गंगाघाट गोशाला बनी पशुओं की 'कब्रगाह'
प्रलभ शरण चौधरी (Truth India Times)
उन्नाव। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जहां एक ओर गौवंश के संरक्षण के लिए करोड़ों का बजट पानी की तरह बहा रही है, वहीं उन्नाव के प्रशासनिक गलियारों में बैठे कुछ ‘सफेदपोश’ और भ्रष्ट अधिकारी इस पवित्र अभियान को पलीता लगाने में जुटे हैं। ताजा मामला नगर पालिका परिषद गंगाघाट द्वारा संचालित गोशाला का है, जहां पशुओं की सेवा के नाम पर भ्रष्टाचार का ऐसा नंगा नाच चल रहा है जिसे सुनकर रूह कांप जाए। गंभीर आरोप हैं कि यहां पशु चारे और पानी के अभाव में दम तोड़ रहे हैं, जबकि कागजों पर सब ‘चंगा’ दिखाया जा रहा है।
महावीर का ‘महा-खुलासा’: कागजों पर पशु, जमीन पर कंकाल
ग्राम कन्हवापुर निवासी महावीर ने जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र सौंपकर व्यवस्था की बखिया उधेड़ दी है। महावीर का दावा है कि गोशाला में 1750 से अधिक पशु दर्ज हैं, लेकिन हकीकत में उनका हाल बेहाल है। आरोप है कि सरकारी खजाने से इन बेजुबानों के चारे और रखरखाव के लिए जो भारी-भरकम राशि आती है, वह गायों के पेट में जाने के बजाय अधिकारियों और लिपिकों की जेब में जा रही है।
शिकायतकर्ता ने सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि गोशाला में न तो पर्याप्त चारा है और न ही पीने के साफ पानी की व्यवस्था। भूख और प्यास से तड़प-तड़प कर गौवंश दम तोड़ रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि मृत पशुओं का न तो पोस्टमॉर्टम कराया जा रहा है और न ही किसी वैधानिक प्रक्रिया का पालन। साक्ष्यों को मिटाने के लिए आनन-फानन में उन्हें दफना दिया जाता है।
लिपिक और अधिकारियों की ‘जुगलबंदी’: भ्रष्टाचार का सिंडिकेट
महावीर ने अपने पत्र में नगर पालिका के एक रसूखदार लिपिक और अन्य कर्मचारियों पर मिलीभगत का सनसनीखेज आरोप लगाया है। शिकायत के अनुसार, जब भी कोई जागरूक नागरिक इन अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे सुधारने के बजाय सरकारी तंत्र उसे ही कुचलने की कोशिश करता है।
महावीर का आरोप है कि उन्हें जान से मारने की धमकियां दी जा रही हैं और अधिकारियों द्वारा अभद्र व्यवहार किया जा रहा है। यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर एक लिपिक और कुछ कर्मचारी इतने बेखौफ कैसे हैं? क्या उन्हें ऊपर बैठे किसी ‘बड़े साहब’ का संरक्षण प्राप्त है? सरकारी धन के बंदरबांट का यह खेल बिना ऊंचे रसूख के मुमकिन नहीं दिखता।
साक्ष्य तैयार, प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
शिकायतकर्ता ने स्पष्ट किया है कि उसके पास मृत पशुओं की तस्वीरें, वीडियो और अन्य पुख्ता साक्ष्य मौजूद हैं। उसने जिलाधिकारी से मांग की है कि एक उच्चस्तरीय स्वतंत्र टीम बनाकर जांच कराई जाए, न कि उन्हीं अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी जाए जो खुद शक के घेरे में हैं।
फिलहाल, इस मामले पर जिला प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी कई सवाल पैदा कर रही है। क्या प्रशासन किसी बड़े घोटाले को दबाने की कोशिश कर रहा है? या फिर जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति की जाएगी?
जनता पूछ रही सवाल: कहाँ गया बजट?
गोशाला प्रबंधन पर लगे ये आरोप केवल पशु क्रूरता का मामला नहीं हैं, बल्कि यह सीधे तौर पर सरकारी धन के गबन और धोखाधड़ी का मामला है। 1750 पशुओं के नाम पर हर महीने लाखों रुपये का बजट निकाला जाता है। अगर यह पैसा चारे पर खर्च नहीं हो रहा, तो आखिर किसकी तिजोरी भर रहा है?
‘Truth India Times’ इस मामले की तह तक जाएगा। अगर आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ न केवल विभागीय कार्रवाई होनी चाहिए, बल्कि गौवंश की हत्या और सरकारी धन की चोरी के जुर्म में उन्हें जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिए। अब गेंद जिलाधिकारी के पाले में है—क्या वे इन ‘सफेदपोश कसाईयों’ पर कार्रवाई करेंगे या फाइल दबा दी जाएगी?
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