क्या सिर्फ त्यौहारों पर ही जागता है खाद्य विभाग?
उन्नाव। त्यौहारों का सीजन आते ही मिलावटखोरों का सिंडिकेट सक्रिय हो जाता है, और इसी के साथ शुरू होता है सरकारी विभागों का ‘छापेमारी वाला ड्रामा’। क्रिसमस और नए साल के जश्न के बीच उन्नाव के लोगों की सेहत से खिलवाड़ न हो, इसके लिए खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग ने बेकरियों और केक शॉप्स पर विशेष अभियान चलाया। प्रियंका के नेतृत्व में हुई इस कार्रवाई में 12 नमूने जांच के लिए भेजे गए हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई केवल आंकड़ों को भरने के लिए है या वाकई जनता को शुद्ध सामान मिलेगा?
गंदगी के बीच तैयार हो रहा आपका ‘सेलिब्रेशन’
जांच टीम जब शहर की नामी बेकरियों में पहुंची, तो वहां का नजारा बेहद डरावना था। जिस केक और पेस्ट्री को आप बड़े चाव से खरीदते हैं, वह कई जगहों पर मक्खियों और गंदगी के बीच तैयार हो रहा था। अधिकारियों को कई प्रतिष्ठानों में मानकों की धज्जियां उड़ती मिलीं। खुले में रखा कच्चा माल, एक्सपायरी डेट की परवाह किए बिना बेची जा रही सामग्री और किचन में पसरी गंदगी यह बताने के लिए काफी है कि उन्नाव के बेकरी संचालक नियमों को ठेंगे पर रखते हैं।
12 नमूने और ‘अनिश्चित’ रिपोर्ट का इंतजार
खाद्य विभाग ने केक, पेस्ट्री, बेस और क्रीम के कुल 12 नमूने लिए हैं। ये नमूने अब प्रयोगशाला भेजे गए हैं। विडंबना देखिए कि जब तक इन नमूनों की रिपोर्ट आएगी, तब तक क्रिसमस और नए साल का जश्न खत्म हो चुका होगा और लोग वह संदिग्ध सामान खा चुके होंगे। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि विभाग साल भर इन बेकरियों की निगरानी क्यों नहीं करता? क्या आम दिनों में लोगों को मिलावटी सामान खाने की छूट मिली हुई है?
नष्ट किया गया ‘सड़ा’ माल: कार्रवाई या बस खानापूर्ति?
छापेमारी के दौरान बड़ी मात्रा में मानकों के विपरीत पाए गए केक, पेस्ट्री और बेस को मौके पर ही नष्ट कराया गया। प्रशासन ने नोटिस तो थमा दिए हैं, लेकिन क्या इन नोटिसों से मिलावटखोरों के हौसले पस्त होंगे? उन्नाव की जनता यह जानना चाहती है कि आखिर विभाग सिर्फ त्यौहारों का ही इंतजार क्यों करता है?
सरकार और प्रशासन से 5 चुभते सवाल:
- साल भर की चुप्पी क्यों? क्या बेकरियों में गंदगी और मिलावट सिर्फ दिसंबर के महीने में होती है? बाकी 11 महीने खाद्य सुरक्षा अधिकारी किस ‘खास’ वजह से खामोश रहते हैं?
- लैब रिपोर्ट में देरी का जिम्मेदार कौन? नमूनों की रिपोर्ट आने में हफ्तों लग जाते हैं। तब तक तो मिलावटी माल बिक चुका होता है। क्या सरकार के पास ऐसी कोई ‘फास्ट ट्रैक’ व्यवस्था नहीं है जिससे 24 घंटे में रिपोर्ट मिल सके?
- लाइसेंस की बंदरबांट: जिले में कितनी बेकरियां बिना वैध लाइसेंस या बिना फूड सेफ्टी मानकों के चल रही हैं? क्या विभाग के पास इनका कोई सटीक डेटा है?
- सिर्फ छोटे दुकानदारों पर गाज? क्या यह अभियान सिर्फ मध्यम और छोटे स्तर की दुकानों तक सीमित है, या शहर के उन ‘रसूखदार’ बड़े आउटलेट्स पर भी कार्रवाई होगी जहाँ ऊंची कीमतों पर घटिया माल बेचा जा रहा है?
- जुर्माना या मिलीभगत? पिछली बार जिन दुकानों पर कार्रवाई हुई थी, उनमें से कितनों के लाइसेंस रद्द हुए? या फिर मोटा जुर्माना और ‘सेटिंग’ के खेल में फाइलें दबा दी गईं?
जनता की सेहत के साथ ‘खिलवाड़’ बर्दाश्त नहीं
अधिकारियों ने अपील की है कि लोग साफ-सुथरी जगहों से ही सामान खरीदें। लेकिन सवाल यह है कि ग्राहक को कैसे पता चलेगा कि जिस शोरूम की चमक-धमक वह देख रहा है, उसके किचन में चूहे दौड़ रहे हैं? यह सुनिश्चित करना विभाग का काम है, जनता का नहीं।
निष्कर्ष: अब सख्त कदम उठाने का वक्त है
अगर सरकार वाकई चाहती है कि लोग मिलावट मुक्त सामान खाएं, तो इन अभियानों को केवल ‘सीजनल’ न बनाकर ‘रेगुलर’ बनाना होगा। सिर्फ 12 नमूने लेकर विभाग अपनी पीठ नहीं थपथपा सकता। जब तक एक भी दुकान पर ताला नहीं लटकेगा और किसी मिलावटखोर को जेल नहीं होगी, तब तक उन्नाव की गलियों में ‘जहर’ बिकना बंद नहीं होगा।
खाद्य सुरक्षा विभाग को चाहिए कि वह प्रयोगशाला की रिपोर्ट सार्वजनिक करे और दोषी पाए जाने वाले प्रतिष्ठानों के नाम अखबारों और सोशल मीडिया पर उजागर करे, ताकि जनता को पता चल सके कि कौन उनकी सेहत का दुश्मन है।
रिपोर्ट: [प्रलभ शरण चौधरी/Truth India Times]
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