गंगा का विकराल रूप! रेलवे और यातायात पुल के नीचे मची तबाही
उन्नाव | उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में मोक्षदायिनी गंगा इन दिनों तटीय इलाकों के लिए मुसीबत का सबब बनी हुई हैं। गंगा नदी में लगातार हो रहे भीषण कटान ने न केवल पारिस्थितिक तंत्र को बिगाड़ दिया है, बल्कि शहर के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों के लिए भी खतरे की घंटी बजा दी है। रेलवे पुल और पुराने यातायात पुल के ठीक नीचे हो रहे भू-क्षरण ने प्रशासन की तैयारियों की पोल खोल कर रख दी है। विशालकाय मिट्टी के टीले और बालू के हिस्से देखते ही देखते गंगा की लहरों में विलीन हो रहे हैं, जिससे तटीय क्षेत्र तेजी से सिकुड़ रहा है।
पुलों के अस्तित्व पर संकट: उपेक्षित है संवेदनशील हिस्सा
गंगा के किनारे हो रहा यह कटान सामान्य नहीं है। स्थानीय विशेषज्ञों और निवासियों का कहना है कि जिस स्थान पर रेलवे पुल और पुराना यातायात पुल स्थित है, वहां की जमीन का खिसकना बेहद खतरनाक संकेत है। पुराने यातायात पुल के नीचे बड़े पैमाने पर हो रहे भू-क्षरण के कारण पुल की नींव के आसपास की सुरक्षात्मक मिट्टी बह रही है।
यद्यपि सिंचाई विभाग ने मिश्रा कॉलोनी की ओर बांस-बल्ली और कुछ सुरक्षात्मक उपाय करके कटान रोकने का प्रयास किया है, जिससे उस विशेष क्षेत्र में आंशिक राहत मिली है, लेकिन रेलवे पुल और यातायात पुल के बीच का बड़ा हिस्सा अब भी पूरी तरह से उपेक्षित है। अधिकारियों की यह चयनात्मक कार्यप्रणाली स्थानीय लोगों की समझ से परे है।
आबादी की ओर बढ़ती लहरें, ग्रामीणों में दहशत
कटान का सिलसिला अब घनी आबादी के बेहद करीब पहुँच चुका है। गंगा नदी के किनारे बसे गांवों और मोहल्लों के लोग रात-रात भर जागकर गुजार रहे हैं। निवासियों का आरोप है कि उन्होंने जिला प्रशासन और संबंधित विभागों को कई बार लिखित और मौखिक रूप से इस भयावह स्थिति से अवगत कराया, लेकिन हर बार उन्हें कोरे आश्वासन ही मिले।
स्थानीय निवासी कहते हैं, “नदी का पानी धीरे-धीरे हमारी जमीनों को निगल रहा है। अगर समय रहते पत्थर के बोल्डर या पक्का बांध नहीं बनाया गया, तो अगले कुछ महीनों में हमारे मकान भी गंगा की गोद में होंगे।” प्रशासन की इस कथित लापरवाही ने जनता में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है।
तीर्थ पुरोहितों पर रोजी-रोटी का संकट
गंगा का यह कटान सिर्फ भूगोल ही नहीं बदल रहा, बल्कि सदियों से चली आ रही संस्कृति और आजीविका पर भी प्रहार कर रहा है। गंगा घाटों पर धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ कराने वाले तीर्थ पुरोहितों (पंडों) का जीवन दूभर हो गया है। कटान के कारण घाटों की सीढ़ियां और किनारे असुरक्षित हो गए हैं।
एक बुजुर्ग पंडे ने भावुक होते हुए बताया, “गंगा मैया के किनारे बैठकर हम पूर्वजों का तर्पण और श्रद्धालुओं का पूजन कराते थे। लेकिन अब कटान ने घाट तक पहुँचने वाले रास्ते को संकरा और जानलेवा बना दिया है। श्रद्धालु अब यहाँ आने से डरते हैं। पहले सुबह से शाम तक चहल-पहल रहती थी, अब सन्नाटा पसरा रहता है। हमारी आजीविका पूरी तरह ठप होने की कगार पर है।”
प्रशासनिक अनदेखी और बढ़ता खतरा
आरोप है कि सिंचाई विभाग और जिला प्रशासन केवल कागजी खानापूर्ति में जुटे हैं। जहाँ कटान सबसे तीव्र है, वहां ठोस बचाव कार्य के बजाय अस्थायी समाधान खोजे जा रहे हैं। यदि भू-क्षरण की यही रफ्तार जारी रही, तो आने वाले समय में सार्वजनिक संपत्तियों और सरकारी पुलों को अपूरणीय क्षति पहुँच सकती है।
तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि नदी की धारा का रुख बदलने और पुलों के पायों को सुरक्षित रखने के लिए ‘जियो बैग्स’ और ‘बोल्डर पिचिंग’ जैसे स्थायी समाधानों की तत्काल आवश्यकता है। लेकिन फिलहाल मौके पर ऐसी कोई बड़ी मशीनरी या कार्य योजना दिखाई नहीं दे रही है।
सरकार से शीघ्र हस्तक्षेप की मांग
उन्नाव की जनता ने अब मुख्यमंत्री और शासन स्तर पर इस मामले में हस्तक्षेप की गुहार लगाई है। लोगों की मांग है कि:
- रेलवे और यातायात पुल के नीचे युद्धस्तर पर सुरक्षा कार्य शुरू किया जाए।
- प्रभावित घाटों का पुनरुद्धार कर तीर्थ पुरोहितों के बैठने की सुरक्षित व्यवस्था की जाए।
- तटीय इलाकों के ग्रामीणों के लिए सुरक्षा दीवार (Flood Wall) का निर्माण कराया जाए।
दशकों से गंगा की सेवा करने वाले इन तटीय क्षेत्रों को यदि आज नहीं बचाया गया, तो भविष्य में होने वाले जान-माल के नुकसान की जिम्मेदारी पूरी तरह से स्थानीय प्रशासन की होगी। नोटिस और सर्वे के खेल से इतर अब धरातल पर पत्थर और कंक्रीट के सुरक्षा घेरे की दरकार है।
रिपोर्ट: प्रलभ शरण चौधरी | Truth India Times
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