गंगा की लहरों में समा जाएगा उन्नाव?
उन्नाव (मगरवारा/मिश्रा कॉलोनी)। क्या उन्नाव जिला प्रशासन किसी बड़ी तबाही का इंतजार कर रहा है? गंगा नदी के बढ़ते कटाव ने एक बार फिर खौफनाक मंजर पैदा कर दिया है। मिश्रा कॉलोनी से लेकर रेलवे पुल और पुराने यातायात पुल के बीच गंगा की लहरें अब सीधे जमीन को निगल रही हैं। पिछले दो दिनों से कटाव की रफ्तार इतनी तेज हो गई है कि मिट्टी के बड़े-बड़े टीले ताश के पत्तों की तरह गंगा में समा रहे हैं। विडंबना देखिए कि करोड़ों के बजट वाले सिंचाई विभाग ने इस विशाल संकट का समाधान ‘बांस और बल्लियों’ में खोजा है।
आपदा की आहट: ‘मिश्रा कॉलोनी’ के बाद अब पुलों पर खतरा
अक्टूबर-नवंबर में जब गंगा ने अपना रौद्र रूप दिखाया था, तब प्रशासन ने खानापूर्ति करते हुए कुछ अस्थायी इंतजाम किए थे। लेकिन गंगा की धारा ने अब अपनी दिशा बदल ली है। वर्तमान में रेलवे पुल और पुराने पुल के बीच का हिस्सा सबसे अधिक प्रभावित है। धारा सीधे तट से टकरा रही है, जिससे बालू और मिट्टी का कटान रुकने का नाम नहीं ले रहा। यह केवल जमीन का कटाव नहीं है, बल्कि यह उन दो लाइफलाइन पुलों की नींव के लिए भी चेतावनी है जो उन्नाव को कानपुर और लखनऊ से जोड़ते हैं।
“बांस-बल्लियों” का मजाक और जनता का दर्द
स्थानीय निवासियों का कहना है कि प्रशासन केवल तब जागता है जब पानी सिर के ऊपर निकल जाता है। सिंचाई विभाग ने जिलाधिकारी के निर्देश पर जो अस्थायी अवरोध लगाए थे, वे गंगा की प्रचंड धारा के सामने खिलौने साबित हो रहे हैं। निवासियों का आरोप है कि ठोस ‘पत्थर पिचिंग’ (Stone Pitching) और स्थायी ‘तटबंध’ (Embankment) बनाने के बजाय केवल कागजों पर बजट ठिकाने लगाया जा रहा है।
मिश्रा कॉलोनी के परिवारों की रातें अब जागकर कट रही हैं। उन्हें डर है कि अगर कटान आबादी तक पहुँचा, तो वे अपना घर-बार खो देंगे। क्या प्रशासन इन लोगों को बेघर होने के बाद मुआवजा देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी करेगा?
सरकार और सिंचाई विभाग से 5 तीखे सवाल:
- स्थायी समाधान क्यों नहीं? हर साल करोड़ों रुपये बाढ़ नियंत्रण के नाम पर खर्च होते हैं, तो फिर गंगा के किनारे आज भी पत्थर पिचिंग का काम अधूरा क्यों है?
- विशेषज्ञों की राय कहाँ है? आधुनिक इंजीनियरिंग के दौर में भी उन्नाव में ‘बांस-बल्ली’ तकनीक का इस्तेमाल क्यों हो रहा है? क्या विभाग के पास कोई हाइड्रोलिक एक्सपर्ट नहीं है?
- पुलों की सुरक्षा पर चुप्पी क्यों? रेलवे और यातायात पुल के बीच का कटाव पुलों की नींव को कमजोर कर सकता है। क्या पीडब्ल्यूडी (PWD) और रेलवे विभाग इस खतरे का आकलन कर रहे हैं?
- कार्तिक पूर्णिमा की पाबंदी से क्या मिला? प्रशासन ने स्नान पर रोक लगा दी थी, लेकिन क्या उस समय का उपयोग स्थायी सुरक्षा दीवार बनाने में किया गया? या सिर्फ भीड़ रोकने को ही उपलब्धि मान लिया गया?
- जिम्मेदारी तय कब होगी? यदि कटान की वजह से कोई मकान गिरता है या जान-माल की हानि होती है, तो क्या जिलाधिकारी और सिंचाई विभाग के इंजीनियरों पर एफआईआर दर्ज होगी?
जनता की मांग: अब ‘जुमले’ नहीं ‘जमीन’ चाहिए
स्थानीय लोगों ने साफ कर दिया है कि उन्हें अब आश्वासन नहीं चाहिए। गंगा की लहरों को रोकने के लिए आधुनिक तकनीक, जियो-बैग्स (Geo-bags) और भारी पत्थरों की पिचिंग की तुरंत आवश्यकता है। अगर अगले कुछ दिनों में ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो मगरवारा से लेकर मिश्रा कॉलोनी तक के लोग सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे।
निष्कर्ष: वक्त कम है, खतरा बड़ा है
गंगा का कटाव कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है। अगर समय रहते स्थायी तटबंध का निर्माण नहीं शुरू हुआ, तो उन्नाव का एक बड़ा हिस्सा इतिहास के पन्नों में दब जाएगा। उत्तर प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करे और बजट की बंदरबांट रोकने के लिए एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी गठित करे।
रिपोर्ट: [प्रलभ शरण चौधरी/Truth India Times]
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