सिद्धनाथ गांव में खूनी संघर्ष, 'पुआल' के विवाद में बरसे लाठी-डंडे और पत्थर
Unnao/Truth India Times Digital Desk
उन्नाव। उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के आसीवन थाना क्षेत्र में कानून-व्यवस्था और ग्रामीण सौहार्द को ठेंगा दिखाते हुए दो पक्षों के बीच जमकर तांडव हुआ। सिद्धनाथ गांव में मामूली ‘पयार’ (पुआल) को लेकर शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते खूनी संघर्ष में तब्दील हो गया। दोनों ओर से चले लाठी-डंडों और ईंट-पत्थरों ने पूरे गांव को छावनी में बदल दिया। इस हिंसा में महिलाओं समेत सात लोग लहूलुहान हुए हैं, जिनमें से एक माँ और उसके बेटे की हालत नाजुक होने पर उन्हें जिला अस्पताल रेफर किया गया है।
यह घटना दर्शाती है कि ग्रामीण इलाकों में छोटे-छोटे विवादों को सुलझाने में स्थानीय प्रशासन और पुलिस की ‘बीट प्रणाली’ कितनी विफल साबित हो रही है।
विवाद की जड़: एक बीघा खेत का ‘पुआल’ बना जान का दुश्मन
खून-खराबे की यह कहानी एक बीघा खेत के पयार (पुआल) से शुरू हुई। पीड़ित पक्ष के वसीम के अनुसार, मंगलवार को गांव के ही इस्माइल ने बिना अनुमति के उनका पुआल कटवा लिया था। बुधवार को जब वसीम इस चोरी का कारण पूछने इस्माइल के घर पहुँचा, तो बातचीत की जगह गाली-गलौज ने ले ली। विरोध करने पर मामला इतना बढ़ा कि दोनों पक्षों के लोग हथियारों के साथ आमने-सामने आ गए।
पत्थरों की बारिश और चीख-पुकार: 7 लोग हुए लहूलुहान
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर ईंट-पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। लाठी-डंडों के वार से महिलाएं भी नहीं बच सकीं। इस हिंसक झड़प में:
- प्रथम पक्ष से: वसीम (30) और उनकी पत्नी सन्नू (25) घायल हुए।
- द्वितीय पक्ष से: इस्माइल (45), उनका बेटा इस्राइल (25), पत्नी रेशमा (40) और दो बेटियां सना (20) व शानिया (19) गंभीर रूप से जख्मी हुए।
सूचना मिलने पर पहुँची पुलिस ने घायलों को मियागंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में भर्ती कराया। अस्पताल के डॉक्टर दिनेश कुमार ने बताया कि रेशमा और उनके बेटे इस्राइल के सिर पर गंभीर चोटें आई हैं, जिसके कारण उन्हें प्राथमिक उपचार के बाद जिला अस्पताल रेफर करना पड़ा।
सरकार और पुलिस प्रशासन से कड़वे सवाल
सिद्धनाथ गांव की यह घटना यूपी पुलिस के ‘सतर्कता’ के दावों पर सवालिया निशान लगाती है:
- खुफिया तंत्र की विफलता: जब मंगलवार को पुआल कटने को लेकर तनाव शुरू हुआ था, तब गांव के चौकीदार या बीट सिपाही को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? क्या पुलिस केवल बड़ी घटनाओं के होने का इंतजार करती है?
- ग्रामीण हिंसा पर अंकुश: आए दिन खेतों और मेड़ के विवाद में खून बह रहा है। क्या सरकार के पास ग्रामीण स्तर पर इन विवादों के समाधान (Mediation) के लिए कोई प्रभावी तंत्र है?
- कड़ी कार्रवाई का अभाव: अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस केवल ‘शांति भंग’ की धाराओं में खानापूर्ति करती है, जिससे अपराधियों के हौसले बुलंद रहते हैं और वे दोबारा हमला करने से नहीं चूकते।
थानाध्यक्ष का पक्ष: “जांच जारी है”
आसीवन थानाध्यक्ष प्रदीप सिंह ने बताया कि दोनों पक्षों की ओर से तहरीर प्राप्त हुई है। पुलिस मामले की गहनता से जांच कर रही है और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर धाराओं में बढ़ोत्तरी की जाएगी। उन्होंने ग्रामीणों को चेतावनी दी है कि किसी को भी कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जाएगी।
निष्कर्ष: सुलगते गांव और सोता सिस्टम
सिद्धनाथ गांव का यह विवाद केवल दो परिवारों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक ताने-बाने के टूटने की गवाही है जहाँ आपसी संवाद खत्म हो चुका है। अगर समय रहते छोटे विवादों पर पुलिस हस्तक्षेप नहीं करती, तो वे ऐसी ही बड़ी हिंसा का रूप ले लेते हैं। अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन दोषियों पर ऐसी कार्रवाई करेगा कि भविष्य में कोई ‘पुआल’ जैसे छोटे मुद्दों पर लाठियां भांजने की हिम्मत न करे।
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