CM से मिलने जा रहे अन्नदाताओं का रास्ता रोका; 11 सूत्रीय मांगों पर ‘बैसवारा’ का हल्लाबोल, आखिर कब तक किसानों की आवाज दबाएगा प्रशासन?

उन्नाव। लोकतंत्र में अपनी मांगों को लेकर सत्ता के शीर्ष तक जाना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन उन्नाव में गुरुवार को नजारा कुछ और ही था। भारतीय किसान यूनियन (बैसवारा गुट) द्वारा मुख्यमंत्री से मिलने के लिए निकाली गई पदयात्रा को पुलिसिया ताकत के दम पर ऊंचगांव चौराहे के पास ही रोक दिया गया। ‘बक्सर’ की पवित्र धरती से शुरू हुई यह यात्रा भले ही रोक दी गई हो, लेकिन इसने प्रशासन और सरकार की कार्यप्रणाली पर 11 ऐसे सुलगते सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब फिलहाल किसी अधिकारी के पास नहीं है।

मंदिर से शुरू हुआ संघर्ष, चौराहे पर पहरा

गुरुवार दोपहर लगभग 12 बजे प्रदेश अध्यक्ष पवन शुक्ला के नेतृत्व में सैकड़ों किसान मां चंद्रिका देवी मंदिर, बक्सर में एकत्रित हुए। किसानों का संकल्प था कि वे पैदल चलकर मुख्यमंत्री तक अपनी पीड़ा पहुँचाएंगे। हाथ में यूनियन का झंडा और जुबां पर अपनी समस्याओं के नारे लिए किसान जैसे ही ऊंचगांव चौराहे के पास पहुँचे, भारी पुलिस बल ने उनका रास्ता काट दिया।

थाना बारा सगवर प्रभारी धर्मेंद्र मिश्र के नेतृत्व में पुलिस ने घेराबंदी कर किसानों को आगे बढ़ने से मना कर दिया। इस दौरान किसानों और पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक भी हुई। माहौल में तनाव देख उच्चाधिकारियों ने हस्तक्षेप किया, लेकिन किसानों के मन में यह सवाल गहरे बैठ गया कि “क्या अब मुख्यमंत्री से अपनी बात कहना भी अपराध है?”

11 सूत्रीय मांगें: केवल कागज नहीं, किसानों का दर्द है

भाकियू (बैसवारा) के प्रदेश अध्यक्ष पवन शुक्ला ने प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सरकार केवल ‘किसान कल्याण’ का ढोल पीट रही है, जबकि धरातल पर अधिकारी भ्रष्टाचार और अनदेखी के पर्याय बन चुके हैं। किसानों की प्रमुख मांगों ने शासन की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगाए हैं:

  1. राजस्व विभाग की मनमानी: क्या नामांतरण (दाखिल-खारिज), पैमाइश और खतौनी सुधार के लिए किसानों को दफ्तरों के चक्कर काटना और ‘सुविधा शुल्क’ देना ही उनकी नियति है? महीनों तक फाइलें क्यों दबी रहती हैं?
  2. अवैध खनन का ‘माफिया तंत्र’: उन्नाव में अवैध खनन के कारण सड़कें छलनी हो रही हैं और पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुँच रही है। क्या यह संबंधित विभाग की मिलीभगत के बिना संभव है?
  3. अन्ना गौवंश का आतंक: गौशालाओं के नाम पर करोड़ों का बजट कहाँ जा रहा है? जब रात-रात भर किसान अपने खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं, तो सरकारी दावों की क्या अहमियत है?
  4. सरकारी योजनाओं में बंदरबांट: ब्लॉक स्तर पर पात्र किसानों को योजनाओं का लाभ क्यों नहीं मिल रहा? अधिकारी शिकायतों को कूड़ेदान में क्यों डाल देते हैं?

लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन?

पवन शुक्ला ने दोटूक शब्दों में कहा कि प्रशासन द्वारा पदयात्रा को रोकना लोकतांत्रिक अधिकारों का खुला हनन है। जब किसान शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज उठाना चाहता है, तो उसे ‘शक्ति’ के जरिए चुप करा दिया जाता है। यह रवैया इस बात का सबूत है कि जिले का प्रशासनिक अमला अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए किसानों की आवाज दबा रहा है।

किसानों ने चेतावनी दी है कि वे पुलिस की लाठियों और घेराबंदी से डरने वाले नहीं हैं। यदि 11 सूत्रीय मांगों पर जिला प्रशासन ने त्वरित संज्ञान नहीं लिया और संबंधित विभागों के भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं की, तो यह आंदोलन केवल पदयात्रा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जिले भर में चक्का जाम और अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया जाएगा।

प्रशासन के नाम जनता का संदेश

‘Truth India Times’ इस मुद्दे पर प्रशासन से जवाबदेही की मांग करता है। क्या किसानों को रोकना ही उनकी समस्याओं का समाधान है? पुलिस बल का उपयोग व्यवस्था बनाए रखने के लिए होना चाहिए, न कि जायज मांगों को उठाने वाले अन्नदाताओं के दमन के लिए।

अधिकारी एसी कमरों में बैठकर रिपोर्ट तैयार करने के बजाय अगर तहसील और ब्लॉक स्तर पर जाकर जनसुनवाई करें, तो शायद किसानों को सड़कों पर उतरने की जरूरत ही न पड़े। फिलहाल, ऊंचगांव चौराहे पर रोकी गई यह भीड़ प्रशासन के लिए आने वाले समय में बड़ी चुनौती बन सकती है।


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