'सर्वे' के नाम पर 36 साल से 'खूनी खेल': 200 बीघा जमीन का नक्शा 'गायब'
उन्नाव | प्रलभ शरण चौधरी (Truth India Times):
उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक निकम्मेपन की एक ऐसी ‘दास्तान’ सामने आई है, जिसने सरकारी सिस्टम के इकबाल को तार-पसार कर दिया है। मामला मझरा पीपरखेडा एहतमाली गांव का है, जहां पिछले 36 वर्षों से सर्वे बंदोबस्त का कार्य फाइलों में दफन है। ताज्जुब की बात यह है कि जिस दौर में दुनिया चांद पर बसने की तैयारी कर रही है, उन्नाव का राजस्व और सर्वे विभाग 1991 से शुरू हुए एक सर्वे को आज तक पूरा नहीं कर पाया है। आरोप है कि इस ‘सुनियोजित देरी’ की आड़ में अरबों की जमीन का बंदरबांट किया जा रहा है और गरीब किसानों को फर्जी नक्शों के जाल में फांसकर उनका मानसिक और आर्थिक कत्ल किया जा रहा है।
1991 से शुरू हुआ ‘झूठ का पुलिंदा’
मझरा पीपरखेडा एहतमाली गांव के किसानों की किस्मत पर ताला साल 1991 में लगा, जब सर्वे विभाग ने ‘रिकॉर्ड ऑपरेशन’ शुरू किया। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि उनकी जमीनों का सही सीमांकन होगा और पुश्तैनी विवाद सुलझेंगे। लेकिन 36 साल बीत जाने के बाद भी नतीजा ‘ढाक के तीन पात’ है। ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग ने जानबूझकर त्रुटियों को नहीं सुधारा ताकि विवाद बना रहे और ‘सुविधा शुल्क’ का रास्ता खुला रहे। आज आलम यह है कि गांव का न तो कोई सही भू-अलेख है और न ही प्रमाणित मानचित्र।
सरकारी स्वीकारोक्ति: 200 बीघा जमीन ‘हवा’ में गायब!
इस मामले में सबसे सनसनीखेज खुलासा खुद सर्वे रिकॉर्ड ऑफिसर (ए.आर.ओ.) प्रशांत कुमार के एक पत्र से हुआ है। 18 अगस्त 2024 को राजस्व परिषद को लिखे पत्र में उन्होंने स्वीकार किया कि उपलब्ध मानचित्र खतौनी के क्षेत्रफल से 200 बीघा छोटा है। यानी सरकारी कागजों में तो जमीन है, लेकिन नक्शे से 200 बीघा जमीन ‘गायब’ कर दी गई है।
ए.आर.ओ. ने खुद माना कि विभाग के पास उपलब्ध मानचित्र:
- दिशाहीन और फर्जी है।
- किसी सक्षम अधिकारी से प्रमाणित नहीं है।
- पड़ोसी गांवों (नेतवा, सरैया, फतेहपुर) की सीमाओं से मेल नहीं खाता।
अब सवाल यह उठता है कि जब अधिकारी खुद मान रहे हैं कि नक्शा ‘फर्जी’ है, तो उसी फर्जी नक्शे के आधार पर किसानों का उत्पीड़न क्यों किया जा रहा है?
पूंजीपतियों को ‘मलाई’, किसानों को ‘धक्के’
ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि सर्वे विभाग के अधिकारी, विशेषकर ए.आर.ओ. प्रशांत कुमार और कानूनगो देवेंद्र यादव, प्रभावशाली पूंजीपतियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।
- प्रभावशाली लोगों को लाभ: आरोप है कि रसूखदारों की जमीनों को बचाने के लिए नक्शे में हेरफेर किया गया।
- अवैध कब्जा सत्यापन: कब्जा सत्यापन की प्रक्रिया को अधूरा छोड़ दिया गया है, जिससे अवैध कब्जों को संरक्षण मिल रहा है।
- किसानों का मानसिक दमन: पीड़ित पंकज सिंह और श्रद्धा सिंह ने बताया कि उन्हें वर्षों से कचहरी और दफ्तरों के चक्कर कटवाए जा रहे हैं। गलत सर्वे के कारण उन्हें अपनी ही जमीन पर ‘अतिक्रमणकारी’ साबित करने की कोशिश की जाती है।
1959 का ‘बिना मुहर’ का नक्शा: यह डिजिटल इंडिया है?
सहायक अभिलेख अधिकारी, उन्नाव ने 2018 में जनसूचना के तहत जो जानकारी दी थी, वह किसी मजाक से कम नहीं है। उन्होंने बताया कि विभाग आज भी 1367 फसली (सन् 1959 ई.) के पुराने नक्शे पर निर्भर है, जो प्रमाणित तक नहीं है। 36 साल के सर्वे ऑपरेशन के बाद भी नया और सही नक्शा न बन पाना विभाग की अक्षमता की पराकाष्ठा है। यह सीधे तौर पर राजस्व परिषद की कार्यप्रणाली पर एक काला धब्बा है।
प्रलभ शरण चौधरी की ‘तीखी’ राय (Truth India Times)
36 साल कोई छोटा वक्त नहीं होता। एक पीढ़ी जवान होकर बूढ़ी हो गई, लेकिन उन्नाव के इस गांव का नक्शा दुरुस्त नहीं हुआ। क्या यह महज ‘लापरवाही’ है? बिल्कुल नहीं। यह एक संगठित भ्रष्टाचार है। जब जमीन का नक्शा गलत होता है, तो विवाद होते हैं, और जब विवाद होते हैं, तो तहसीलों में ‘भ्रष्टाचार की फसल’ लहलहाती है। 200 बीघा जमीन का कम होना कोई मामूली त्रुटि नहीं है, यह एक बड़ा ‘लैंड स्कैम’ (Land Scam) हो सकता है जिसकी जांच सीबीआई स्तर पर होनी चाहिए।
ग्रामीणों की मांग और प्रशासन का ‘रटा-रटाया’ जवाब
ग्रामीणों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उनकी मांग है कि:
- पूरे गांव का निष्पक्ष और नए सिरे से वैज्ञानिक पद्धति (DGPS/Drone) से सर्वे हो।
- दोषी अधिकारियों, जिन्होंने 36 साल तक फाइलों को दबाए रखा, उन पर कठोर कार्रवाई हो।
- गायब हुई 200 बीघा जमीन का हिसाब सार्वजनिक किया जाए।
वहीं, ए.आर.ओ. प्रशांत कुमार का कहना है कि “प्रकरण की जांच चल रही है और रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद कार्रवाई की जाएगी।” लेकिन जनता पूछ रही है— साहब, 36 साल में रिपोर्ट नहीं आई, तो और कितने दशक लगेंगे?
रिपोर्ट: प्रलभ शरण चौधरी | Truth India Times
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