उन्नाव में 'जहरीली' शराब के ठिकानों पर प्रहार
प्रलभ शरण चौधरी, ट्रुथ इंडिया टाइम्स
उन्नाव: उत्तर प्रदेश में नव वर्ष के जश्न की तैयारियों के बीच अवैध और जहरीली शराब का काला कारोबार भी सिर उठाने लगा है। इसे रोकने के लिए उन्नाव जिला प्रशासन और आबकारी विभाग ने ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाते हुए ताबड़तोड़ छापेमारी की है। जिला आबकारी अधिकारी अनुराग मिश्र के नेतृत्व में चली इस कार्रवाई में हसनगंज और पुरवा क्षेत्रों से 80 लीटर अवैध कच्ची शराब बरामद की गई है। हालांकि, यह कार्रवाई कई ऐसे सवाल भी पीछे छोड़ गई है जिनका जवाब शासन को देना होगा।
अजगैन से असोहा तक हड़कंप: लहन हुआ नष्ट
आबकारी निरीक्षक ज्योति अग्रवाल और निशांत सिंह की टीमों ने जब पुलिस बल के साथ थाना अजगैन के कुसुंभी और थाना असोहा के सोहो व रामपुर गांवों में दबिश दी, तो अवैध शराब माफियाओं में अफरा-तफरी मच गई। झाड़ियों और कच्चे घरों के पीछे चल रही अवैध भट्टियों को पुलिस ने धवस्त कर दिया।
मौके से 80 लीटर शराब जब्त की गई, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सफलता 300 किलोग्राम लहन महुआ को नष्ट करना रही। विशेषज्ञों के अनुसार, यह लहन वह कच्चा माल है जिससे सैकड़ों लीटर जहरीली शराब तैयार की जा सकती थी। इस मामले में पुलिस ने कुसुंभी निवासी शिवपयारी को गिरफ्तार किया है, जबकि कई अन्य संदिग्ध मौके से भागने में सफल रहे।
दुकानों का औचक निरीक्षण: ओवररेटिंग पर नजर
सिर्फ कच्ची शराब ही नहीं, बल्कि सरकारी दुकानों की भी शुचिता जांचने के लिए राजस्व और आबकारी की संयुक्त टीमों ने तहसील पुरवा और हसनगंज में देशी व कंपोजिट शराब की दुकानों का औचक निरीक्षण किया। स्टॉक रजिस्टर से लेकर रेट लिस्ट तक की जांच की गई। अधिकारियों ने चेतावनी दी कि यदि सरकारी दुकानों से मिलावटी शराब बेची गई या तय दाम से अधिक वसूले गए, तो लाइसेंस तत्काल निरस्त कर दिया जाएगा।
‘ट्रुथ इंडिया टाइम्स’ के जरिए सरकार से 4 तीखे सवाल
पुलिस और आबकारी विभाग की इस सक्रियता की हम सराहना करते हैं, लेकिन जनहित में सरकार की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए:
- जड़ पर प्रहार कब होगा? पुलिस अक्सर शराब बनाने वाली महिलाओं या छोटे प्यादों को गिरफ्तार करती है। लेकिन इन कच्ची भट्टियों को महुआ और रसद सप्लाई करने वाले बड़े सिंडिकेट तक पुलिस के हाथ क्यों नहीं पहुँचते?
- कुटीर उद्योग बनता अवैध कारोबार: अजगैन और असोहा के कुछ गांवों में अवैध शराब बनाना एक ‘कुटीर उद्योग’ का रूप ले चुका है। क्या सरकार के पास इन परिवारों के पुनर्वास या वैकल्पिक रोजगार की कोई योजना है ताकि वे इस आपराधिक दलदल से बाहर निकल सकें?
- स्वास्थ्य और टेस्टिंग की कमी: बरामद की गई 80 लीटर शराब की गुणवत्ता की जांच के लिए क्या जिले में कोई आधुनिक लैब है? अक्सर जहरीली शराब (मिथाइल अल्कोहल) के कारण मौतें होने के बाद ही प्रशासन जागता है। प्रिवेंटिव हेल्थ चेकअप और अवेयरनेस के लिए क्या बजट आवंटित है?
- मुखबिर तंत्र की विफलता: 300 किलो लहन एक दिन में तैयार नहीं होता। स्थानीय बीट कांस्टेबल और चौकी इंचार्ज को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? क्या क्षेत्रीय पुलिस की मिलीभगत की भी कोई उच्च स्तरीय जांच होगी?
मौत का सामान है यह कच्ची शराब
आबकारी अधिकारियों का कहना है कि यह शराब न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए ‘धीमा जहर’ है। इसे बनाने के लिए अक्सर यूरिया और अन्य घातक रसायनों का प्रयोग किया जाता है, जो लीवर और किडनी को फेल कर सकते हैं। प्रशासन ने जनता से अपील की है कि वे ऐसे संदिग्ध ठिकानों की जानकारी ‘आबकारी हेल्पलाइन’ पर दें।
निष्कर्ष: अभियान या रस्म अदायगी?
उन्नाव में हुई यह कार्रवाई स्वागत योग्य है, लेकिन यह केवल ‘न्यू ईयर’ के मद्देनजर एक रस्म अदायगी बनकर नहीं रहनी चाहिए। शराब माफियाओं का नेटवर्क इतना गहरा है कि एक जगह भट्टी टूटने पर दूसरी जगह फिर से सुलग जाती है। सरकार को चाहिए कि वह तकनीक (ड्रोन निगरानी) और सख्त कानूनी कार्रवाई के जरिए इस नेटवर्क को जड़ से उखाड़ फेंके।
उन्नाव की जनता को उम्मीद है कि जिला प्रशासन का यह ‘डंडा’ साल भर इसी तरह चलता रहेगा, ताकि किसी गरीब के घर का चिराग जहरीली शराब की भेंट न चढ़े।
ट्रुथ इंडिया टाइम्स के लिए प्रलभ शरण चौधरी की रिपोर्ट।
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