उन्नाव की बेटी का 'कत्ल-ए-इंसाफ': कुलदीप सेंगर को बेल, आधी रात इंडिया गेट पर घसीटी गई पीड़िताउन्नाव की बेटी का 'कत्ल-ए-इंसाफ': कुलदीप सेंगर को बेल, आधी रात इंडिया गेट पर घसीटी गई पीड़िता
प्रलभ शरण चौधरी/उन्नाव/Truth India Times
उन्नाव। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और न्याय प्रणाली पर आज एक ऐसा दाग लगा है, जिसे मिटाना आसान नहीं होगा। सात साल का लंबा संघर्ष, परिवार के पांच सदस्यों की लाशें, जानलेवा एक्सीडेंट और दर्जनों सर्जरी झेलने वाली उन्नाव की बेटी आज फिर हार गई। 2017 के चर्चित गैंगरेप कांड के मुख्य दोषी और पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दिल्ली हाई कोर्ट ने जमानत दे दी है। इस फैसले के विरोध में जब पीड़िता अपनी मां के साथ इंडिया गेट पर न्याय की गुहार लगाने पहुंची, तो सिस्टम ने मरहम लगाने के बजाय उन्हें आधी रात को सड़क पर घसीटकर वहां से हटा दिया।
यह सवाल अब देश की गलियों से लेकर संसद तक गूँज रहा है—“क्या रसूखदार अपराधियों के लिए कानून के दरवाजे अलग से खुलते हैं?”
आधी रात इंडिया गेट पर सिस्टम की बेरहमी
मंगलवार की शाम जब दिल्ली की ठिठुरती ठंड में पीड़िता, उसकी मां और सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना इंडिया गेट के सामने धरने पर बैठीं, तो उनकी आंखों में आंसू और हाथों में इंसाफ की तख्ती थी। लेकिन आधी रात होते-होते दिल्ली पुलिस का भारी अमला वहां पहुंच गया। पुलिस ने संवेदनशीलता दिखाने के बजाय तीनों को जबरन उठाकर पुलिस वैन में डाल दिया।
एक्टिविस्ट योगिता भयाना ने सोशल मीडिया पर इस बर्बरता का वीडियो साझा करते हुए सवाल किया, “एक गैंगरेप पीड़िता जिसने अपना पूरा परिवार खो दिया, क्या उसके साथ ऐसा व्यवहार उचित है? क्या न्याय मांगना अब अपराध है?” फिलहाल पीड़िता और उसकी मां को पुलिस कहां ले गई है, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।
पीड़िता की रूह कंपा देने वाली पुकार: “वो मुझे मार देंगे”
कोर्ट के फैसले के बाद पीड़िता का बयान किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर सकता है। उसने भरे गले से कहा, “आज जजमेंट सुनकर लगा कि सुसाइड कर लूं। मेरे दो मासूम बच्चे हैं, पति हैं, मेरा भाई है। अगर मैं नहीं रही, तो उनका क्या होगा? पहले मेरे चाचा की बेल खारिज की गई, फिर मेरी सुरक्षा हटाई गई और अब तीन महीने बाद चुपचाप यह फैसला सुना दिया गया।”
पीड़िता ने सीधे तौर पर अपनी जान को खतरा बताया है। उसने कहा कि कुलदीप सेंगर का साम्राज्य आज भी उतना ही मजबूत है। उसके आदमी बाहर घूम रहे हैं। कोर्ट ने भले ही 5 किलोमीटर दूर रहने की शर्त लगाई हो, लेकिन 5 किलोमीटर की दूरी गोलियों और रसूख के लिए कुछ भी नहीं है।
साजिश की बू: चुनाव, सजा का सस्पेंशन और रसूख
एक्टिविस्ट योगिता भयाना ने इस पूरे घटनाक्रम को एक ‘सोची-समझी साजिश’ करार दिया है। उन्होंने सीधे तौर पर सरकार और सिस्टम को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा:
- चुनावी गणित: उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों को देखते हुए एक बाहुबली नेता को बाहर निकाला जा रहा है ताकि राजनीतिक रोटियां सेंकी जा सकें।
- सुरक्षा पर प्रहार: पीड़िता के पैरोकारों और जमानतियों की सुरक्षा को पहले ही कमजोर कर दिया गया था, जो इस रिहाई की पटकथा का हिस्सा लगता है।
- न्याय का गला घोंटना: जिस अपराधी ने पीड़िता के पिता को कस्टडी में मरवाया, उसकी बुआ और मौसी को एक्सीडेंट में खत्म कर दिया, उसे 15 लाख रुपये के मुचलके पर रिहा करना न्याय का मजाक है।
हाई कोर्ट का फैसला और वो चार शर्तें
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद और हरीश वैद्यनाथन शंकर की बेंच ने सेंगर की उम्रकैद की सजा को तब तक के लिए ‘सस्पेंड’ (स्थगित) कर दिया है, जब तक उसकी अपील पर अंतिम सुनवाई पूरी नहीं हो जाती। अदालत ने सेंगर को 15 लाख के निजी मुचलके पर रिहा करने के साथ ये शर्तें रखी हैं:
- वह पीड़िता से कम से कम 5 किलोमीटर दूर रहेगा।
- हर सोमवार को स्थानीय पुलिस स्टेशन में हाजिरी लगानी होगी।
- पासपोर्ट जमा करना होगा ताकि वह देश न छोड़ सके।
- शर्तों का उल्लंघन होने पर बेल तुरंत रद्द कर दी जाएगी।
पर सवाल यह है कि क्या ये शर्तें उस परिवार को सुरक्षा दे पाएंगी, जिसके आधे सदस्य पहले ही ‘हादसों’ की भेंट चढ़ चुके हैं?
फ्लैशबैक: उन्नाव कांड की वो खौफनाक दास्तां
यह मामला 2017 का है, जब एक 17 साल की लड़की ने तत्कालीन भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर पर गैंगरेप का आरोप लगाया था। इस केस को दबाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की गई:
- अप्रैल 2018: पीड़िता के पिता की पुलिस कस्टडी में बेरहमी से पिटाई के बाद मौत हो गई।
- जुलाई 2019: रायबरेली में पीड़िता की कार को एक ट्रक ने टक्कर मार दी, जिसमें उसकी चाची और मौसी की मौत हो गई, जबकि पीड़िता और उसके वकील महीनों तक वेंटिलेटर पर रहे।
- दिसंबर 2019: दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने सेंगर को ‘मृत्यु तक जेल’ (उम्रकैद) की सजा सुनाई और 25 लाख का जुर्माना लगाया।
सरकार से सीधे सवाल
इस घटना ने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के नारों को खोखला साबित कर दिया है। सरकार को इन सवालों के जवाब देने होंगे:
- एक दोषी विधायक जिसे कोर्ट ने ‘मौत तक जेल’ की सजा दी थी, उसे अचानक चुनाव से पहले बाहर लाने की क्या मजबूरी थी?
- पीड़िता की जान को खतरा होने के बावजूद उसकी सुरक्षा व्यवस्था क्यों ढीली की गई?
- दिल्ली पुलिस ने पीड़िता को इंडिया गेट से किस अधिकार और किस संवेदनहीनता के साथ घसीटकर हटाया?
निष्कर्ष
कुलदीप सेंगर की रिहाई केवल एक अपराधी की जेल से वापसी नहीं है, बल्कि यह उन हजारों बेटियों के हौसलों की हार है जो रसूखदारों के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत करती हैं। अगर 28 दिसंबर को पिता की हत्या वाले मामले में भी सेंगर को जमानत मिल जाती है, तो वह जेल से बाहर आ जाएगा। उन्नाव की वह बेटी आज फिर से उसी खौफ के साये में है, जिससे लड़कर वह मौत के मुंह से बाहर आई थी। क्या हमारा तंत्र इतना लाचार है कि वह एक पीड़िता को सुरक्षित होने का अहसास भी नहीं दिला सकता?
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