बांदा: मनरेगा में बड़ा खेल, ग्राम प्रधान ने खोला मोर्चा, रोजगार सेवक पर फर्जी हस्ताक्षर से धन हड़पने का आरोप

बांदा जिले के अतर्रा ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पंचायत कोर्रा खुर्द में भ्रष्टाचार का एक गंभीर मामला प्रकाश में आया है। ग्राम प्रधान प्रियंका ने ग्राम रोजगार सेवक पर सरकारी धन के बंदरबांट और फर्जीवाड़े का सनसनीखेज आरोप लगाया है। आरोप है कि रोजगार सेवक ने मिलीभगत कर ग्राम प्रधान के फर्जी हस्ताक्षर किए और मनरेगा (MGNREGA) के तहत होने वाले कार्यों का भुगतान कराकर सरकारी खजाने को चूना लगाया है। इस मामले की लिखित शिकायत बिसंडा की खंड विकास अधिकारी (BDO) से की गई है, जिसके बाद प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है।

फर्जी हस्ताक्षर और भुगतान का षड्यंत्र

ग्राम प्रधान प्रियंका का दावा है कि उन्हें अंधेरे में रखकर ग्राम रोजगार सेवक ने कई महत्वपूर्ण फाइलों और मस्टरोल पर उनके फर्जी हस्ताक्षर किए हैं। शिकायत के अनुसार, मनरेगा के तहत गांव में जो कार्य या तो अधूरे थे या केवल कागजों पर चल रहे थे, उनकी धनराशि निकालने के लिए इस धोखाधड़ी का सहारा लिया गया। ग्राम प्रधान ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने कई ऐसे भुगतानों पर सहमति नहीं दी थी, फिर भी सरकारी पोर्टल पर डिजिटल सिग्नेचर और हस्ताक्षरों का दुरुपयोग कर पैसे ट्रांसफर कर लिए गए।

धन के दुरुपयोग की लंबी फेहरिस्त

शिकायतकर्ता का आरोप है कि भ्रष्टाचार केवल हस्ताक्षरों तक सीमित नहीं है, बल्कि कार्यों की गुणवत्ता और श्रमिकों की संख्या में भी बड़ा हेरफेर किया गया है। ग्राम पंचायत कोर्रा खुर्द में कराए गए विभिन्न विकास कार्यों में निम्नलिखित अनियमितताएं गिनाई गई हैं:

  • कागजी श्रमिक: ऐसे व्यक्तियों के नाम पर मस्टरोल भरे गए जो या तो गांव में मौजूद नहीं हैं या फिर कभी काम पर आए ही नहीं।
  • अधूरे कार्य: नाली निर्माण, चकरोड मरम्मत और तालाबों के सौंदर्यीकरण जैसे कार्यों को बिना पूरा किए ही उनकी पूर्णता रिपोर्ट लगा दी गई।
  • सामग्री खरीद में धांधली: निर्माण सामग्री की खरीद के लिए ऊंचे दामों के फर्जी बिल लगाए गए और कमीशन का खेल खेला गया।

खंड विकास अधिकारी से जांच की मांग

ग्राम प्रधान प्रियंका ने बिसंडा की खंड विकास अधिकारी को सौंपे गए पत्र में साक्ष्यों के साथ जांच की गुहार लगाई है। उन्होंने मांग की है कि ग्राम पंचायत के बैंक खातों के लेन-देन और पिछले छह महीनों के मस्टरोल की गहनता से जांच की जाए। उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि यदि इस मामले में दोषी रोजगार सेवक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो वे उच्चाधिकारियों और लोकपाल तक इस शिकायत को लेकर जाएंगी।

प्रधान का कहना है कि एक ओर सरकार ग्रामीण विकास के लिए करोड़ों रुपये भेज रही है, वहीं दूसरी ओर ब्लॉक स्तर और ग्राम पंचायत स्तर के कुछ कर्मचारी अपनी जेब भरने के लिए योजनाओं का गला घोंट रहे हैं।

ब्लॉक प्रशासन की सुस्ती पर सवाल

इस मामले में खंड विकास अधिकारी (BDO) ने आश्वासन दिया है कि शिकायत के आधार पर एक जांच कमेटी गठित की जाएगी, जो मौके पर जाकर स्थलीय निरीक्षण करेगी। हालांकि, स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि ब्लॉक कार्यालय के कुछ बाबू और तकनीकी सहायक भी इस खेल में शामिल हो सकते हैं, जिसके कारण जांच में देरी की जा रही है। ग्रामीणों ने मांग की है कि जांच निष्पक्ष हो और दोषी रोजगार सेवक से सरकारी धन की रिकवरी की जाए।

मनरेगा पोर्टल और डिजिटल सुरक्षा में सेंध

यह मामला डिजिटल सुरक्षा पर भी सवाल खड़े करता है। ग्राम प्रधान और सचिव के संयुक्त हस्ताक्षरों और ओटीपी (OTP) आधारित प्रणाली होने के बावजूद फर्जी भुगतान होना यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं तकनीकी सेंधमारी या मिलीभगत का जाल बहुत गहरा है। यदि रोजगार सेवक ने प्रधान के फर्जी हस्ताक्षर किए हैं, तो यह सीधे तौर पर जालसाजी (Forgery) और धोखाधड़ी का आपराधिक मामला बनता है।

बांदा जिले में मनरेगा को लेकर पहले भी कई शिकायतें आती रही हैं, लेकिन कोर्रा खुर्द का यह मामला ग्राम प्रधान बनाम रोजगार सेवक की सीधी जंग के कारण चर्चा में है। अब सबकी नजरें प्रशासन की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं कि क्या सच में रोजगार सेवक ने फर्जीवाड़ा किया है या यह केवल आपसी रंजिश का परिणाम है।

निष्कर्ष और जनता की उम्मीद

भ्रष्टाचार की इस लड़ाई में गांव का विकास रुका हुआ है। ग्रामीणों की मांग है कि दोषियों को सजा मिले ताकि भविष्य में कोई भी सरकारी कर्मचारी जनता के टैक्स के पैसे का दुरुपयोग करने की हिम्मत न कर सके। अतर्रा ब्लॉक प्रशासन के लिए यह अग्निपरीक्षा है कि वह इस घोटाले की तह तक जाकर दूध का दूध और पानी का पानी करे।

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