BJP पार्षदों का एलान— "नगर निगम को 'बंटी' मुक्त करना है"
कानपुर | (प्रलभ शरण चौधरी – ट्रुथ इंडिया टाइम्स)
कानपुर। उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर की सियासत में इन दिनों जबरदस्त उबाल है। दिलचस्प बात यह है कि इस बार वार विपक्ष की ओर से नहीं, बल्कि अपनों की ओर से हुआ है। कानपुर नगर निगम में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के ही पार्षदों ने अपनी ही पार्टी की महापौर प्रमिला पांडेय के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद कर दिया है। पार्षदों ने सीधा हमला महापौर के कथित करीबी अमित पांडेय उर्फ ‘बंटी’ पर बोला है। पार्षदों का दो टूक कहना है कि नगर निगम भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है और जब तक इसे ‘बंटी मुक्त’ नहीं किया जाएगा, उनका विरोध जारी रहेगा।
“6 नहीं, 60 पार्षद साथ आएंगे”: भाजपा खेमे में हड़कंप
शुरुआत में इस विरोध में भाजपा के छह पार्षद मुखर होकर सामने आए थे, लेकिन अब यह संख्या बढ़ती दिख रही है। बागी तेवर अपनाए पार्षदों ने दावा किया है कि, “अभी तो केवल 6 लोग सामने दिख रहे हैं, लेकिन जल्द ही हमारे साथ 60 पार्षद खड़े होंगे।” भाजपा पार्षदों के इस खुले विद्रोह ने संगठन और नगर निगम प्रशासन की नींद उड़ा दी है।
पार्षदों का आरोप है कि नगर निगम के महत्वपूर्ण निर्णयों और विकास कार्यों में निर्वाचित प्रतिनिधियों की अनदेखी की जा रही है और सारा नियंत्रण एक ‘खास व्यक्ति’ के हाथों में सिमट गया है।
भ्रष्टाचार का केंद्र बना नगर निगम?
विद्रोही पार्षदों ने प्रेस वार्ता और अनौपचारिक चर्चाओं में नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सड़कों के टेंडर से लेकर सफाई व्यवस्था और लाइटों के ठेकों तक में भारी बंदरबांट हो रही है। पार्षदों ने आरोप लगाया कि अमित पांडेय उर्फ बंटी का दखल इतना बढ़ गया है कि अधिकारियों पर दबाव बनाकर मनमुताबिक काम कराए जा रहे हैं।
एक पार्षद ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हम जनता को जवाब देने के लिए चुने गए हैं, लेकिन यहाँ तो फाइलें किसी और के इशारे पर आगे बढ़ती हैं। भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो गई हैं कि आम पार्षद को अपने वार्ड के छोटे-छोटे कामों के लिए भी ‘सिस्टम’ के आगे घुटने टेकने पड़ रहे हैं।”
महापौर बनाम पार्षद: बढ़ती दूरियां
महापौर प्रमिला पांडेय, जो अपनी दबंग कार्यशैली और ‘रिवॉल्वर दादी’ की छवि के लिए जानी जाती हैं, अब अपने ही घर में घिरती नजर आ रही हैं। हालांकि, उन्होंने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है, लेकिन अपनी ही पार्टी के पार्षदों की नाराजगी उनकी राजनीतिक राह में बड़ी बाधा बन सकती है।
विद्रोही गुट का कहना है कि उनकी लड़ाई महापौर से व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस ‘बिचौलिए’ संस्कृति से है जिसने नगर निगम की छवि धूमिल की है। उनका नारा है— “नगर निगम बचाओ, बंटी को हटाओ।”
अमित उर्फ बंटी पांडेय: विवादों के केंद्र में
कौन हैं अमित उर्फ बंटी पांडेय? पार्षदों का दावा है कि बंटी पांडेय महापौर के साये की तरह रहते हैं और नगर निगम के प्रशासनिक गलियारों में उनका इतना रसूख है कि बड़े-बड़े अधिकारी उनके निर्देशों को टालने की हिम्मत नहीं करते। पार्षदों का आरोप है कि बिना बंटी की ‘हरी झंडी’ के निगम में कोई भी बड़ा टेंडर पास होना मुश्किल है। यही ‘सुपर पावर’ अब भाजपा के जमीनी पार्षदों की आंखों की किरकिरी बन गई है।
संगठन की चुप्पी और बढ़ता दबाव
इस राजनीतिक ड्रामे के बीच भाजपा संगठन फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ की मुद्रा में है। नगर अध्यक्ष और क्षेत्रीय नेतृत्व कोशिश कर रहा है कि मामले को घर के भीतर ही सुलझा लिया जाए, लेकिन पार्षदों के तेवर देखकर लगता है कि वे अब आर-पार के मूड में हैं। पार्षदों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही ‘बंटी मुक्त नगर निगम’ की मांग पूरी नहीं हुई, तो वे लखनऊ (मुख्यमंत्री दरबार) तक कूच करेंगे।
जनता की उम्मीदों पर फिरता पानी
इस अंदरूनी कलह का सबसे बुरा असर कानपुर की जनता और विकास कार्यों पर पड़ रहा है। पार्षदों और महापौर के बीच की इस लड़ाई के कारण बोर्ड की बैठकों में हंगामे के आसार बढ़ गए हैं और कई विकास योजनाएं फाइलों में अटकी हुई हैं। शहर की बदहाल सड़कें और जलभराव की समस्याएं जस की तस हैं, जबकि प्रतिनिधि एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोलने में व्यस्त हैं।
निष्कर्ष: क्या होगा आगे?
कानपुर नगर निगम में छिड़ा यह ‘अपनों का युद्ध’ आने वाले दिनों में और तेज होने वाला है। क्या महापौर अपने खास सिपहसालार को बचाने में कामयाब होंगी या पार्षदों का दबाव भारी पड़ेगा? यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इतना तय है कि भाजपा के भीतर उठी यह चिंगारी यदि शांत नहीं की गई, तो आगामी चुनावों में इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
रिपोर्ट: प्रलभ शरण चौधरी, ट्रुथ इंडिया टाइम्स
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