बांदा में खाकी लहूलुहान: रईसजादों ने सिपाही का गला घोंटा, गड़ासे से किया हमला; पुलिस की साख पर भारी ‘जमीनी’ रंजिश!

बांदा/बबेरू |उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में कानून का इकबाल एक बार फिर जमींदोज होता नजर आया। बबेरू कोतवाली क्षेत्र के परसौली गांव (निर्मल पुरवा) में जमीन विवाद सुलझाने गए पुलिसकर्मियों पर दबंगों ने ऐसा खूनी हमला बोला कि खाकी भी खुद को असुरक्षित महसूस करने लगी। डायल-112 की सूचना पर पहुँचे एक सिपाही और होमगार्ड को आरोपियों ने न केवल लात-घूंसों से पीटा, बल्कि गड़ासे से प्रहार कर मौत के घाट उतारने की कोशिश की। हद तो तब पार हो गई जब एक आरोपी ने सिपाही के मफलर से ही उसका गला घोंटने का प्रयास किया। पुलिस ने इस मामले में एक महिला समेत 7 लोगों को गिरफ्तार तो कर लिया है, लेकिन इलाके में चर्चा है कि इस खूनी संघर्ष के पीछे की असली वजह सिस्टम की सुस्ती और ‘चाय-नाश्ते’ वाली मिलीभगत भी हो सकती है।


आधी रात को ‘अपराध’ का तांडव

घटना की शुरुआत परसौली गांव के उमाशंकर वर्मा के घर से हुई। भाइयों के बीच जमीन के टुकड़े को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि लाठियां निकल आईं। उमाशंकर ने मदद के लिए डायल-112 पर कॉल किया। मौके पर बबेरू कोतवाली में तैनात आरक्षी अयोध्या प्रसाद और होमगार्ड राधेश्याम पहुँचे। पुलिसकर्मियों को लगा था कि वे बीच-बचाव कर मामला शांत करा देंगे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि उन्मादी भीड़ उन पर ही टूट पड़ेगी।

हमले का खौफनाक मंजर: जैसे ही पुलिसकर्मी मौके पर पहुँचे, वहां मौजूद अजय कुमार, रमाशंकर, रामू, संतोष, शिवा, पवन और प्रीती ने उन पर हमला बोल दिया। आरक्षी अयोध्या प्रसाद के मुताबिक, आरोपियों ने कानून का डर छोड़ उन पर गड़ासे से वार किया। इतना ही नहीं, सिपाही को जान से मारने की नीयत से उसके ही मफलर को गले में फंसाकर खींचने लगे। होमगार्ड राधेश्याम ने जब बचाने की कोशिश की, तो उसे भी बुरी तरह लहूलुहान कर दिया गया।


क्या ‘चाय और दमआलू’ की दावतों ने बढ़ाया हौसला?

क्षेत्र में दबी जुबान से यह चर्चा जोरों पर है कि आखिर इन आरोपियों में पुलिस पर हमला करने की हिम्मत आई कहाँ से? आरोप लग रहे हैं कि स्थानीय पुलिस और रसूखदारों के बीच अक्सर ‘चाय और दमआलू’ वाली बैठकें होती रहती हैं। जब रसूखदारों को लगता है कि ‘साहब’ तो अपने ही हैं, तो वे कानून को हाथ में लेने से नहीं हिचकते।

सच्चाई यह है कि जमीन के विवाद महीनों तक तहसीलों और थानों में लंबित रहते हैं। राजस्व विभाग और स्थानीय पुलिस की ‘कथित मिलीभगत’ के कारण छोटे विवाद खूनी संघर्ष में तब्दील हो जाते हैं। अगर समय रहते उमाशंकर वर्मा की शिकायत पर निष्पक्ष कार्रवाई हुई होती, तो आज खाकी को यह दिन न देखना पड़ता। क्या यह ‘चाय-नाश्ते’ वाली दोस्ती ही है जिसने अपराधियों के मन से वर्दी का खौफ खत्म कर दिया है?


सात आरोपी सलाखों के पीछे, पर सवाल बरकरार

बबेरू कोतवाली इंस्पेक्टर राजेंद्र सिंह राजावत भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुँचे और स्थिति को नियंत्रित किया। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सभी सातों आरोपियों को दबोच लिया है:

  1. अजय कुमार
  2. रमाशंकर
  3. रामू
  4. संतोष
  5. शिवा
  6. पवन
  7. प्रीति

पीड़ित उमाशंकर ने भी पुलिस को तहरीर देकर बताया कि उसके भाई उसे जान से मारने पर आमादा थे। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ गिरफ्तारी से समस्या हल हो जाएगी? जिस गांव में पुलिस सुरक्षित नहीं है, वहां आम जनता का क्या होगा?


प्रलभ शरण चौधरी की ‘तीखी’ राय (Truth India Times)

बांदा की यह घटना उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए एक कड़ा संदेश है। जब रक्षक ही भक्षकों का शिकार होने लगें, तो समझ लीजिए कि अपराधियों के हौसले सातवें आसमान पर हैं। गड़ासे से हमला और गला घोंटने की कोशिश यह बताती है कि आरोपियों को कानून का रत्ती भर भी भय नहीं था।

यह समय केवल ‘गिरफ्तारी’ की पीठ थपथपाने का नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन करने का है कि जमीनी विवादों में आखिर पुलिस की छवि ऐसी क्यों हो गई है कि लोग उन पर हमला करने से भी नहीं डरते? क्या ‘चाय और दमआलू’ वाली मिलीभगत ही इस अविश्वास की वजह है? शासन को चाहिए कि वह न केवल इन 7 आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई (जैसे एनएसए या गैंगेस्टर एक्ट) करे, बल्कि उस ‘मजबूत गठजोड़’ को भी तोड़े जो अपराधियों को संरक्षण देता है।

निष्कर्ष: खाकी के इकबाल को बहाल करना जरूरी

आरक्षी अयोध्या प्रसाद और होमगार्ड राधेश्याम का घायल होना केवल दो व्यक्तियों पर हमला नहीं, बल्कि पूरे राज्य की कानून व्यवस्था पर प्रहार है। बांदा पुलिस को अब यह साबित करना होगा कि वर्दी का सम्मान सर्वोपरि है। अगर आज इन पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो कल कोई भी अपराधी किसी भी गली-मोहल्ले में खाकी को चुनौती देगा।


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