बांदा में ‘देवदूत’ बनी यूपी-112: 518 घायलों की बचाई जान, सुसाइड और किडनैपिंग की कोशिशें की नाकाम; पुलिस के इस ‘रिस्पॉन्स मॉडल’ को पूरे प्रदेश में लागू करे सरकार

बांदा: उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था और जन-सुरक्षा के मोर्चे पर अक्सर सवाल खड़े होते हैं, लेकिन बुंदेलखंड के बांदा जिले से ‘डायल यूपी-112’ की जो रिपोर्ट सामने आई है, वह सरकार के लिए एक ‘सक्सेस मॉडल’ साबित हो सकती है। पुलिस अधीक्षक अंकुर अग्रवाल के निर्देशन और नोडल अधिकारी शिवराज के नेतृत्व में बांदा पुलिस की पीआरवी (पुलिस रिस्पांस व्हीकल) ने न केवल अपराध नियंत्रण, बल्कि जीवन रक्षक की भूमिका में भी नया कीर्तिमान स्थापित किया है। आत्महत्या के प्रयासों को रोकने से लेकर डूबते हुए बच्चों को बचाने तक, यूपी-112 ने साबित कर दिया है कि अगर ‘रिस्पॉन्स टाइम’ सही हो, तो हर साल हजारों जानें बचाई जा सकती हैं।

आंकड़ों की जुबानी: 518 लोगों को मिला ‘जीवनदान’

बांदा पुलिस द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, डायल यूपी-112 की टीमों ने जिले के विभिन्न राजमार्गों और संपर्क मार्गों पर हुए सड़क हादसों में त्वरित कार्रवाई करते हुए 518 घायलों को ‘गोल्डन ऑवर’ (हादसे के ठीक बाद का महत्वपूर्ण समय) के भीतर अस्पताल पहुंचाया। विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण देरी से मिलने वाला इलाज है। बांदा की पीआरवी टीमों ने इस फासले को कम कर कई परिवारों के चिराग बुझने से बचाए हैं।

मौत के फंदे से छीनी जिंदगी: संवेदनशीलता की मिसाल

बांदा पुलिस की यह उपलब्धि केवल एक्सीडेंट तक सीमित नहीं है। पीआरवी ने ‘काउंसलर’ की भूमिका निभाते हुए मानवीय संवेदनाओं की भी रक्षा की है:

  • नरैनी और कोतवाली नगर: यहाँ एक व्यक्ति और एक महिला ने फांसी लगाकर आत्महत्या का प्रयास किया था। पीआरवी टीम ने दरवाजे तोड़कर न केवल उन्हें फंदे से उतारा, बल्कि उनकी मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग भी की, ताकि वे दोबारा ऐसा कदम न उठाएं।
  • रेस्क्यू ऑपरेशन: कोतवाली देहात के जौरही और बबेरू कस्बे में नाले में डूबे लड़कों को पीआरवी कर्मियों ने अपनी जान पर खेलकर बाहर निकाला और अस्पताल में भर्ती कराया।

अपहरण और आगजनी: हर मोर्चे पर मुस्तैद खाकी

अतर्रा क्षेत्र से जब एक पिता ने अपने बच्चे के अपहरण की सूचना दी, तो पीआरवी ने घेराबंदी कर बच्चे को सकुशल बरामद कर लिया। वहीं, केदार का डेरा इलाके में रसोई गैस सिलेंडर से लगी आग के दौरान पीआरवी जवानों ने फायर ब्रिगेड का इंतजार करने के बजाय खुद मोर्चा संभाला और लोगों को सुरक्षित बाहर निकालकर बड़े धमाके को टाल दिया।


सरकार को क्यों लेना चाहिए इस पर ‘एक्शन’? (सिफारिशें)

बांदा पुलिस के इस प्रदर्शन को देखने के बाद ट्रुथ इंडिया टाइम्स सरकार और गृह विभाग से निम्नलिखित सुधारों की मांग करता है:

1. ‘बांदा मॉडल’ का मानकीकरण (Standardization): बांदा में जिस तरह पीआरवी को ‘मल्टी-टास्किंग’ (बचाव, राहत और अपराध नियंत्रण) के लिए प्रशिक्षित किया गया है, उसे पूरे प्रदेश के जिलों में अनिवार्य किया जाए। यूपी-112 के कर्मियों को बेसिक लाइफ सपोर्ट (BLS) की गहन ट्रेनिंग दी जानी चाहिए।

2. संसाधनों की बढ़ोत्तरी: बांदा जैसे जिलों में जहाँ ग्रामीण इलाका बड़ा है, वहां पीआरवी वाहनों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि रिस्पॉन्स टाइम को और कम किया जा सके। पुराने पड़ चुके वाहनों को अत्याधुनिक मेडिकल किट और पोर्टेबल फायर एक्सटिंग्विशर से लैस किया जाए।

3. ‘सवेरा योजना’ का विस्तार: बांदा में 13,885 बुजुर्गों को ‘सवेरा योजना’ से जोड़ना एक बड़ी उपलब्धि है। सरकार को चाहिए कि अकेले रहने वाले बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए इस डेटाबेस को स्वास्थ्य सेवाओं (108 एम्बुलेंस) के साथ लिंक करे।

4. कर्मियों को प्रोत्साहन और सम्मान: जो पुलिसकर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर आग या पानी से लोगों को बचा रहे हैं, उन्हें ‘आउट-ऑफ़-टर्न’ प्रमोशन या विशेष सेवा पदक मिलना चाहिए। इससे अन्य जिलों के पुलिसकर्मियों का मनोबल बढ़ेगा।


निष्कर्ष: जनता का बढ़ता विश्वास

आमतौर पर पुलिस की छवि नकारात्मक रही है, लेकिन बांदा में डायल यूपी-112 ने इस छवि को बदला है। जब पुलिस केवल डंडा चलाने वाली नहीं, बल्कि मरहम लगाने वाली बन जाती है, तो समाज में सुरक्षा का भाव पैदा होता है। पुलिस अधीक्षक और उनकी टीम की यह सक्रियता सराहनीय है, लेकिन इसे स्थायी बनाए रखने के लिए सरकार को बजट और तकनीकी सहयोग बढ़ाना होगा।

जनता की पुकार: स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पीआरवी की वजह से अब देर रात भी वे खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। सरकार को इस भरोसे को टूटने नहीं देना चाहिए।

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