भारत-मलेशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत ने पेश की नई मिसाल
प्रलभ शरण चौधरी | ट्रुथ इंडिया टाइम्स
नई दिल्ली: मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में आयोजित भारतीय समुदाय के एक भव्य स्वागत समारोह के दौरान भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच की सदियों पुरानी सांस्कृतिक डोर एक बार फिर जीवंत हो उठी। इस विशेष अवसर पर अकादमी अर्जुनासुक्मा (Akademi Arjunasukma) के प्रसिद्ध कलाकारों ने ‘तितः सेरी रामा’ (Titah Seri Rama) नामक ‘वायन कुलित’ (Wayang Kulit) यानी छाया कठपुतली शो का प्रदर्शन किया। रामायण पर आधारित इस भावपूर्ण प्रस्तुति ने न केवल उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध किया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की गाथा भौगोलिक सीमाओं को लांघकर वैश्विक संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है।
क्या है ‘वायन कुलित’ और इसका महत्व?
‘वायन कुलित’ मलेशिया और इंडोनेशिया की एक पारंपरिक लोक कला है, जिसमें चमड़े से बनी कठपुतलियों का उपयोग करके प्रकाश और छाया के माध्यम से कहानियों का मंचन किया जाता है। कुआलालंपुर में हुई इस प्रस्तुति ‘तितः सेरी रामा’ ने खूबसूरती से उन साझा सांस्कृतिक कड़ियों को दिखाया जो भारत और मलेशिया को एक अटूट बंधन में जोड़ती हैं। यह शो रामायण के उस शाश्वत संदेश को समर्पित था, जो सदियों से दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में लोकगीतों, नृत्यों और कठपुतली नाटकों के माध्यम से रचा-बसा हुआ है।
साझा विरासत की झलक: रामायण की वैश्विक गूंज
मलेशियाई कलाकारों द्वारा रामायण की प्रस्तुति इस बात का जीवंत प्रमाण है कि भारतीय महाकाव्य केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। ‘तितः सेरी रामा’ की इस परफॉर्मेंस ने देशों के बीच रामायण की शाश्वत गूंज को उजागर किया। दक्षिण-पूर्व एशिया में रामायण के अपने स्थानीय संस्करण हैं, जैसे मलेशिया में ‘हिकायत सेरी रामा’। अकादमी अर्जुनासुक्मा के कलाकारों ने स्थानीय संगीत और वाद्ययंत्रों के साथ इस गाथा को जिस तरह पिरोया, उसने दोनों देशों के बीच “सॉफ्ट पावर” और “सांस्कृतिक कूटनीति” के महत्व को रेखांकित किया।
प्रस्तुति के मुख्य आकर्षण:
- कलात्मक कुशलता: छाया कठपुतलियों के बारीक संचालन ने भगवान राम के आदर्शों और उनके जीवन के संघर्षों को पर्दे पर उतार दिया।
- सांस्कृतिक मेल: भारतीय महाकाव्य और मलेशियाई कठपुतली कला के मिश्रण ने ‘एक विश्व, एक संस्कृति’ का संदेश दिया।
- शाश्वत गूंज: कार्यक्रम में मौजूद भारतीय प्रवासियों ने महसूस किया कि वे सात समंदर पार भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं।
कूटनीति और कला का संगम
प्रलभ शरण चौधरी की रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह के आयोजन देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को केवल राजनीतिक या आर्थिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि भावनात्मक स्तर पर भी मजबूत करते हैं। भारतीय समुदाय के स्वागत में की गई यह सांस्कृतिक भेंट यह दिखाती है कि मलेशिया में भारतीय विरासत को कितना सम्मान दिया जाता है। कलाकारों की अकादमी ‘अर्जुनासुक्मा’ लंबे समय से इस प्राचीन कला को संरक्षित करने का काम कर रही है, और रामायण की इस गाथा ने उनके प्रदर्शन में चार चाँद लगा दिए।
विरासत को जोड़ने वाला ‘सेतु’
कुआलालंपुर में हुआ यह प्रदर्शन महज एक मनोरंजन कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह उन साझा मूल्यों का उत्सव था जो शांति, सत्य और धर्म पर आधारित हैं। ‘तितः सेरी रामा’ के माध्यम से कलाकारों ने यह संदेश दिया कि भाषा और वेशभूषा बदल सकती है, लेकिन रामायण का मूल आधार आज भी देशों को आपस में जोड़ने वाले एक मजबूत सेतु की तरह काम कर रहा है।
समारोह के अंत में उपस्थित लोगों ने कलाकारों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसी प्रस्तुतियां आने वाली पीढ़ियों को उनकी साझा विरासत से रूबरू कराने के लिए आवश्यक हैं। भारत और मलेशिया के बीच यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान निश्चित रूप से दोस्ती के एक नए अध्याय की शुरुआत है।
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