कानपुर में 'ऑनर' की भेंट चढ़ी मासूम की जिंदगी: प्रेमी से बात कानपुर में 'ऑनर' की भेंट चढ़ी मासूम की जिंदगी: प्रेमी से बात करने पर पिता ने बेरहमी से पीटाकरने पर पिता ने बेरहमी से पीटा
Kanpur/Truth India Times Digital Desk
कानपुर। उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने पारिवारिक रिश्तों और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक 8वीं कक्षा में पढ़ने वाली मासूम छात्रा, जिसके हाथों में अभी किताबें होनी चाहिए थीं, उसने फांसी के फंदे को गले लगा लिया। वजह सिर्फ इतनी थी कि वह अपने एक रिश्तेदार (मामा) से बात करती थी, जो उसके पिता को नागवार गुजरा। पिता की बेरहम पिटाई और घर के भीतर के दमघोंटू माहौल ने एक और बेटी को आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर कर दिया।
यह घटना केवल एक सुसाइड नहीं, बल्कि उस सामाजिक सोच की हार है जहाँ संवाद की जगह ‘डंडा’ ले लेता है।
बातचीत की सजा: पिता का गुस्सा और बेटी की जान
घटना की जानकारी देते हुए छात्रा की मां ने बताया कि उनकी बेटी का प्रेम प्रसंग रिश्ते में लगने वाले मामा (भांजे) से चल रहा था। बेटी उस युवक से शादी करने की जिद पर अड़ी थी और चोरी-छिपे उससे फोन पर बातें करती थी। बुधवार को जब पिता ने उसे फोन पर बात करते हुए पकड़ा, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।
आरोप है कि पिता ने अपनी ही बेटी को जानवरों की तरह पीटा। यह पहली बार नहीं था, इससे पहले भी बात करने को लेकर पिता कई बार उसके साथ मारपीट कर चुके थे। पिता की इसी प्रताड़ना और लोक-लाज के डर से आहत होकर छात्रा ने कमरे के भीतर फांसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली।
सरकार और समाज से तीखे सवाल
यह घटना हमारे सिस्टम और ‘बेटी बचाओ’ के नारों पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है:
- घरेलू हिंसा और मानसिक स्वास्थ्य: क्या बच्चों के साथ मारपीट करना ही अनुशासन का एकमात्र तरीका रह गया है? स्कूलों और मोहल्लों में ‘चाइल्ड काउंसलिंग’ की व्यवस्था क्यों नहीं है, ताकि ऐसे बच्चे समय रहते मदद मांग सकें?
- कानून का डर कहाँ है? क्या पिता को इस बात का डर नहीं था कि अपनी बेटी पर हाथ उठाना कानूनी अपराध है? अक्सर ‘सम्मान’ के नाम पर घरों के भीतर बेटियों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, जिसे समाज ‘निजी मामला’ कहकर नजरअंदाज कर देता है।
- युवाओं में बढ़ता अवसाद: 8वीं क्लास की एक बच्ची का इतना बड़ा कदम उठाना बताता है कि हमारी नई पीढ़ी कितनी असुरक्षित और तनाव में है। प्रशासन और शिक्षा विभाग ने बच्चों के मानसिक तनाव को कम करने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं?
पुलिस की भूमिका और कानूनी पेच
सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। पुलिस का कहना है कि वे मामले की गहनता से जांच कर रहे हैं। हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि क्या पिता के खिलाफ ‘आत्महत्या के लिए उकसाने’ (Abetment to Suicide) का मामला दर्ज होगा?
कानपुर पुलिस को यह सुनिश्चित करना होगा कि घर के भीतर होने वाली इस हिंसा को केवल ‘पारिवारिक विवाद’ न माना जाए। यदि किसी बच्चे को इतना प्रताड़ित किया गया कि वह मौत को गले लगा ले, तो इसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति को कानून के कटघरे में खड़ा होना ही होगा।
घर या ‘टॉर्चर रूम’?
पड़ोसियों का कहना है कि छात्रा पढ़ाई में ठीक थी, लेकिन घर में अक्सर कलह का माहौल रहता था। माँ के बयानों से साफ है कि छात्रा शादी की जिद कर रही थी, लेकिन उसे समझाने या उसकी काउंसलिंग करने के बजाय ‘पिटाई’ का रास्ता चुना गया। यह घटना उन सभी माता-पिता के लिए एक चेतावनी है जो समझते हैं कि हिंसा से बच्चों को सुधारा जा सकता है।
निष्कर्ष: कब तक बुझेंगे घर के चिराग?
कानपुर की यह घटना एक कड़वा सच बयां करती है—जब घर ही सुरक्षित नहीं होगा, तो बाहर की दुनिया से सुरक्षा की उम्मीद क्या की जाए? सरकार को चाहिए कि जिला स्तर पर महिला एवं बाल विकास विभाग के माध्यम से ऐसी हेल्पलाइन और काउंसलिंग सेंटर सक्रिय करे, जहाँ बच्चे बिना डरे अपनी बात कह सकें।
About The Author
Discover more from Truth India Times
Subscribe to get the latest posts sent to your email.