उन्नाव में फूटा आक्रोश: बांग्लादेश में दीपू की नृशंस हत्या पर जला पुतला
उन्नाव/शुक्लागंज | पड़ोसी देश बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की आग अब उत्तर प्रदेश के उन्नाव तक पहुँच गई है। मयमनसिंह जिले में 27 वर्षीय हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या करने और फिर उसे पेड़ से बांधकर जिंदा जला देने की जघन्य घटना ने भारत के हिंदुओं के जख्मों पर नमक छिड़क दिया है। इस तालिबानी बर्बरता के विरोध में रविवार को उन्नाव के शुक्लागंज में हिंदू सुरक्षा सेवा संघ के कार्यकर्ताओं ने जबरदस्त प्रदर्शन किया। आनंदघाट से शुरू हुआ आक्रोशितों का जुलूस बालू घाट चौराहे पर पहुँचा, जहाँ बांग्लादेशी हुकूमत का पुतला फूंककर ‘ईशनिंदा’ के नाम पर हो रहे इस खूनी खेल को तुरंत रोकने की चेतावनी दी गई।
मयमनसिंह का ‘ब्लैक होल’: ईशनिंदा का बहाना और जिंदा जलाया गया दीपू
18 दिसंबर की वह काली रात दीपू चंद्र दास के लिए काल बनकर आई। बांग्लादेश के भालुका उपज़िला में उन्मादी भीड़ ने अचानक दीपू पर हमला बोला। आरोप लगाया गया कि उसने इस्लाम का अपमान किया है—एक ऐसा आरोप जो अक्सर वहां अल्पसंख्यकों की हत्या करने या उनकी संपत्तियां हड़पने के लिए ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
भीड़ का पागलपन यहीं नहीं रुका। दीपू को बेरहमी से पीटने के बाद उसे एक पेड़ से बांध दिया गया और फिर उसे आग के हवाले कर दिया गया। जब तक पुलिस मौके पर पहुँचती, दीपू की रूह जिस्म छोड़ चुकी थी। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बाद में पुलिस जांच में सामने आया कि दीपू के खिलाफ सोशल मीडिया पर ईशनिंदा का कोई ठोस सबूत नहीं मिला था। यानी, महज ‘हवा-हवाई अफवाह’ के दम पर एक निर्दोष हिंदू युवक की बलि चढ़ा दी गई।
शुक्लागंज में गूंजे नारे: “हिंदुओं का कत्लेआम बंद करो”
उन्नाव में हुए प्रदर्शन के दौरान हिंदू सुरक्षा सेवा संघ के कार्यकर्ताओं में भारी रोष देखा गया। संगठन के नेताओं ने कहा कि बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति जानवरों से भी बदतर हो गई है। आनंदघाट से निकला जुलूस जब बालू घाट चौराहे पहुँचा, तो वहां का माहौल ‘जय श्री राम’ और ‘बांग्लादेश मुर्दाबाद’ के नारों से गूंज उठा। प्रदर्शनकारियों ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री का पुतला दहन किया और मांग की कि भारत सरकार इस मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाए।
[Image showing a crowd of protesters holding flags and burning an effigy at a busy intersection]
‘चाय और दमआलू’ वाली कूटनीति पर तीखा प्रहार
प्रदर्शनकारियों और प्रलभ शरण चौधरी (Truth India Times) के विश्लेषण में एक बड़ा सवाल यह उठा कि जब पड़ोसी देश में हिंदुओं का कत्लेआम हो रहा है, तब अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ‘चाय और दमआलू’ की दावतों में मशगूल क्यों हैं?
आरोप है कि बांग्लादेशी पुलिस और वहां के कट्टरपंथियों के बीच ‘पक्की मिलीभगत’ है। जब भीड़ हमला करती है, तो पुलिस अक्सर मूकदर्शक बनी रहती है। अक्सर देखा जाता है कि पुलिस और स्थानीय कट्टरपंथी नेता मेज पर बैठकर चाय की चुस्कियां लेते हैं और फिर अल्पसंख्यकों के दमन की पटकथा लिखी जाती है। दीपू चंद्र दास की हत्या में भी यही पैटर्न दिखा—भीड़ को इकट्ठा होने दिया गया, उसे उकसाया गया और जब हत्या हो गई, तब पुलिस ने ‘जांच’ का नाटक शुरू किया।
क्यों चुप है वैश्विक बिरादरी?
उन्नाव के कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया कि अगर यही घटना किसी और समुदाय के साथ हुई होती, तो अब तक मोमबत्तियां जल चुकी होतीं और यूएन (UN) के बयान आ गए होते। लेकिन जब बात हिंदू युवक की आती है, तो सबको सांप सूंघ जाता है।
- साजिश के तहत हत्या: दीपू की हत्या कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि यह बांग्लादेश से हिंदुओं को भगाने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा है।
- सबूतों का अभाव: पुलिस खुद मान रही है कि कोई सबूत नहीं मिला, फिर भी भीड़ को उकसाने वाले मास्टरमाइंड अभी भी खुले घूम रहे हैं।
- उन्नाव का संदेश: शुक्लागंज की सड़कों पर उतरा यह जनसैलाब केवल एक पुतला दहन नहीं है, बल्कि यह केंद्र सरकार को एक संदेश है कि देश का हिंदू अब अपने भाइयों पर हो रहे अत्याचारों को मूकदर्शक बनकर नहीं देखेगा।
दोषियों को फांसी की मांग
हिंदू सुरक्षा सेवा संघ के जिला पदाधिकारियों ने चेतावनी दी कि यदि बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई और दीपू के हत्यारों को फांसी की सजा नहीं दी गई, तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा। उन्होंने मांग की कि इस घटना की जिम्मेदारी वहां की सरकार तय करे और दोषियों पर ऐसी कार्रवाई हो कि दोबारा किसी ‘दीपू’ को पेड़ से बांधकर जलाने की हिम्मत न हो सके।
निष्कर्ष: कब तक सहेंगे हिंदू?
दीपू चंद्र दास की हत्या केवल एक मौत नहीं है, बल्कि यह न्याय की हत्या है। यह घटना साबित करती है कि कट्टरपंथ के आगे कानून की हैसियत ‘चाय-दमआलू’ की टेबल पर होने वाली कागजी बातों से ज्यादा कुछ नहीं है। उन्नाव का यह विरोध प्रदर्शन पूरे उत्तर प्रदेश में एक चिंगारी का काम कर रहा है। अब देखना यह है कि क्या विश्व समुदाय दीपू की राख में दफन हो चुके न्याय को देख पाएगा या फिर ‘सेकुलरिज्म’ का चश्मा पहनकर इसे महज एक ‘स्थानीय विवाद’ बताकर भूल जाएगा?
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