उन्नाव में प्रशासन की नाक के नीचे 'अधर्म': प्राचीन मंदिर के पास अवैध मांस की दुकान
उन्नाव (मगरवारा)। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का सख्त निर्देश है कि किसी भी धार्मिक स्थल के निर्धारित दायरे में मांस-मदिरा की दुकानें नहीं संचालित होंगी। लेकिन उन्नाव के मगरवारा इलाके में इन सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं। प्राचीन गोकुल बाबा शिव मंदिर के ठीक पास अवैध रूप से मांस की दुकान का संचालन न केवल नियमों का उल्लंघन था, बल्कि यह स्थानीय हिंदुओं की आस्था पर भी सीधा प्रहार था। जब प्रशासन गहरी नींद में सोया रहा, तो अंततः हिंदू संगठनों को मोर्चा संभालना पड़ा।
क्या प्रशासन को ‘आक्रोश’ का इंतजार था?
मगरवारा स्थित गोकुल बाबा शिव मंदिर क्षेत्र का अत्यंत प्राचीन और प्रतिष्ठित मंदिर है। यहाँ रोजाना सैकड़ों श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए आते हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि मंदिर के बिल्कुल समीप मांस की दुकान खुलने से भक्तों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। कई बार मौखिक शिकायतों के बावजूद नगर पालिका और स्थानीय प्रशासन ने इसे अनदेखा किया।
सवाल यह है कि क्या प्रशासन किसी बड़े सांप्रदायिक तनाव या विवाद का इंतजार कर रहा था? बजरंग दल के जिला संयोजक नितिन शुक्ला के नेतृत्व में जब सैकड़ों कार्यकर्ता और गौरक्षा प्रमुख विकास मौके पर पहुंचे, तब जाकर व्यवस्था हरकत में आई।
जब रक्षक ही सो जाएं, तो सड़कों पर उतरता है समाज
हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने मौके पर पहुंचकर न केवल विरोध दर्ज कराया, बल्कि अपनी मर्यादा का परिचय देते हुए शांतिपूर्ण ढंग से दुकान को हटवाया। कार्यकर्ताओं का गुस्सा जायज था—”आखिर आस्था के केंद्र के पास हड्डियाँ और मांस के लोथड़े कैसे बर्दाश्त किए जा सकते हैं?”
बजरंग दल के जिला संयोजक नितिन शुक्ला ने दो टूक कहा कि धार्मिक स्थलों की पवित्रता से खिलवाड़ किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने प्रशासन को चेतावनी भी दी कि भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति न हो, अन्यथा संगठन उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होगा।
सरकार और जिला प्रशासन के लिए 5 तीखे सवाल:
- नियमों की फाइलें कहाँ दबी हैं? उत्तर प्रदेश में धार्मिक स्थलों के पास मांस की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध है, फिर भी यह दुकान किसके संरक्षण में चल रही थी?
- खुफिया तंत्र और बीट सिपाही क्या कर रहे थे? सदर कोतवाली क्षेत्र के मगरवारा में यह गतिविधि पुलिस की नजरों से कैसे बच गई? क्या पुलिस और दुकान संचालक के बीच कोई ‘साठगांठ’ थी?
- नगर पालिका का सर्वे फेल क्यों? अवैध अतिक्रमण और अवैध दुकानों को चिन्हित करना नगर पालिका का काम है। क्या अधिकारियों ने कभी इस क्षेत्र का निरीक्षण करना जरूरी नहीं समझा?
- आम जनता की शिकायतों की अनदेखी क्यों? स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे लंबे समय से इस पर आपत्ति जता रहे थे। क्या आम नागरिक की आवाज की प्रशासन के पास कोई कीमत नहीं है?
- जिम्मेदारी किसकी? यदि इस विरोध प्रदर्शन के दौरान कोई बड़ी घटना हो जाती, तो इसका जिम्मेदार कौन होता? क्या प्रशासन केवल ‘पोस्टमार्टम’ की राजनीति करना जानता है?
‘कार्रवाई’ के नाम पर सिर्फ खानापूरी?
सूचना मिलने पर सदर कोतवाली पुलिस मौके पर जरूर पहुंची, लेकिन तब तक हिंदू संगठन स्थिति संभाल चुके थे। पुलिस ने आश्वासन दिया है कि नियमों के विपरीत कोई काम नहीं होने दिया जाएगा। मगर जनता पूछ रही है कि यह ‘चेतावनी’ दुकान खुलने के पहले दिन क्यों नहीं दी गई?
निष्कर्ष: तुष्टीकरण या लापरवाही?
यह घटना दर्शाती है कि कागजों पर कड़क दिखने वाला प्रशासन धरातल पर कितना ढीला है। मुख्यमंत्री के कड़े निर्देशों के बावजूद उन्नाव के मगरवारा जैसी घटनाएं सरकार की छवि खराब कर रही हैं। मंदिर के पास मांस की दुकान का होना सिर्फ एक दुकान का मामला नहीं है, बल्कि यह हिंदुओं की सहिष्णुता की परीक्षा लेने जैसा है।
प्रशासन को चाहिए कि वह अब केवल आश्वासन न दे, बल्कि पूरे जिले के मंदिरों के आसपास का सर्वे कराकर ऐसी अवैध गतिविधियों को जड़ से खत्म करे, ताकि भविष्य में किसी संगठन को कानून हाथ में लेने या सड़क पर उतरने की आवश्यकता न पड़े।
रिपोर्ट: [प्रलभ शरण चौधरी/उन्नाव/ब्यूरो]
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