय जनता अब “आश्वासन नहीं, ओवरब्रिज” की मांग को लेकर आर-पार के मूड में है।

जाम का जाल: जब 10 मिनट का रास्ता 1 घंटे में बदल जाए

अतर्रा कस्बे के इस व्यस्ततम मार्ग पर प्रतिदिन हजारों वाहनों का आवागमन होता है। झांसी-मानिकपुर रेल खंड पर ट्रेनों की बढ़ती संख्या के कारण दिन भर में कई बार क्रॉसिंग बंद होती है। नियम के मुताबिक ट्रेन गुजरने के बाद फाटक खुलते ही यातायात सुचारू होना चाहिए, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है।

क्रॉसिंग बंद होते ही सड़क के दोनों ओर वाहनों की किलोमीटर लंबी कतारें लग जाती हैं। जैसे ही फाटक खुलता है, जल्दबाजी के चक्कर में वाहन आपस में उलझ जाते हैं, जिससे ‘डेडलॉक’ की स्थिति बन जाती है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि ट्रेन जाने के बाद भी जाम खुलने में 45 मिनट से एक घंटा लग जाता है।

एम्बुलेंस और स्कूली बच्चों पर सबसे बड़ी मार

इस जाम का सबसे वीभत्स चेहरा तब देखने को मिलता है जब कोई एम्बुलेंस सायरन बजाती हुई घंटों खड़ी रहती है। अतर्रा से गंभीर मरीजों को बांदा मेडिकल कॉलेज या कानपुर रेफर किया जाता है, लेकिन बिसंडा रोड क्रॉसिंग उनके लिए ‘मौत का गलियारा’ साबित हो रही है। कई बार जाम के कारण मरीज अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं।

वहीं, स्कूल जाने वाले बच्चों का हाल भी बुरा है। भीषण गर्मी हो या कड़ाके की ठंड, स्कूली बसें इस जाम में फंसी रहती हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और वे घर देरी से पहुंच रहे हैं। कामकाजी लोग और व्यापारी भी इस समस्या से आजिज आ चुके हैं।


जनता की हुंकार: “अब और कितना इंतजार?”

स्थानीय नागरिक पप्पू, अरविंद, सूरज, अन्ना और धीरज सहित दर्जनों लोगों ने ट्रुथ इंडिया टाइम्स से बात करते हुए अपना आक्रोश व्यक्त किया। उन्होंने बताया कि हर चुनाव में जनप्रतिनिधि ओवरब्रिज (ROB) का वादा करते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही फाइलें धूल फांकने लगती हैं।

क्षेत्रीय निवासियों के मुख्य सवाल:

  1. सरकार की प्राथमिकता क्या है? जब प्रदेश के अन्य जिलों में रिकॉर्ड तोड़ ओवरब्रिज बन रहे हैं, तो अतर्रा के इस संवेदनशील पॉइंट को नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है?
  2. प्रशासनिक उदासीनता: क्या जिला प्रशासन ने शासन को इस समस्या की गंभीरता से अवगत कराते हुए कोई ठोस प्रस्ताव भेजा है?
  3. जनप्रतिनिधियों की चुप्पी: बांदा के सांसद और क्षेत्रीय विधायक इस मुद्दे पर विधानसभा और संसद में पुरजोर आवाज क्यों नहीं उठा रहे?

सरकार और रेल मंत्रालय के लिए ‘एक्शन प्लान’ (सुझाव)

ट्रुथ इंडिया टाइम्स के माध्यम से हम उत्तर प्रदेश सरकार और रेल मंत्रालय से निम्नलिखित त्वरित कार्रवाई की मांग करते हैं:

1. ओवरब्रिज (ROB) की तत्काल स्वीकृति: बिसंडा रोड रेलवे क्रॉसिंग पर ‘रेलवे ओवरब्रिज’ के निर्माण के लिए बजट का प्रावधान कर कार्ययोजना को अमलीजामा पहनाया जाए। 2. ट्रैफिक पुलिस की तैनाती: जब तक ब्रिज नहीं बनता, तब तक क्रॉसिंग के दोनों ओर स्थायी रूप से ट्रैफिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाए, ताकि फाटक खुलते ही वाहनों को क्रमबद्ध तरीके से निकाला जा सके। 3. एम्बुलेंस के लिए ‘ग्रीन कॉरिडोर’: स्थानीय प्रशासन को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि आपातकालीन वाहनों को प्राथमिकता के आधार पर निकालने के लिए होमगार्ड्स या वॉलंटियर्स की मदद ली जाए। 4. वैकल्पिक मार्ग का सुदृढ़ीकरण: यदि कोई वैकल्पिक मार्ग संभव है, तो उसे भारी वाहनों के लिए डाइवर्ट किया जाए ताकि कस्बे के भीतर दबाव कम हो सके।

निष्कर्ष: दावों और हकीकत के बीच का फासला

एक ओर हम ‘बुलेट ट्रेन’ और ‘एक्सप्रेसवे’ के युग में जी रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अतर्रा की जनता एक अदद ओवरब्रिज के लिए तरस रही है। यह विडंबना ही है कि आधुनिक भारत के सपने के बीच एक पूरी आबादी जाम में फंसी हुई है।

अतर्रा की जनता अब चुप बैठने वाली नहीं है। यदि जल्द ही ओवरब्रिज निर्माण की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यह जनाक्रोश एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। शासन को समझना होगा कि विकास केवल बड़ी सड़कों से नहीं, बल्कि आम आदमी की छोटी-छोटी बाधाओं को दूर करने से आता है।

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