कानपुर में रील देखते-देखते छात्र की अचानक मौत: मोबाइल के बढ़ते इस्तेमाल और 'साइलेंट किलर' हार्ट अटैक ने खड़े किए सवाल; आखिर कहाँ चूक रहे हम?
कानपुर। प्रलभ शरण चौधरी / ट्रुथ इंडिया टाइम्स
उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है जिसने अभिभावकों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और सरकार की चिंता बढ़ा दी है। यहाँ भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) की तैयारी कर रहे एक मेधावी छात्र की मोबाइल पर रील देखते समय अचानक गिरकर मौत हो गई। यह घटना महज एक हादसा नहीं है, बल्कि युवाओं की जीवनशैली, बढ़ते तनाव और मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से जुड़ी उन समस्याओं की ओर इशारा करती है जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।
अचानक औंधे मुंह गिरा और थम गईं सांसें
जानकारी के अनुसार, मृतक छात्र कानपुर में अपने छोटे भाइयों के साथ रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था। घटना के वक्त वह रात का खाना खाकर बेड पर बैठा मोबाइल चला रहा था। प्रत्यक्षदर्शी छोटे भाइयों ने बताया कि वह मोबाइल पर रील देख रहा था, तभी अचानक वह बेड से औंधे मुंह जमीन पर गिरा। भाई उसे उठाने दौड़े, लेकिन वह अचेत हो चुका था। आनन-फानन में उसे पास के कांशीराम अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने परीक्षण के बाद उसे मृत घोषित कर दिया। डॉक्टरों का प्रारंभिक अनुमान है कि मौत का कारण ‘कार्डियक अरेस्ट’ (हृदय गति रुकना) हो सकता है।
युवाओं में बढ़ता ‘साइलेंट किलर’ और मोबाइल का मायाजाल
पिछले कुछ समय से कानपुर और आसपास के इलाकों में कम उम्र के युवाओं में अचानक मौत (Sudden Death) के मामले तेजी से बढ़े हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें से ‘डिजिटल स्ट्रेस’ एक प्रमुख वजह है।
- अत्यधिक मोबाइल उपयोग: घंटों तक गर्दन झुकाकर मोबाइल चलाना और रील देखना न केवल मानसिक तनाव बढ़ाता है, बल्कि रक्तचाप (Blood Pressure) को भी प्रभावित करता है।
- नींद की कमी: छात्र अक्सर रात-रात भर मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं, जिससे शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिलता और हृदय पर दबाव बढ़ता है।
- सेडेंटरी लाइफस्टाइल: बिना हिले-डुले घंटों बैठे रहने से रक्त के थक्के (Clots) बनने की संभावना बढ़ जाती है।
ट्रुथ इंडिया टाइम्स का विश्लेषण: सरकार और प्रशासन को क्या करना चाहिए?
यह घटना एक अलार्म बेल है। प्रलभ शरण चौधरी के माध्यम से ट्रुथ इंडिया टाइम्स सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय से इस समस्या के समाधान के लिए निम्नलिखित कदम उठाने की मांग करता है:
1. स्कूलों और कोचिंग सेंटरों में हेल्थ स्क्रीनिंग: कानपुर जैसे कोचिंग हब में रहने वाले छात्रों का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण (विशेषकर हृदय और तनाव की जांच) अनिवार्य किया जाना चाहिए। जिला प्रशासन को इसके लिए विशेष चिकित्सा शिविर लगाने चाहिए।
2. डिजिटल डिटॉक्स और जागरूकता अभियान: सरकार को सोशल मीडिया और विज्ञापनों के माध्यम से ‘डिजिटल डिटॉक्स’ के प्रति युवाओं को जागरूक करना चाहिए। मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से होने वाले शारीरिक नुकसानों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
3. पोस्टमार्टम रिपोर्ट का विस्तृत विश्लेषण: ऐसे मामलों में केवल ‘हार्ट अटैक’ कहकर फाइल बंद नहीं होनी चाहिए। सरकार को विशेषज्ञों की एक टीम बनानी चाहिए जो यह जांच करे कि क्या पोस्ट-कोविड प्रभावों या किसी विशेष जीवनशैली के कारण युवाओं का दिल कमजोर हो रहा है।
4. तनाव प्रबंधन केंद्र (Stress Management Centers): प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए हर जिले में मुफ्त काउंसलिंग सेंटर होने चाहिए, जहाँ वे अपनी मानसिक और शारीरिक समस्याओं को साझा कर सकें।
परिजनों के लिए एक चेतावनी
यह घटना उन सभी परिवारों के लिए एक सीख है जहाँ बच्चे देर रात तक मोबाइल के साथ समय बिताते हैं। खाना खाने के तुरंत बाद बैठकर या लेटकर लंबे समय तक मोबाइल चलाना पाचन तंत्र और हृदय तंत्र दोनों के लिए घातक साबित हो सकता है।
कानपुर के इस छात्र की मौत ने न केवल एक परिवार का चिराग बुझा दिया, बल्कि भविष्य के एक इंजीनियर को भी छीन लिया। अब समय आ गया है कि सरकार इस ‘साइलेंट किलर’ मोबाइल एडिक्शन और खराब जीवनशैली के विरुद्ध एक निर्णायक अभियान शुरू करे, ताकि किसी और छात्र की रील देखते-देखते जान न जाए।
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